लखनऊ प्रेस क्लब : एडिटर हेल्ड फॉर वॉयलेंस

-अनिल शुक्ल||

उप्र के अख़बार आज अपने स्वातंत्र्य बोध को लेकर सवालिया निशानों के घेरे में हैं। क्या सचमुच सांप्रदायिक घृणा और जातीय उन्माद उनके प्रथम मूल्य बोध बन चुके हैं। क्या सचमुच वे सत्ता और स्थापना की आलोचना के अपने नैतिक कर्तव्यों से विमुख हो चुके हैं? यदि ऐसा है तो इनकी जड़ें कब और कहाँ से आरोपित हुईं क्योंकि स्वतन्त्रता संग्राम से लेकर आज़ादी के बाद तक के यूपी (पुरातन नाम यूनाइटेड प्रॉविंस) के अख़बार राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से बेहद सम्मान और मर्यादा का पर्याय बने ‘रहे हैं। महात्मा गांधी से लेकर मदनमोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, गोविंदबल्लभ पंत, राजेंद्र प्रसाद आदि देश के नामचीन नेतागण इन अख़बारों की क़ाबलियत और साफ़गोई के ज़बरदस्त प्रशंसक रहे हैं। आपातकाल में लेकिन उप्र के यही अख़बार ‘गूंगे’ साबित हुए। 80 के दशक में में एक ओर ये जहां ‘राम जन्म भूमि मंदिर’ के प्रवक्ताओं का महत्वपूर्ण मंच बनने लग गए वहीँ प्रदेश के इन प्रमुख अख़बारों ने लेकिन एक नया मोड़ लिया। यह था प्रसार संख्या को बढ़ाने के लिए आपसी प्रतिद्वंदिता में ‘मसल पवार’ का उपयोग। यह ‘पावर’ बढ़ते-बढ़ते इस क़दर अराजक हो गयी कि अख़बार के संस्थानों में कार्यरत पत्रकार और कर्मचारी सामान्य जनजीवन में हॉकियों और लाठी-भालों का उपयोग में उलझते चले गए। यहाँ इस दौर की ऐसी ही घटना का उल्लेख है।


प्रेस क्लब’ में हुए भयानक हादसे से हम हैरान थे। हम ही क्या, लखनऊ शहर के पूरे पत्रकार स्तब्ध थे। ‘क्लब’ की इमारत की खिड़कियाँ जगह-जगह से तोड़-फोड़ डाली गई थीं। एंट्री गेट से लेकर मुख्य हॉल तक का ‘पैसेज’ ख़ून आलूदा कांच के अनगिनत टुकड़ों से अटा पड़ा था। आधी रात गुज़र जाने के बावजूद मक्खियां बेतरह भिनभिना रही थीं। ‘बार’ के बगल वाले रिटायरिंग रूम की खिड़कियों का कांच आधा अंदर पसर आया था और आधा बाहर वाली सड़क पर (जो अब ‘पत्रकार उसामा तलहा रोड’ कहलाती है) बिखर गया था । पुलिस अगली दोपहर तक चप्पे-चप्पे पर बनी रही। सुबह के अख़बार इस हादसे की ख़बरों से भर गए थे। ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ ने अपने पहले पेज पर जो ख़बर छपी उसकी हेडलाइन थी- ‘एडिटर हेल्ड फॉर वॉयलेंस’! (हिंसा के आरोप में संपादक गिरफ़्तार)। अखबार पढ़कर पूरा शहर सकते में आ गया।


एफआईआर मेरे, शीतल पी. सिंह और ओसामा तलहा (महासचिव, लखनऊ प्रेस क्लब) की तरफ से दायर की गई थी। पुलिस ने सार्वजानिक स्थल पर हिंसा, बलवा, तोडफ़ोड़, लूटपाट, गिरोहबंदी, जान से मारने की कोशिश आदि से जुडी आईपीसी की आधा दर्जन से ज़्यादा धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया।


