भटकते सपने और उनका दर्द..

-सर्वमित्रा सुरजन॥

अब तो तुम समझो कि अनारकली जैसी हालत केवल तुम्हारी नहीं है, इन बच्चों की भी है। इन बच्चों को भी सालों-साल अधर में लटका कर रखा जाता है। जो कमजोर होते हैं, वो लटकने को जीवन की नियति बना लेते हैं और जो हिम्मत जुटाकर विरोध करते हैं, उनके सामने जेल के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। देश के मजदूरों औऱ किसानों का भी यही हाल बना दिया गया है। या तो वे मनमाने नियमों-शर्तों के मुताबिक काम करें या फिर फांसी के फंदे को गले लगा लें। लड़कियों की हालत भी तुम्हारी तरह ही हो गई है।

तुम कौन हो?
मैं सपना हूं।
सपना हो तो फिर इधर-उधर क्यों भटक रहे हो? जाओ किसी की आंखों में रहो या फिर हकीकत बन के जमीन पर उतरो।
वही तो नहीं हो पा रहा। इस सरकार में मेरी हालत अनारकली जैसी हो गई है।
कौन, वही मुगले आज़म वाली?
हां।

क्या तुम भी अब किस्से-कहानी की बात करने लगे। सपना हो, इसका ये मतलब तो नहीं कि हकीकत से कोई वास्ता ही नहीं रहे।
मैं तो खुद हकीकत से रिश्ता जोड़ना चाहता हूं। लेकिन मैंने कहा न, मेरा हाल अनारकली जैसा बना दिया गया है।
मतलब?

मतलब ये कि, साहब कहते हैं कि हम तुम्हें मुकम्मल होने नहीं देंगे और हमारे भाषण तुम्हें कहीं खोने नहीं देंगे।
मतलब तुम दिखाए तो जाओगे, लेकिन कभी पूरे नहीं होगे?
हां, बिल्कुल सही समझे।
लेकिन, कैसे, कोई मिसाल दो।

अब एक-दो हो तो दूं भी। यहां तो हर रोज नए सपनों को खड़ा करने और फिर उन्हें तोड़ने की बात होती हो। आपने सोशल मीडिया पर इन दिनों चल रहे कुछ पुराने वीडियो देखे होंगे। जिसमें साहब 2014 के पहले वाली सरकार को कितना भला-बुरा कहते हैं, रूपए की गिरती कीमत को लेकर जवाब मांगते हैं, उनकी चुप्पी पर ताना देते हैं, कहते हैं कि हम भी सत्ता में हैं, हमें पता है कि रूपया अपने आप नीचे नहीं गिरता, दिल्ली सरकार की उम्र से रूपए की कीमत की तुलना करते हैं औऱ तंज कसते हैं कि कौन कितना नीचे गिरेगा, इसकी होड़ चल रही है।

लेकिन अभी हाल देखिए, रूपया एक डॉलर के मुकाबले 77 से नीचे गिर गया है। पर दिल्ली सरकार तो अब भी चुप है। उसे अब कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि रूपए की कीमत और नैतिक मूल्यों में नीचे गिरने की प्रतियोगिता चल रही है और दोनों देश का नुकसान करने पर तुले हैं। कहां तो देश को खुशहाल, समृद्ध बनाने का सपना दिखाया गया था। अब सपनों के चकनाचूर होने पर कोई उफ भी नहीं करता।
लेकिन इसमें तुम अनारकली कैसे बने?

वही तो, या तो साहब मान ले कि अच्छे दिनों की जगह बुरे दिन आ गए, तो मैं खुद को दीवार में चुना हुआ मान लूंगा। या फिर अपने भाषणों में विकास के दावे करना छोड़ दें। तो मैं खुद को टूटा हुआ मान लूंगा। लेकिन अभी तो मैं न इधर का हूं, न उधर का।

तुम्हारी बात सही है, लेकिन क्या है न हमारे साहब फकीर आदमी हैं। उनके पास हज़ारों करोड़ का हवाई जहाज, गाड़ी, आलीशान घड़ी-चश्मे और कई जोड़ी कपड़ों के बावजूद एक झोला हमेशा तैयार रहता है, जिसे उठाकर चल देने की बात वो करते हैं। अब फकीर आदमी के लिए रूपए-पैसे का क्या मोल, उनके लिए तो हर चीज मोह-माया है। इसलिए उनसे रूपए की कीमत की बात करना नाइंसाफी होगी। देशद्रोह तो हो नहीं सकता, क्योंकि अब उस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है।

ठीक है, साहब फकीर हैं, उनके पास झोला भी है, रूपए की बात उनसे न करें। लेकिन क्या इस सरकार में सब ऐसे ही हैं। क्या सबके पास झोला है। और अगर सरकार झोले के भरोसे है, तो क्या देश कटोरे के भरोसे रहेगा। क्या इस सरकार में ऐसा कोई नहीं है, जो रूपए की कीमत और महत्व समझता हो। आखिर एक सौ तीस करोड़ की आबादी का सवाल है। इनमें से दो-तीन प्रतिशत लोगों को छोड़ दें, तो बाकी लोग तो मेरे यानी सपनों के भरोसे ही जीते हैं न। क्या इन लोगों की भी कोई फिक्र नहीं कर रहा कि आखिर ये सब हर रोज़ बढ़ती महंगाई में क्या खाएंगे, कैसे जिएंगे ?

