हनुमान के जलाए बिना भी जल रहा है श्रीलंका..

-सुनील कुमार॥

हिन्दुस्तान में इक्कीसवीं सदी में भी पौराणिक काल में जीने वाले कुछ लोगों को श्रीलंका की आज की दिक्कतों को लेकर मजा आ रहा होगा कि रावण की लंका जल रही है, लेकिन जो लोग लोकतंत्र को समझते हैं, और जो लोग रामायण काल से निकलकर इक्कीसवीं सदी में आ चुके हैं, वे जानते हैं कि पड़ोस की राजनीतिक अस्थिरता और वहां का आर्थिक संकट खुद अपने देश को नुकसान पहुंचाने के अलावा कुछ नहीं करता। इसलिए श्रीलंका की आज की तबाही का बहुत बड़ा बोझ तरह-तरह से हिन्दुस्तान पर भी पड़ेगा जो कि आज इस छोटे से टापू-देश को जिंदा रहने में मदद कर रहा है। श्रीलंका के साथ रामायण काल के संघर्ष की कहानी अलग रही, अभी तो पिछले दशकों में हिन्दुस्तान ने लगातार श्रीलंका का साथ दिया है, और जब वहां सिंहलों और तमिलों के बीच गृहयुद्ध चल रहा था तब भी हिन्दुस्तानी फौजों ने जाकर वहां की सरकार की मदद की थी, और अमन-बहाली में हाथ बंटाया था।

श्रीलंका के ताजे हालात बहुत ही फिक्र के हैं, देश के लोगों की रोजमर्रा की सबसे बुनियादी जरूरतों के सामान भी वहां नहीं हैं, सरकार के पास पैसे नहीं हैं, जहां-जहां से कर्ज मिल सकता है, सब लिया जा चुका है, और अब पड़ोस के भारत, बांग्लादेश, और चीन की मदद से श्रीलंका के लोग किसी तरह जिंदा हैं। हालात सरकार के काबू के बाहर हो चुके हैं, लोगों का भरोसा नेताओं पर से उठ गया है, कल राष्ट्रपति के भाई प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया है, और यह सत्तारूढ़ कुनबा देश की इस बदहाली के लिए अकेला जिम्मेदार करार दिया जा रहा है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, और दूसरे दो मंत्री, पूरा देश इसी कुनबे के शिकंजे में था, और इसकी मनमानी ने आज देश को डुबाकर रख दिया है। लेकिन इस राजपक्षे परिवार को कोसने के अलावा दो-तीन और बातों को भी सोचना-समझना जरूरी है जो कि श्रीलंका की आज की तबाही के पीछे जिम्मेदार रही हैं। जिस कोरोना-लॉकडाऊन ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को तबाह किया, उसने श्रीलंका से भी पर्यटन-उद्योग तकरीबन छीन ही लिया। सैलानियों से होने वाली कमाई पर देश बहुत हद तक टिके रहता था, और वह एक तो कोरोना की वजह से गायब हुई, दूसरा 2019 में ईसाई त्योहार ईस्टर के दिन श्रीलंका में चर्चों और होटल पर हुए आतंकी हमलों में ढाई सौ से अधिक लोग मारे गए थे, और पांच सौ से अधिक जख्मी हुए थे। इसने भी कोरोना के पहले ही श्रीलंका से पर्यटक छीन लिए थे। दूसरी बात यह कि श्रीलंका के सनकी प्रधानमंत्री महिन्दा राजपक्षे ने पिछले बरस अचानक यह फैसला लिया कि अब देश में कोई भी रासायनिक खाद नहीं आएगा, और सिर्फ आर्गेनिक खाद इस्तेमाल किया जाएगा। बिना किसी वैज्ञानिक और आर्थिक विश्लेषण के लिया गया यह सनकी फैसला श्रीलंका के अनाज उत्पादन की कमरतोड़ गया, और देश भर में किसानों और ग्राहकों दोनों में दहशत फैल गई, और कीमतें अंधाधुंध बढ़ गईं। अब हालत यह है कि किसानी के लिए न रासायनिक खाद है, न आर्गेनिक खाद है, और न ही ट्रैक्टर या पंप के लिए देश में डीजल रह गया है। लोगों के पास बच्चों को पिलाने के लिए दूध नहीं रह गया, अनाज नहीं रह गया, बिजली नहीं है, और हिन्दुस्तान से पहुंचने वाली मदद को देश के दूसरे हिस्सों में पहुंचाने के लिए ट्रकों के लिए डीजल भी नहीं है।