क़ैसरबाग़ थाने में एफआईआर लिखते-लिखाते और बाक़ी खानापूरी होते-होते सुबह का झुटपुटा उतरने लग गया। थाने के मालखाने के बाहर हॉकियों, डंडों और लोहे की सरियों का झुण्ड पड़ा था जो ‘संपादक जी’ के चेले-चपाटों की गाड़ियों से बरामद हुआ था। मेज डालकर एसएसपी चमनलाल बैठे थे। वह मूलतः पंजाब केडर के थे, डेप्यूटेशन पर इन दिनों यूपी केडर में थे। एक हॉकी उठा उस पर लगी कांच की खरोंचों पर नज़र डालते हुए उन्होंने गुरुमुखी एक्सेंट में संपादक से पूछा- “बई द वे, आपके यहाँ हॉकियाँ इंडिविजुअल्स को इश्यू की जावें हैं या ग्रुप को? ‘संपादक जी’ मौन धारण किये नीची नज़र रखे अपने बाएं जूते से दाहिना पाँव खुजलाने लग गए।


प्रदेश की गृह मंत्री के आवास से रेग्युलर ब्रीफ़िंग ली जा रही थी। भिनसार होने पर आख़िरी ब्रीफ़िंग देकर एसएसपी निकल गए थे। संपादक जी ने एसपी सिटी से पूछा “क्या मैं एडिशन छोड़ने के लिए ऑफिस चला जाऊं?” युवा आईपीएस एसएन० सिंह ने अबोध स्वर में कहा- ‘”थोड़ा सा और वेट कर लीजिये।” फिर वह टॉयलेट के बहाने इन्स्पेक्टर रूम की तरफ चले गए। कुछ देर बाद एक 3 पट्टी वाला हेड कांस्टेबल आया। उसने संपादक जी से वहाँ से उठ कर चलने को कहा।


सम्पादक जी अब अपने साथ के दर्जन भर से ज़्यादा लोगों के साथ हवालात के भीतर थे। उनके ‘अंदर’ पहुँच जाने से साथ के लोग सकते में आ गए। वे तो यह उम्मीद कर रहे थे कि अभी ‘भैया’ (सम्पादक जी) उन सब को बाहर निकालने का दस्ती पुर्ज़ा लेकर हवालात के गेट पर अवतरित होंगे और तब वे वहाँ मौजूद सब लोगों को ‘अंगूठा’ दिखाते फुर्र हो जायेंगे। ये सभी अख़बार के ग़ैर सम्पादकीय विभागों के वर्कर थे। उनमें कुछ प्रोडक्शन विभाग के थे, ज़्यादातर सर्कुलेशन के और कुछ थे जो ‘कहीं नहीं’ थे लेकिन अखबार उन्हें फिर भी ‘वक़्त-ज़रुरत काम आएंगे’ मानकर तनख्वाह दे रहा था।


यह दरअसल अख़बार की ‘मसल’ टीम थी जिसकी कमान ‘कहीं नहीं’ वाली टीम के हाथ में थी। ‘भैया’ के लेकिन ‘अंदर’ हो जाने से वे कांप गए। वे कभी डरते नहीं थे। ‘भैया’ हैं तो क्या डर है! वे ‘भैया’ को दुनिया का सबसे बड़ा ‘आइकन’ मानते थे। ‘भैया’ उनके लिए बहुत बड़े डॉन थे। फ़िल्मों में दिखने वाले डॉन से भी ज़्यादा बड़ा और मज़बूत! अक्सर जब उन्हें ‘एक्शन’ में उतरने से पहले ‘पीने’ को दी जाती तो वे छक कर पीते और पीकर नारा बुलंद करते- ‘भैया जी हैं, तो क्या ग़म हैं!’ याकि ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, भैया जी का नाम रहेगा!’


मध्य और पूर्वी यूपी के हिंदी के दो प्रमुख दैनिक अख़बारों में उन सालों में इस ‘मसल’ टीम की ताक़त ख़ूब बढ़ी थी। यह उन्नीस सौ अस्सी के दशक का नया ‘फिनॉमिना’ था। अपना सर्क्युलेशन बढ़ाने के लिए अब अख़बारों को अपनी ‘क्वालिटी’ सुधारने में में यक़ीन नहीं रहा था। अब ये एक दूसरे के प्रसार केंद्रों पर हमला बोलकर उनकी प्रतियों को नष्ट कर के प्रतिद्वंदी का सर्क्युलेशन घटाने का ‘स्किल’ विकसित कर रहे थे। कानपुर से लेकर गोरखपुर, पटना तक यह आये दिन होता रहता था।