उसकी चिंता तुम न करो। इस देश में लोगों का हाल अभी ऐसा है कि रोटी मिले न मिले, भगवान के मिलने की उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं। हाथ में रोजगार न देकर, ढोलक-मंजीरा दे दो, फिर देखो ये लोग खुशी-खुशी भजन गाएंगे। वो दिन हवा हुए, जब भूखे पेट भजन न होए गोपाला वाला मुहावरा चलता था। इस राज में तो भूखे पेट भजन करवाने का सफल प्रयोग कर लिया गया है। और अब इस प्रयोग का दायरा बढ़ाया जा रहा है। तुम देखो अयोध्या के बाद काशी-मथुरा की ही बारी नहीं आई, ताजमहल-कुतुब मीनार भी लाइन में लग चुके हैं। एक-एक करके सबको निपटाया जाएगा। और इस उन्माद के आगे जनता को रोजगार नहीं मिल रहा, मनरेगा गड्ढे में जा रहा है और मध्याह्न भोजन नमक में घुल रहा है, या सीमेंट-गिट्टी से बना पुल हवा के झोंके में उड़ रहा है, या परीक्षा के पर्चे व्यवस्था में भ्रष्टाचार की दरार से रिस कर लीक हो रहे हैं, इन सब बातों की धर्म के आगे कोई औकात नहीं रह गई है।

हां, ये बात सही है। आम जनता के लिए जीवन में हर तरह से तकलीफ बढ़ रही है और फिर भी हनुमान चालीसा और अजान के शोर पर ही आपस में झगड़े हो रहे हैं। नयी पीढ़ी के लिए तो मुश्किलें और चुनौतियां और अधिक हैं। क्योंकि उनके पढ़ने और नौकरी करने के मौके भी कम कर दिए गए हैं। अभी बिहार में बीपीएससी की परीक्षा रद्द कर दी गई, क्योंकि परीक्षा के दौरान ही पर्चा सोशल मीडिया पर लीक हो गया और फिर सरकार ने जांच कमेटी बिठाकर परीक्षा रद्द करने का फैसला सुना दिया। अभी परीक्षा का पहला ही चरण था, इसके बाद मेन्स और इंटरव्यू की तैयारी में विद्यार्थी जुटते। लेकिन ये मौका ही उन्हें नहीं मिला। वैसे भी कुल जमा 802 सीटों के लिए पांच लाख से ऊपर छात्रों ने परीक्षा दी थी।

यानी किसी भी तरह लाखों बच्चों का दिल टूटना ही था, क्योंकि सफल तो केवल 802 लोग होते। पर कम से कम ये संतोष रहता कि गर्मी, महंगाई और नौकरी के लिए मिलते तानों के बीच परीक्षा दे तो दी। मगर अब ये बच्चे भी न इधर के रहे, न उधर के। देश के औऱ भी राज्यों में इसी तरह परीक्षाओं में हर साल बच्चों से खिलवाड़ होता जा रहा है। मानो उनके ज्ञान का नहीं, सब्र का इम्तिहान लिया जा रहा है कि वे किस हद तक सरकार की उपेक्षा को बर्दाश्त कर पाते हैं। वैसे इन बच्चों के साथ भी एक तरह से प्रयोग ही हो रहा है कि इन्हें पढ़ाई औऱ रोजगार से दूर रखकर भी चुनावी और धार्मिक रैलियों में व्यस्त रखने में कितना खर्च आएगा औऱ कितने वोटों का मुनाफा होगा।

अब तो तुम समझो कि अनारकली जैसी हालत केवल तुम्हारी नहीं है, इन बच्चों की भी है। इन बच्चों को भी सालों-साल अधर में लटका कर रखा जाता है। जो कमजोर होते हैं, वो लटकने को जीवन की नियति बना लेते हैं और जो हिम्मत जुटाकर विरोध करते हैं, उनके सामने जेल के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। देश के मजदूरों औऱ किसानों का भी यही हाल बना दिया गया है। या तो वे मनमाने नियमों-शर्तों के मुताबिक काम करें या फिर फांसी के फंदे को गले लगा लें। लड़कियों की हालत भी तुम्हारी तरह ही हो गई है। बात तो हुई थी बेटियों के पढ़ने और बढ़ने की, लेकिन कुछ लोगों की बुरी नीयत तमाम लड़कियों पर भारी पड़ गई है। साहब और साहब के मुसाहिब सभी नए-नए नारे गढ़ने में लगे हैं, और पुराने नारों की धज्जियां उड़ रही हैं।

चलो मान लेता हूं कि अकेले मैं ही अनारकली नहीं बना दिया गया हूं। साहब-ए-आज़म के राज में देश का हाल भी मेरी तरह हो गया है। लेकिन जाते-जाते पाश से माफी मांगते हुए उनकी कविता की पंक्ति बदलना चाहता हूं। सबसे खतरनाक सपनों का मर जाना नहीं, सपनों को दीवार में चुन दिया जाना होता है।

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