श्रीलंका में ऐसी तबाही की नौबत उस वक्त भी नहीं हुई होगी जब रामायण के कथा के मुताबिक हनुमान वहां आग लगाकर लौटे थे। आज हालत यह है कि वहीं की जनता ने प्रधानमंत्री के एक पारिवारिक घर को आग लगा दी है, भूखी जनता सडक़ों पर है, और रात भर में पांच मौतें हो चुकी हैं। कल जब सत्तारूढ़ पार्टी के एक सांसद को लोगों ने घेर लिया, तो पहले तो उसने भीड़ पर गोलियां चलाईं जिनमें एक व्यक्ति मारा गया, और फिर बुरी तरह घिर जाने के बाद उस सांसद ने अपने आपको गोली मार ली।

श्रीलंका की इस मुसीबत का कोई मुश्किल इलाज भी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों से जितना कर्ज श्रीलंका ले चुका है, उसके बाद उनसे कुछ और पाने की कोई उम्मीद नहीं है। भारत-बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के मदद करने की भी एक सीमा है, और वह भी अधिक दूर नहीं है। चूंकि हिन्दुस्तान का तमिलनाडु श्रीलंका के एकदम करीब है, और श्रीलंका में एक बड़ी तमिल आबादी है, और चूंकि उन तमिलों की मदद करना तमिलनाडु में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है, इसलिए वैध या अवैध तरीके से इन शरणार्थियों का तमिलनाडु आना जारी रहेगा, और यह भारत पर एक बड़ा बोझ भी रहेगा। इस नौबत में यह भी सोचने की जरूरत है कि क्या इन लोगों में से भारत में शरण मांगने वाले लोगों की कोई जगह यहां बन पाएगी क्योंकि अभी दो दिन पहले की ही खबर है कि पाकिस्तान से आए हुए सैकड़ों हिन्दुओं को भारत में नागरिकता नहीं मिल पाई, और उन्हें वापिस पाकिस्तान जाना पड़ा। ऐसे में श्रीलंका से आने वाले तमिल शरणार्थियों का भारत में क्या भविष्य होगा यह सोच पाना बड़ा मुश्किल है। यह भी है कि भारत अपनी इस ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी से मुंह भी नहीं चुरा सकेगा, जैसा कि उसने म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों के बारे में किया है। श्रीलंका से आ रहे तमिल लोग भारत के तमिलनाडु के लोगों के स्वजातीय हैं, और उनको अनदेखा करना भारत के लिए मुमकिन नहीं रहेगा।

आज श्रीलंका के भयानक हालात का कोई इलाज नहीं दिख रहा, लेकिन भारत पर उसका बोझ जरूर दिख रहा है। यह ऐसा मौका है जब भारत को पड़ोसी की मदद करने के अलावा अपनी फौजी रणनीति के तहत भी श्रीलंका का साथ देना होगा, क्योंकि अगर वह साथ नहीं खड़े रहा तो श्रीलंका का चीन के और करीब चले जाना तय रहेगा, जो कि हिन्दुस्तान को आज दी जा रही मदद के मुकाबले अधिक महंगा पड़ेगा। आने वाले कई महीने श्रीलंका इस नौबत से उबरने वाला नहीं है, लेकिन उसकी मिसाल ने बाकी देशों के सनकी नेताओं के मनमाने फैसले लेने के नुकसान की तरफ दुनिया का ध्यान खींचा है, और यह दुनिया के लिए एक बड़ी सबक है।

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