‘मसल’ शक्ति प्रदर्शन की इस पूरी घल्लूघारा की शुरूआत कुछ साल पहले ‘भैया’ ने ही की थी। ‘भैया’ तब कानपुर में थे और विरोधी अख़बार के सम्पादक थे। उनका अख़बार कानपुर का ‘नम्बर एक’ प्रसार संख्या वाला नहीं बन रहा था लिहाज़ा विज्ञापन भी ज़्यादा नहीं बटोर पा रहा था। उन्होंने प्रबंधन के सामने ‘प्रोडक्ट’ के प्रमोशन के वास्ते एक बड़ी कार्य योजना रखी। उन्होंने ‘मसल’ टीम बढ़ाने के लिए तनख्वाह और ‘एंटरटेनमेंट’ का एक बड़ा बजट माँगा। प्रबंधन ने उससे कुछ कम पर मंज़ूर कर लिया। अपने संपर्कों के जरिये ‘भैया’ बनारस, आज़मगढ़ और पटना से ऐसे लड़कों को अपने संस्थान में लाये जो हॉकी, डंडे से लेकर गोली तक कुछ भी चला सकते थे। ‘भैया’ नम्बर वन तो न बन सके अलबत्ता उन्होंने अपने विरोधी को नाकों चने चबवा दिए।


नया सेठ हम उम्र था। इन्होने जब यह जताया कि उन्होंने कानपुर में अख़बार को खड़ा कर दिया है तो नए सेठ का अहम् गड़बड़ाया। उसने इन्हें बाहर का रास्ता दिखाया। इत्तफ़ाक़ से प्रतिद्वंदी अखबार के लखनऊ एडिशन में श्रमिक असंतोष अपने चरम पर था। हालत यह हो गयी कि श्रमिक ट्रेड यूनियन ने अपने को ‘खुदमुख़्तार’ घोषित कर दिया। मालिक को तीसरे प्रमुख अखबार में अपना विज्ञापन निकलवा कर यह घोषित करना पड़ा कि उनके अख़बार में छपने वाली ख़बरों का उनसे कोई ताल्लुक़ नहीं। इसी बीच ‘भैया’ उनसे मिले। उन्होंने मालिकानों के साथ ‘डबल डील’ की। उन्होंने ट्रेड यूनियन का सफाया और सर्क्युलेशन में विस्तार का वायदा किया।


‘भैया’ की कानपुर टीम ठलुआ बैठी ही थी। बीएचयू उनकी दबंगई और गुंडई का पुराना अड्डा था। उन्होंने बनारस से गुण्डों की फ़ौज आयातित की। उनकी इस विशाल फ़ौज ने लखनऊ स्थित हज़रतगंज कार्यालय बिल्डिंग से इस अख़बार के पूरे-पूरे स्टाफ को बेदखल करके अपना क़ब्ज़ा कर लिया। उन्होंने सारी नयी भर्तियां कीं और इसके बाद न तो ‘भैया’ ने पीछे मुड़कर कुछ पूछा और न मैनेजमेंट ने आगे बढ़कर उन्हें कोई जवाब दिया। बाद में वह कंपनी के ‘बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स’ में भी शामिल कर लिए गए।


यहाँ से ‘भैया’ ने पूर्वांचल तक की चार सौ किलोमीटर की पट्टी पर घल्लूघारा बहाने की बड़ी कार्ययोजना बनाई। तमाम शहरों में न्यूज़ पेपर सेंटर्स पर अलस्सुबह लाठी-गोली चलना आम बात हो गयी। आज इसकी चित तो कल उसकी पट का हिंसक खेल चलता रहा। कई शहरों के पुलिस अधिकारियों ने लखनऊ स्थित मुख्यालय ‘वाइट वॉयलेंस’ के वॉयलेंस संदेश भेजे। जवाब मिला-उनकी आपसी रंजिश है, ‘लॉ एंड आर्डर’ को भला क्या नुकसान?’ इस तरह सालों हिंसा का यह खेल चलता रहा। दोनों अख़बार के पास मुश्टण्डों का एक ठीक-ठाक गेंग पुष्प-पल्लवित होता रहा।
‘प्रेस क्लब’ की हिंसा का लेकिन इन अख़बारों की आपसी हिंसा से कोई लेना-देना नहीं था। यहाँ इसीलिये उनकी रणनीति फेल हो गयी। आज ‘भैया’ ही ‘अंदर’ हो गए तो कभी न डरने वाले गेंग के मेम्बरान डर गए। ‘अंदर’ होते समय ‘भैया’ फिस्स सी हंसी हंसे और फिर दांत भींच कर बोले “सुबह होने दो। यह साला एसएसपी सस्पेंड होगा।” उनमें से कुछ तो यह समझ बैठे कि सचमुच अभी कुछ देर बाद सस्पेंड होकर एसएसपी भी हवालात के भीतर होगा। ज़्यादातर लेकिन ‘भैया’ की हंसी के पीछे के फीके पन को भांप गए और भांप कर कांप गए।


