बिना ऑनर वाले समाज में लोकप्रिय ऑनर-किलिंग

-सुनील कुमार॥

हैदराबाद में अभी एक नए किस्म का लवजिहाद हुआ। लडक़ी मुस्लिम थी, और लडक़ा हिन्दू धर्म का दलित। दोनों ही गरीब भी थे, और कॉलेज में पढ़ते हुए मोहब्बत हुई, और लडक़ी के भाई की मर्जी के खिलाफ जाकर इन दोनों ने शादी कर ली। हिन्दुस्तान में आमतौर पर मुस्लिम लडक़े और हिन्दू लडक़ी की शादी को हिन्दू संगठनों ने, और भाजपा ने लवजिहाद का नाम दिया है, लेकिन यहां मामला उल्टा था। शादी के कुछ दिनों के भीतर ही लडक़ी के भाई ने अपने एक रिश्तेदार के साथ मिलकर इस दलित बहनोई को खुली सडक़ पर लोगों के बीच मार डाला। बहन देखती रह गई, रोकती रह गई, लेकिन चाकू के हमले तब तक जारी रहे जब तक वह मर नहीं गया।

हिन्दू लडक़ी के मुस्लिम लडक़े से शादी करने पर उसका धर्म बदल जाने का एक मुद्दा रहता है, और कुछ मामलों में खानपान का भी मुद्दा रहता है। हिन्दू समाज का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिमों को नीची नजर से भी देखता है, इसलिए ऐसी शादी को भी सामाजिक अपमान मान लिया जाता है, और हर बरस ऐसे कई कत्ल होते हैं जिन्हें मीडिया में ऑनर-किलिंग लिखा जाता है, और जिनसे किसी का भी ऑनर जुड़ा नहीं रहता। लेकिन इस मामले में मुस्लिम और दलित परिवार के लडक़े-लड़कियों के बीच सामाजिक प्रतिष्ठा का इतना बड़ा मुद्दा शायद न रहा हो, लेकिन लडक़ी के भाई को बहन का दूसरे धर्म में शादी करना नहीं सुहाया, और उसने बहन को विधवा कर दिया, और खुद जेल चले गया।

हिन्दुस्तान में जितने किस्म की ऑनर-किलिंग देखी जाए, वे सबकी सब लड़कियों और महिलाओं को लेकर ऑनर, यानी सम्मान, की एक जनधारणा से जुड़ी रहती हैं। किसी लडक़ी या महिला से बलात्कार हो तो बलात्कारी के परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा कम हो या न हो, बलात्कार की शिकार के परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा खत्म ही मान ली जाती है। पोशाक और रहन-सहन को लेकर हजार किस्म की बंदिशें लड़कियों और महिलाओं पर ही लगाई जाती हैं, परिवार से लेकर स्कूल-कॉलेज तक उनके लिए नियम बनाए जाते हैं, और खाप पंचायतें यह तय करती हैं कि लड़कियों को मोबाइल फोन इस्तेमाल न करने दिए जाएं, उन्हें जींस न पहनने दिया जाए। हिन्दुस्तानी मर्दों के एक बड़े हिस्से ने अपने परिवार और अपनी जात-बिरादरी की लड़कियों और महिलाओं के लिए एक तालिबान जाग उठता है, और तरह-तरह की बंदिशें लगाने लगता है।

इस देश की बहुत सी जिम्मेदार और ताकतवर कुर्सियों पर बैठे हुए मंत्री, केन्द्रीय मंत्री, और मुख्यमंत्री तक महिलाओं को लेकर हिंसक और दकियानूसी बातें करते हैं, और उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक साबित करने की फूहड़ कोशिश करते हैं। इस मामले में अधिकतर राजनीतिक दलों के लोग बढ़-चढक़र मुकाबला करते हैं, और बलात्कार की शिकार लड़कियों पर लांछन लगाने में ममता बैनर्जी जैसी महिला नेता भी पीछे नहीं रहतीं जिन्होंने इस किस्म की घटिया और हिंसक बातों को अपनी आदत में शुमार कर लिया है। अकेले मनोहर लाल, या योगी आदित्यनाथ को क्यों कोसा जाए जब संघ परिवार और भाजपा के बाहर के आजम खान सरीखे तथाकथित समाजवादी नेता भी बलात्कार की शिकार बच्ची की नीयत पर शक करके उसे राजनीतिक साजिश का हिस्सा करार देते हैं, और सुप्रीम कोर्ट की लात पडऩे पर बिलबिलाते हुए मजबूरी में माफी मांगते हैं।

