असल मुद्दों से भटकाने की कोशिश..

बड़े पदों के साथ बड़ी जिम्मेदारियां भी आती हैं, जिन्हें निभाने के लिए आपको स्वार्थ के दायरे से ऊपर उठते हुए व्यापक नजरिया अपनाना पड़ता है, नैतिकता की यह जरूरी बात भाजपा के कुछ लोगों को समझना बहुत जरूरी है। वैसे तो पिछले आठ सालों में ऐसे कई उदाहरण देश के सामने प्रस्तुत हुए हैं, जब जरूरी चीजों को छोड़कर अनावश्यक मुद्दों में जनता को उलझाने की कोशिश की गई है। लेकिन हाल-फिलहाल जिस तरह ताजमहल और कुतुबमीनार को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, उससे भाजपा की सच्चाई से ध्यान भटकाने वाली रणनीति को समझा जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि ताजमहल में बने 22 कमरों को खोलने की मांग को लेकर हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता, बीजेपी की अयोध्या इकाई के मीडिया प्रभारी, रजनीश सिंह ने दावा किया था कि बरसों से बंद पड़े इन कमरों में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां और कई शिलालेख मौजूद हैं।

रजनीश सिंह ने यह दावा भी किया था कि ताजमहल के बारे में झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है और वह सच्चाई का पता लगाने के लिए 22 कमरों में जाकर शोध करना चाहते हैं। याचिका में ये भी मांग की गई थी कि ताज परिसर से कुछ निर्माण और ढांचे हटाए जाएं ताकि पुरातात्विक महत्व और इतिहास की सच्चाई सामने लाने के लिए सबूत नष्ट न हों। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी और एक तरह से फटकार लगाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ताजमहल किसने बनवाया ये तय करना कोर्ट का काम नहीं है। ऐसे तो कल आप जजों से चेंबर में जाने की मांग करेंगे। जस्टिस डीके उपाध्याय ने याचिकाकर्ता को नसीहत देते हुए कहा कि पीआईएल व्यवस्था का दुरुपयोग ना करें। इसका मजाक ना बनाएं। ताजमहल किसने बनवाया पहले जाकर रिसर्च करो। यूनिवर्सिटी जाओ, पीएचडी करो तब कोर्ट आना। रिसर्च से कोई रोके तब हमारे पास आना। अब इतिहास को आपके मुताबिक नहीं पढ़ाया जाएगा।

अदालत की इस सख्त टिप्पणी से भाजपा सांसद और जयपुर के पूर्व राजघराने की सदस्य दीया कुमारी को भी जवाब मिल गया होगा। क्योंकि उन्होंने भी बुधवार को दावा किया था कि ताजमहल की संपत्ति उनके परिवार की है। उन्होंने ताजमहल पर दायर याचिका का समर्थन करते हुए कहा था कि अच्छा है किसी ने आवाज उठाई है। अगर दस्तावेजों की जरूरत होगी तो पोथीखाने से दस्तावेज उपलब्ध कराएंगे। पढ़ने-लिखने और शोध करने की सलाह याचिकाकर्ता रजनीश सिंह को ही नहीं, दीया कुमारी को भी दी जानी चाहिए। कम से कम राजपरिवार की सदस्य होने के नाते उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि मुगलों और राजपूतों के संबंध किस तरह के रहे हैं। और उस दौर में किस तरह धर्म को परे रखकर शासन के लिए, सत्ता के लिए रिश्ते बनाए जाते थे।

अदालत की पढ़ाई और शोध करने वाली टिप्पणी का यह अर्थ कतई नहीं है कि कम पढ़े-लिखे या असाक्षर लोग जनहित याचिकाएं दायर नहीं कर सकते। बल्कि इसे इस तरह समझने की जरूरत है कि अक्सर अपनी सुविधा के लिए इतिहास की गलतबयानी करने वाले लोग जब जनहित के नाम पर याचिका दायर करते हैं, तो वे अदालत का कीमती वक्त खराब करते हैं और इसके साथ ही जनहित के असल मुद्दों से देश का ध्यान भटकाते हैं। और उदाहरण तो इस बात के भी मौजूद हैं कि उच्च शिक्षित और बड़ी योग्यताओं से संपन्न ओहदेदार लोग भी जनता की गंभीर समस्याओं पर चिंतन की जगह सोशल मीडिया पर अनोखे वीडियो भेजने-देखने का काम कर रहे हैं। अभी पुड्डूचेरी की राज्यपाल किरण बेदी इसी बात के लिए आलोचकों के निशाने पर आई हैं।

दरअसल किरण बेदी ने कई सारे ईमोजी के साथ एक वीडियो ट्वीट किया है, 15 सेंकड के इस वीडियो में दिख रहा है कि एक काफी बड़ी शार्क मछली समुद्र की सतह से बाहर आती है और एक हेलिकॉप्टर को पानी में खींच ले जाती है। वीडियो के साथ दिए कैप्शन में लिखा है कि ‘नेशनल ज्योग्राफिक ने इसके लिए 1 मिलियन डॉलर का भुगतान किया है। किरण बेदी ने खुद इस वीडियो के साथ कोई शाब्दिक टिप्पणी नहीं की, लेकिन ये वीडियो उन्होंने क्यों और किसके लिए डाला, ये समझ से परे है। वैसे भी सच्चाई ये है कि 2017 में बनी फिल्म फाइव हेडेड शार्क अटैक से इस वीडियो को लिया गया है। इस तरह का वीडियो डालने पर किरण बेदी खूब ट्रोल हो रही हैं, उनकी योग्यता पर सवाल भी उठाए गए। लेकिन अब उन्होंने अपनी सफाई में कहा है कि भले ही वीडियो एडिटेड हो, लेकिन काबिले तारीफ है। कृपया इसे इस चेतावनी के साथ ही देखें।

अभी ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिन पर देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी और राज्यपाल पद पर बैठी किरण बेदी चेतावनी दे सकती हैं। मसलन वे लड़कियों को आत्मसुरक्षा के उपाय बता सकती हैं। आम लोगों को संविधान की जानकारी दे सकती हैं, ताकि वे धर्म और जाति के झगड़ों में न पड़ें। वे प्रदूषण, कुपोषण, भुखमरी या इसी तरह की बहुत सी समस्याओं पर निपटने के अपने सुझाव दे सकती हैं। लेकिन इन सबकी जगह किरण बेदी संपादित वीडियो दिखाकर अनावश्यक रोमांच पैदा करने की कोशिश कर रही हैं। जिससे क्षणिक मनोरंजन के अलावा कुछ और हासिल नहीं होने वाला। मनोरंजन भी जीवन की खुशहाली के लिए जरूरी है। लेकिन उसके लिए देश में कई और योग्य लोग बैठे हैं। किरण बेदी जिस पद पर बैठी हैं, वहां उन्हें उसकी गरिमा के अनुरूप ही काम करना चाहिए।

रजनीश सिंह, दीया कुमारी, किरण बेदी, अलग-अलग पदों पर बैठे ये लोग चाहें तो अपने प्रभाव का इस्तेमाल अन्य बेहतर कार्यों के लिए कर सकते हैं। मगर उनकी प्राथमिकता और राजनीति क्या है, ये समझना कठिन नहीं है।

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