अंदर वालों ने ‘अंदर’ वाले भैया की तुलना ऑफिस वाले ‘भैया’ से की। अख़बार के दफ़्तर की हज़रतगंज वाली ‘प्राचीन’ बिल्डिंग में उनक चेम्बर शुरू में ही पड़ता था। हर स्टाफ मेंबर को उन्हीं के चेम्बर से होकर भीतर जाना होता था। सुबह हो या शाम, अपने चेम्बर में वह कुर्सी पर बैठकर कोई एक अख़बार पढ़ते रहते और अपने पाँव मेज के ऊपर रखते। हर आने-जाने वाला उनके पाँव छूकर ही आगे बढ़ता। वह हर एक को देख लें कोई ज़रूरी नहीं, अलबत्ता ‘अनुशासनहीनता’ बरतने पर जिसकी उन्हें ‘मां-बहन’ करनी होती थी, उसे वह ज़रूर देख लेते थे। ऑफिस ही क्या, बीती रात दस बजकर चौदह मिनट तक ‘भैया’ का लट्ठ सारे शहर में पुजता था।

थाने में पत्रकारों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। रात से लेकर सुबह तक जो सुनता कि ‘प्रेस क्लब’ पर हमला हुआ है वह थाने की तरफ भागा चला आता। थाने में अकड़-अकड़ कर घूमने वाले वे वरिष्ठ और सज्जन पत्रकार तो थे ही, ‘भैया’ ने जब तब उन्हें मतलब-बेमतलब हड़काया था , इनमें वे तमाम पत्रकार भी शामिल हैं जो कल तक ‘भैया’ के सामने ‘पानी मांगते’ थे। अब लेकिन ‘क्लब’ ‘पानी-पानी’ किया जा रहा है इसलिए एक दूसरे से फ़ोन पर मिली इत्तलाह को सुन वे रात या तड़के ही भागे चले आये थे। ‘क्लब’ उनके लिए सम्मान की वस्तु था। वस्तुतः वे ‘क्लब’ में अपना सम्मान देखते थे। ‘क्लब’ में वे पवित्र भाव से आते हैं, वे यहां पवित्र भाव से बैठते हैं और वे यहां पवित्र भाव से ‘पीते’ हैं। इनमें अपना ‘ऊँट निहुरे-निहुरे चराते’ इक्का ढुक्का वे पत्रकार भी थाने पहुंचे थे, ‘भैया’ ने जिनको समय-समय पर ‘ओब्लाइज़’ किया था। ‘भैया’ के पास पहुँच कर वे मुर्दनी वाला भाव प्रकट करते, याकि ‘हाय हुसैन हम न हुए’ के जज़्बे को याद करते हुए कुछ इस तरह कि ‘हम वहाँ होते तो आप यहां न होते‘ वाला भाव प्रकट करते। मैंने तो इनको कभी भाव नहीं दिया था इसलिए मेरे पास कोई नहीं आया, लेकिन कुछ शीतल के पास पहुँच रहे थे, ठाकुरवाद ज़िंदाबाद का नारा लगाते हुए और ज़्यादातर वीरेंद्र भट्ट के पास- कम्प्रोमाइज़ की राह ढूंढने की कोशिश में सॉफ्ट कॉर्नर मानकर। उनके हाथ हालांकि पगडंडी भी नहीं पड़ पा रही थी।