दो दिन पहले हैदराबाद में जिस तरह की एक मुस्लिम नौजवान ने अपने बहनोई को मारकर बहन को विधवा कर दिया है, उसकी सोच पर मुस्लिम समाज के भीतर की वह कट्टरता तो हावी रही ही होगी जो कि मुस्लिम लडक़ी को दूसरे, तीसरे, या चौथे दर्जे का इंसान करार देती है, बल्कि उसके साथ-साथ उसके दिमाग पर देश का यह माहौल भी हावी रहा होगा कि परिवार की लडक़ी अगर अपनी मर्जी से ऐसा बड़ा फैसला लेती है तो वह भी पूरे परिवार के लिए अपमानजनक है, और उसकी सजा दी जानी चाहिए।

लोगों के बीच अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की धारणा इतनी मजबूत है, अपने धर्म, अपनी जाति, अपनी संपन्नता, और ताकत का अहंकार इतना बड़ा है कि वे परिवार की लडक़ी के किसी प्रेमप्रसंग, या पसंद की शादी पर सजा देने के लिए खुद ही जुर्म करते हैं, तथाकथित ऑनर-किलिंग के मामलों में अहंकार इतना बड़ा रहता है कि वे भाड़े के हत्यारे भी नहीं ढूंढते, और अपने हाथों हिसाब चुकता करके अपनी खोई इज्जत वापिस पाने की कोशिश करते हैं। यह बात भी तय है कि सोचे-समझे ऐसे कत्ल के पहले इन लोगों को यह भी अहसास रहता होगा कि इसके बाद वे कई बरस कैद में रहेंगे, या उम्रकैद, या फांसी भी हो सकती है, लेकिन इनका अहंकार ऐसी सजा के खौफ से भी ऊपर रहता है।

ऐसे मामलों में सरकार, पुलिस, और अदालतें कर भी क्या सकते हैं? हर किसी की हिफाजत के लिए उनके साथ पुलिस तो लगाई नहीं जा सकती, और ऐसे कत्ल के बाद गिरफ्तारी और सजा दिलवाने की बात ही सरकार के काबू की बात रहती है। लेकिन जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक ऐसी हत्याएं नहीं रूक सकतीं। जब लोग जानते-समझते कत्ल करते हैं, थाने जाकर खुद अपने को पुलिस के हवाले कर देते हैं, सजा काटने को वे इज्जत वापिस पाना समझते हैं, तो फिर उन्हें रोकना मुमकिन नहीं है।

फिर इस मामले में जिस हैदराबाद शहर की बात है, वह एक विकसित और बड़ा शहर है। ऐसे में यहां पर शहरीकरण के थोड़े से असर की उम्मीद की जा सकती थी, लेकिन वह शायद इसलिए नहीं हो पाई कि बहुत बड़ी मुस्लिम आबादी के चलते हुए यह शहर मुस्लिम सोच का एक कबीला भी बना हुआ है, और धर्म के सबसे कट्टर लोगों का जमावड़ा ऐसे में हो जाता है। जब किसी धर्म के लोग कबीलाई अंदाज में बड़ी संख्या में इक_ा रहते हैं, तो वह धर्म की कट्टरता को बढ़ाने का काम करता है, कट्टरता को घटाता नहीं है। किसी भी धर्म, जाति, पेशेवर-तबके की भीड़ उसके बीच के सबसे घटिया लोगों को मुखिया बनने का मौका देती हैं, और उनके असर में समाज के लोगों का रूख किसी भी बदलाव के खिलाफ बड़ा हिंसक हो जाता है।

बिना सामाजिक बदलाव के पुलिस और अदालत की कितनी भी कड़ी कार्रवाई कट्टरता को शायद ही घटा सके। शहरीकरण से जो उम्मीद है वह भी पूरी होते नहीं दिख रही, और पढ़ाई-लिखाई भी किसी को बेहतर इंसान बनाने में मदद करती हो, ऐसा कहीं साबित नहीं होता। ऐसे में हिन्दुस्तान जैसे पाखंडी देश में अलग-अलग धर्म के लोगों के बीच, अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच शादियों को बढ़ावा देने, और उनके लिए बर्दाश्त बढ़ाने की जरूरत है। तब तक ऐसी हिंसा जारी रहेगी, और जब वह मरने-मारने तक पहुंचेगी, तो ही लोगों को उसके बारे में पता चलेगा।

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