हमलावर हिन्दुत्व की देश की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बना कर्नाटक

-सुनील कुमार॥

कर्नाटक में पहले हिजाब को लेकर सत्ता और सत्तारूढ़ पार्टी के फतवे चले, जिसने पांच राज्यों के चुनाव के बीच देश में हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का काम किया। फिर कर्नाटक हाईकोर्ट ने हिजाब के हक की मांग करने वाली मुस्लिम छात्राओं को कोई राहत नहीं दी, तो वह मुद्दा फिलहाल टल गया, और कर्नाटक भाजपा के बड़े नेताओं ने प्रदेश की हिन्दू आबादी से अपील की कि वे मुस्लिम तरीके से, हलाल करके काटे गए जानवर का गोश्त न खाएं क्योंकि उससे मुस्लिम एक आर्थिक जिहाद चला रहे हैं। यह मामला अभी हवा में उछला ही हुआ था कि वहां हाईकोर्ट के एक फैसले के मुताबिक सभी धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटाने की जगह मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के फतवे दिए गए, और कर्नाटक का एक पुराना घोर साम्प्रदायिक संगठन श्रीराम सेना इसके लिए जुट गया है। अभी इसको चार दिन भी नहीं हुए हैं कि श्रीराम सेना ने मुस्लिम फल व्यापारियों के बहिष्कार का फतवा दिया है, और उसका तर्क है कि आम के थोक बाजार पर मुस्लिम कारोबारियों का दबदबा है जो हिन्दू किसानों से फल खरीदने के लिए इंतजार कराते हैं, और फिर सस्ते रेट पर आधी रात में आम खरीदते हैं। इस संगठन का कहना है कि कुछ जिलों में पचास फीसदी तक फल-सब्जी कारोबारी मुसलमान हैं।

भाजपा के राज वाले इस प्रदेश में मुख्यमंत्री बसावराज बोम्मई से लेकर उनके मंत्री, उनकी भाजपा के बड़े नेता, और दूसरे हिन्दू संगठन लगातार प्रदेश में मुस्लिमों पर हमला करने का अभियान चलाए हुए हैं, और कर्नाटक हमलावर हिन्दुत्व की एक प्रयोगशाला की तरह चलाया जा रहा है। ऐसा भी नहीं है कि यह देश में ऐसे हिंसक, अलोकतांत्रिक, और साम्प्रदायिक प्रयोग करने वाला अकेला प्रदेश है, लेकिन यह योगी के उत्तरप्रदेश और शिवराज के मध्यप्रदेश के मुकाबले भी कई गुना अधिक साम्प्रदायिक हो चुका है, और बढ़ते चल रहा है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इन तमाम मुस्लिम विरोधी मुद्दों का पर्याप्त असर जनता पर नहीं हुआ, और आम लोगों ने ऐसी फतवेबाजी को अनसुना किया है इसलिए नए-नए मुद्दे उठाए जा रहे हैं ताकि लोग कहीं चैन से रहना जारी न रखें। लेकिन राजनीति की समझ रखने वाले लोगों का एक दूसरा भी सोचना है। कुछ जानकार मानते और बताते हैं कि मुख्यमंत्री बसावराज बोम्मई पहले जनता दल में थे, और 2008 में वे भारतीय जनता पार्टी में आए। उन्होंने पिछले भाजपा मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के साथ काम किया था, और अब मुख्यमंत्री बने। लेकिन भाजपा के दायरे में ऐसा माना जाता है कि बोम्मई की कार्यकर्ताओं के बीच कोई पकड़ नहीं है, और वे भाजपा में नए हैं, और वे लोगों के बीच कट्टर हिन्दुत्व को बढ़ावा देकर अपनी एक बुनियाद बना रहे हैं।

जो भी हो, भाजपा एक राष्ट्रीय पार्टी है और उसकी एक राज्य सरकार उसकी राष्ट्रीय नीतियों से परे मनमानी तो कर नहीं सकती है। और एक संगठन के रूप में भाजपा की तरफ से कर्नाटक के इन हिन्दुत्व-प्रयोगों के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है, बल्कि इनका साथ ही दिया गया है। इसलिए यह माना जाना चाहिए कि कर्नाटक की इस प्रयोगशाला को केन्द्र सरकार और भाजपा की मंजूरी प्राप्त है। यह भी लगता है कि एक के बाद दूसरा लगातार ऐसा प्रयोग क्या राष्ट्रीय स्तर पर किए जाने वाले कई प्रयोगों के पहले का कोई पायलट प्रोजेक्ट तो नहीं है? कई बार राजनीति और सार्वजनिक जीवन में जनमत और जनभावना को तौलने के लिए ऐसे प्रयोग किए जाते हैं, और देश के अलग-अलग तबकों का बर्दाश्त देखकर उनका विस्तार किया जाता है। अभी कुछ लोगों का यह भी मानना है कि कश्मीर फाइल्स नाम की एक फिल्म पर लोगों का रूख और रूझान देखकर अब किसी बड़े फैसले की तैयारी चल रही है, और इस फिल्म को एक नरेटिव सेट करने के लिए उतारा गया, लोगों की भावनाएं तौली गईं, और उन भावनाओं को एक सांचे में ढाला भी गया। कश्मीर से धारा 370 खत्म करने के बाद, और राज्य का तीन हिस्सों में बंटवारा करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 24 अप्रैल को पहली बार कश्मीर प्रवास पर जा रहे हैं। वे वहां पर कश्मीरी पंडितों के कार्यक्रम में भी जाएंगे। इसलिए अगर कश्मीर फाइल फिल्म को लेकर देश भर में बना, और बनाया गया माहौल प्रधानमंत्री के इस प्रवास के पहले की भूमिका की तरह था, तो भी हैरानी नहीं होनी चाहिए। और इसी तरह कर्नाटक में अभी चल रहे आक्रामक प्रयोग अगर देश भर में ऐसे धार्मिक ध्रुवीकरण और साम्प्रदायिकता का पायलट प्रोजेक्ट हैं, तो भी हैरानी नहीं होनी चाहिए।

सवाल यह है कि आज जब हिन्दुस्तान और बाकी दुनिया एक आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं, गिने-चुने लोगों के हाथ की दौलत बढ़ते चल रही है, लेकिन आबादी के अधिकतर हिस्से का हाल खराब होते चल रहा है, वैसे में देश को साम्प्रदायिकता के प्रयोगों, और फिर उनके विस्तार में झोंकने की अभी ऐसी क्या हड़बड़ी है? क्या यह 2024 के आम चुनावों के पहले जमीन को जोतकर फसल के लिए तैयार करने की लंबी तैयारी है, या फिर इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया होगी, उसे तौला जा रहा है?

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि कर्नाटक में चल रहे ऐसे हिंसक और साम्प्रदायिक प्रयोगों का जो विरोध, कांग्रेस, जनता दल, जैसे संगठनों को करना चाहिए था, वैसा किया नहीं जा रहा है। ये राजनीतिक पार्टियां भी चुप बैठी हैं, या चुप सरीखी हैं। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के इतिहास के इस दौर में सबकी प्रतिक्रिया दर्ज होते चल रही है।

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