वैसे तो देश का हर ‘प्रेस क्लब’ उस शहर के पत्रकार के लिए ‘मंदिर’ की तरह होता है लेकिन लखनऊ ‘क्लब’ की धज ही निराली रही थी। देश के प्रधानमंत्री के रूप में यहाँ जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी तक विशिष्ट अतिथि बतौर आये हैं। यहां नियमित आने वालों मुख्यमंत्रियों में चंद्रभान गुप्ता, हेमवतीनंदन बहुगुणा, एनडी तिवारी, चौधरी चरण सिंह, वीपी सिंह, मुलायम सिंह, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह के अलावा युवा तुर्क चंद्रशेखर, शरद पवार, हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकारों में अमृतलाल नागर, यशपाल, भगवती चरण वर्मा, श्रीलाल शुक्ल और कला-संस्कृति जगत के दूसरे अनेक महत्वपूर्ण नाम भी शामिल हैं।


तत्कालीन मुख्यमंत्री सम्पूर्णान्द ने 1955 में ‘चायना गेट बाज़ार’ के पास की उक्त भूमि ‘प्रेस क्लब’ के निर्माण हेतु ‘यूपी जर्नलिस्ट यूनियन’ के नाम 99 साल की लीज़ पर महासचिव ब्रजवासी राय को दी थी। लखनऊ के नामचीन पत्रकारों की लंबी फ़ेहरिश्त है जो है जो समय-समय पर ‘लखनऊ प्रेस क्लब’ का नेतृत्व संभालते रहे और आज़ादी के बाद से जिनकी प्रतिभा के दम पर ‘क्लब’ में ‘चार चाँद’ जुड़ते रहे। लक्ष्मीकांत तिवारी, विद्यासागर, एएन० सप्रू, रमेशचंद श्रीवास्तव आदि इन नामों में है।


उसी ‘प्रेस क्लब’ की अस्मिता को नेस्तनाबूद करने की कोशिश की गई थी इसलिए रात से ही वे सब वहाँ जुटने लग गए थे। वे वहां पहुँच रहे थे और पहुँच कर आपस में एक दूसरे से सवाल कर रहे थे- आख़िर उन लोगों ने यह सब क्यों किया? गिरफ़्तार होने वाले संपादक का नाम विनोद शुक्ल था। वह उप्र से निकलने वाले ‘दैनिक जागरण’ अख़बार के लखनऊ अंक के संपादक थे। यूं वह बड़ा ‘तुम्मन ख़ा’ बनते थे। लड़कपन से ही बीएचयू के गुंडों की चपरखनात करते-करते वह ख़ुद को भी गुंडा होने का भ्रम पाल बैठे थे। आगे चलकर अपने चम्पुओं को हड़काते समय वह बड़े गर्व से कहते “दबंगई हमारे खून में बचपन से ही है।”


बताया जाता है कि पारिवारिक पृष्ठभूमि के हिसाब से वह ‘तीन में थे न तेरह में’ । उनके पिता बनारस के ‘आज’ अखबार में सामान्य कर्मचारी थे। वह उस तरह का दौर था कि संस्थान छोटे दायरे के होते थे और अनेक कर्मचारी मालिकानों के मुंहलगे बन जाते थे। इनके पिता का नाम भी ‘आज’ के स्वामी सत्येन्द्र गुप्त की ‘गुड बुक’ में आ गया था। बीएचयू के गुंडों के पिछलग्गू बनकर और ‘आज’ परिवार से जुड़ा होने के नाते छोटे से बनारस शहर में विनोद की भी पूछ होने लगी। आगे चलकर वह सत्येंद्र गुप्त के आगे-पीछे चरण-पादुका लेकर चलने वाले छोकरों में शुमार हो गए। कामयाब हो जाने के बाद शराब की मेज पर वह बड़े फ़ख्र से अपने चेले-चाटों को बताते थे कि ‘’भैयाजी (सत्येंद्र गुप्त) के ‘पीने- खाने’ का इंतज़ाम हम ही करते थे और यहीं से हम को शौक़ लगा।“


सत्तर के दशक की शुरुआत में जब कानपुर से ‘आज’ का प्रकाशन शुरू हो रहा था, इन्हें मैनेजर बनाकर कानपुर भेजा गया। बहुत जल्दी वह संपादकीय के अलावा मशीन मैनी, प्रिंटिंग, सर्कुलेशन, विज्ञापन और एडमिन- यानी कि ‘पीर बावर्ची भिश्ती खर’ के सारे हुनर सीख गए। वह एक कामयाब मैनेजर थे। आधा दशक पूरा होते-होते मालिकानों का निजाम बदला। अगली पीढ़ी के हमउम्र शार्दुल विक्रम गुप्त के साथ कुछ साल तो उनकी ठीक पटी लेकिन बाद में बिगड़ गयी। वह मानते थे कि कानपुर में ‘आज’ के जम जाने में सारी भूमिका उनकी हैं इसलिए इसके प्रबंधन में अंगुली करने का अधिकार किसी सेठ को नहीं है। युवा शार्दुल मानते थे कि ‘अंगुलीवाद’ का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ सेठ के पास होता है। 80 का दशक प्रारम्भ हुआ और वह सड़क पर थे। उनके साथ उनकी पूरी टीम भी सड़क पर थी। बाकी की कहानी शुरू में बताई जा चुकी है।


अपनी गेंगवारों की सफलता की एक के बाद एक सीढ़ी चढ़ते जाने की एवज में ‘जागरण’ से मिले भारी भरकम ‘पैकेज’ ने अलबत्ता उन्हें अभिजात्य बना दिया था। वह ‘संपादक’ भले ही कहे जाते हों, वस्तुतः वह प्रबंध तंत्र के कलपुर्ज़े थे। प्रबंधन ऐसे लोगों को आम की तरह तब तक निचोड़ता है जब तक उनमें रस होता है और उसके बाद चुसी गुठली की तरह वे कूड़ेदान में फेंक दिए जाते हैं। इनके साथ भी यही हुआ लेकिन उसका ज़िक्र आगे।


वह पत्रकार नहीं थे इसलिए ‘ प्रेस क्लब’ की सामाजिक गरिमा का उन्हें अहसास ही नहीं था। यही वजह है कि वह ‘प्रेस क्लब’ को हिक़ारत भरी निगाहों से देखते थे और यहाँ ‘आमतौर पर नहीं ‘बैठते’ थे। वह अमूमन हर शाम ‘जिमख़ाना क्लब’ में दिखते लेकिन कभी-कभार दिल्ली-मुंबई से आने वाले नामचीन लोगों (जिसमें हिंदी और अंग्रेजी के कतिपय संपादक भी शामिल हैं) का स्वागत वह बड़ी गर्म जोशी से फाइव स्टार ‘क्लार्क्स अवध’ में किया करते थे। ‘प्रेस क्लब में तो वह ‘वन्स इन अ वाइल’ होते थे- शहर के पत्रकारों का उड़ता-पड़ता जायज़ा लेने और अपना जलवा-जलाल क़ायम रखने।


जलवा अफरोज़ी की अप्रेल 1989 के शुरुआती हफ़्ते की यह ऐसी ही एक रात थी।
‘दारुलशफ़ा’ में 2-3 विधायकों से मिलते-मिलाते बातचीत करते, नोट्स आदि लेते पौने दस बज गए थे। मेरे साथ वीरेंद्र भट्ट थे। यह तय हुआ कि बाकी लोगों से कल मिला जायगा जल्द से ‘प्रेस क्लब’ पहुंचा जाय नहीं तो ‘बार’ बंद हो जाएगा। शीतल को वहीँ पहुँचने का टाइम दे रखा था। मैं तब ‘रविवार’ (आनंदबाजार पत्रिका प्रकाशन समूह, कलकत्ता) का लखनऊ (यूपी) संवाददाता था, शीतल पी सिंह ‘चौथी दुनिया’ (नयी दिल्ली) के लखनऊ स्थित संवाददाता और वीरेंद्र भट्ट बरेली के ‘विश्व मानव’ के राजधानी संवाददाता थे।


घुसते ही मुख्य हॉल में सामने की मेज पर विनोद शुक्ल दिखे। उनके साथ जयप्रकाश शाही थे। शाही लंबे समय तक जनसत्ता’ के यूपी संवाददाता रहे थे। कहा जाता है कि कुछ ‘गंभीर शिकायतों’ के बाद उन्हें गोरखपुर स्थान्तरित कर दिया गया था। विनोद शुक्ल के साथ उनकी खूब पटती थी लिहाज़ा वे वहां से त्यागपत्र देकर ‘दैनिक जागरण’ से जुड़ गए थे। उनके तीसरे साथी प्रभु झिंगरन थे जो मूलरूप से पीआईबी केडर में ‘दूरदर्शन’ में रहे थे लेकिन अब डेपुटेशन पर ‘इलाहाबाद बैंक’ के ज़ोनल ऑफिस में जनसम्पर्क का प्रभार संभाले हुए थे।


बाद में पता चला कि वे लोग ‘जिमख़ाना से पहले ही खासे ‘आकंठ’ होकर आये थे, यहाँ दोबारा पीने बैठ गए थे। शाही कहने को मेरे पडोसी थे लेकिन न जाने क्यूँ मुझे नापसंद करते थे। आज भी उन्होंने कुछ फिकरे मेरी तरफ उछाले। मैं, शीतल और भट्ट साइड पोर्टिको में बैठ गए थे। मैंने मुस्कराकर हल्का-फुल्का जवाब दे दिया।


समय कटता रहा। विनोद शुक्ल भी वहां मौजूद न जाने किन-किन पर क्या-क्या ‘बाण’ छोड़ रहे थे। शाही का टारगेट मैं और शीतल थे। शराब में अब हमने भी उन्हें ‘हाय -हेलो’ कहना शुरू कर दिया था। मुझे लगा ‘शाही विनोद की वजह से सीमाएं तोड़ रहा है लिहाज़ा दोनों को ठीक से जवाब दिया जाना चाहिए।‘


मैंने कहा “विनोद शुक्ल की चड्डी पहन के क्यों पायजामा फाड़े डाल रहा है शाही?” हमला क़रारा था, दोनों ज़ख़्मी हुए। बात तूतू-मैंमैं से और आगे बढ़ी। शाही ने शीतल पर हमला बोल दिया। हाथापाई शुरू हो गई। मैंने शाही को पकड़ा तो विनोद शुक्ल उसे बचाने मेरे ऊपर सवार हो गए। खींचातानी में एक दो लप्पड उन्हें भी लगे। तब तक वहां मौजूद उसामा तलहा, जावेद वगैरह आ गए और उन्होंने हाथापाई रुकवा दी। ये तीनों बड़बड़ाते हुए वहां से चले गए। ‘क्लब’ के जनरल सेक्रेटरी की हैसियत से उसामा ने चपरासी से गेट अंदर से बंद करने को कहा।


मुश्किल से 30 मिनट ही बीते थे कि मुख्य द्वार और साइड वाले रिटायरिंग रूम की खिड़कियों पर ताबड़तोड़ प्रहार होने लगे। कांच टूट कर गिर रहे थे। अँधेरा था लिहाज़ा कोई दिख नहीं रहा था। हममें से कई बुरी तरह से डर गए थे। हम सभी हैरान थे कि आखिर ‘क्लब’ पर कौन लोग हमला बोल रहे हैं और क्यों? ‘क्लब’ से भला किसकी रंजिश हो सकती है? हम सब के मन में यही सवाल था। काफ़ी देर बाद सामने मुख्य द्वार वाली साइड पर किसी के ऊंची आवाज़ में गाली बकने और “भैया पर किस मादर ….ने हाथ छोड़ा था” की आवाज़ सुंनाई दी। सभी लोगों की समझ में पूरा मंज़र आ गया।
कुछ देर बाद तोड़ा फ़ोड़ी खामोश हुई। कुछ ही मिनट गुज़रे थे कि सामने वाले प्रवेश द्वार से विनोद शुक्ल और शाही “ये सब किसने किया” पूछने के अबोध भाव से दाखिल हुए। उनके साथ आपराधिक छवि वाला एक भारी भरकम लड़का भी था। भट्ट चिल्ला ए “ये सब तुम्हारी ही कारस्तानी है।“ शाही ने भट्ट को गाली बकी। भट्ट ने शाही को पकड़ा। विनोद शुक्ल झपटकर भट्ट को पकड़ने लगा। मैं और शीतल विनोद पर टूट पड़े। आपराधिक छवि वाला लड़का मेरे ऊपर सवार होंने लगा। मैंने विनोद को छोड़ उसको पीटना शुरू कर दिया। शीतल भी विनोद को छोड़ उसी पर टूट पड़े। कुछ ही देर में लड़के के सभी कपडे-लत्ते फट गए। उसका जूता उतर गया। वह चड्डी पहने नंगे पाँव ही टूटे कांच की चादर पर चढ़ता गेट की तरफ भागा। हम लोगों ने उलट कर विनोद शुक्ल और जयप्रकाश शाही की पिटाई फिर शुरू कर दी। किसी ने उसामा से कहा “कंट्रोल रूम फ़ोन करो!”


यह लैंड लाइन युग था और ‘प्रेस क्लब’ में 1 रुपये के सिक्के वाला पीसीओ फोन था। कंट्रोल रूम फ़ोन मिल नहीं रहा था। भट्ट ने चीख़ कर कहा “होम मिनिस्टर के यहां फ़ोन करो!‘ सुशीला रस्तोगी जी किसी शादी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए घर से निकली हुई थीं। उसामा ने उनके पीए से कहा मैडम को वायरलेस से खबर दो, प्रेस क्लब पर हमला हुआ है। बाद में पता चला कि होम मिनिस्टर ने ख़बर सुनते ही एसएसपी को नींद से जागकर आदेश दिया “फ़ौरन स्पॉट पर पहुँच कर मुझे रिपोर्ट करें।“ एसएसपी ने एसपी सिटी को जगाया। एसपी सिटी ने सीओ क़ैसरबाग़ और स्पेशल बटालियन यूनिट को। रात के 12 बजने जा रहे थे। लखनऊ की सड़कों पर अलग-अलग दिशाओं से पुलिस की गाड़ियां ‘प्रेस क्लब’ की और सरपट भाग रही थीं। मैं और शीतल इस सारे घटनाक्रम से बेख़बर विनोद शुक्ल और शाही पर लात घूंसों से जुटे हुए थे। वे दोनों बेदम हो चुके थे और आख़िरकार हम भी ध्वस्त हो गए। उसामा ने आकर हमें पकड़ कर अलग किया। “रुक जाओ!” वह गरजे “पुलिस आ रही है।


सामने वाले एंट्री गेट से पुलिस का क़ाफ़िला अंदर दाखिल हुआ। एसएसपी, एसपी सिटी, सीओ, इन्स्पेक्टर, आधा दर्जन सब इन्स्पेक्टर, चार दर्जन से ज़्यादा पुलिस वाले। मैं और उसामा एसएसपी को पूरा विवरण सुनाते रहे। कोई 10 मिनट बाद पिछले एंट्री गेट से एक भीड़ ‘प्रेस क्लब’ में दाखिल हुई। सबसे आगे वाले को शीतल ने पहचाना “अरे ये तो वही है जो सामने वाला गेट तोड़ रहा था।” हुआ यह कि ‘प्रेस क्लब’ से मार खाकर अपराधी सा दिखने वाला लड़का लहूलुहान पाँव लिए ‘जागरण’ ऑफिस पहुंचा और उसने सिसकते हुए बमुश्कल सिर्फ़ 3 शब्द बोले- ”भैया घिर गए….!” बाक़ी की पूरी कहानी उन लोगों ने समझ ली। आनन-फानन में ‘मसल टीम’ को इकठ्ठा किया गया और अपने-अपने हथियार लेकर टीम ‘यलगार’ को निकल पड़ी। वे चूंकि पिछले एंट्री गेट से दाखिल हुए थे इसलिए उन्हें पहले वाले एंट्री गेट से पहुंची पुलिस का आभास नहीं हो पाया और वे पूरे-पूरे घिर गए। सभी को लपेटा गया। बाहर उनकी 2 जीपें थीं। तलाशी हुई तो उसमें हॉकी, डंडे, सरिया अदि मिलीं। सभी को बटालियन के ट्रक में बैठा कर थाना क़ैसरबाग़ लाया गया। उन्हें बाद में कोर्ट से ज़मानत मिली। विनोद शुक्ल की ‘जागरण’ प्रबंधन में पोज़िशन क़ाफी कमज़ोर हो गयी। इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि लखनऊ में आगे से दोनों अख़बारों की हिंसक गैंगवार हमेशा के लिए ख़त्म हो गयी। दोनों जगहों की ‘मसल’ टीम के हौसले चिन्दी-चिन्दी बिखर चुके थे।


इस घटना के 43 साल बाद हुई एक बातचीत में मैंने शीतल पी सिंह और वीरेंद्र भट्ट से यूं ही पूछ लिया “यार यह बताओ, उस रात अगर पुलिस ठीक टाइम पर न पहुँघी होती, तो हम आज कहाँ होते?”
कहीं नहीं प्यारे…….. ।” भट्ट ने मासूमियत से जवाब दिया। “……..भैंसाकुंड (लखनऊ का श्मशान गृह) की पवित्र राख बनकर हवा के साथ चिलग़ोज़ियाँ कर रहे होते।”


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