जैविक शिनाख्त के खतरे मानवता के साथ मज़ाक़..


दंड प्रक्रिया पहचान विधेयक 2022 या क्रिमिनल प्रोसिजर (शिनाख्त) विधेयक सोमवार को लोकसभा में ध्वनिमत से पारित हो गया। इससे पहले 28 मार्च को इसे भाजपा सरकार ने पेश किया था। विपक्ष शुरु से इस विधेयक पर अपनी आपत्ति जतला रहा है। लोकसभा में भी केवल वायएसआर कांग्रेस को छोड़कर समूचे विपक्ष ने इसका विरोध किया। मगर पिछले कई विधेयकों की तरह इस पर भी भाजपा ने अपने बहुमत का नाजायज़ जोर चलाया और लोकसभा से इसे पारित करा लिया। अब राज्यसभा में भी भाजपा की ताकत बढ़ चुकी है और इस बात की गुंजाइश कम ही है कि वहां इसके पारित होने की राह में कोई रोड़ा आएगा। दोनों सदनों से पारित होने के बाद जब दंड प्रक्रिया पहचान विधेयक राष्ट्रपति की मुहर के बाद कानून का रूप धारण कर लेगा, तब मोदी सरकार की ताकत कुछ और बढ़ जाएगी, जबकि जनता अपने अधिकारों की हनन से आशंकित रहेगी।
दरअसल इस विधेयक में प्रावधान है कि पुलिस अपराधियों या संदिग्धों के उंगलियों के निशान और पैरों की छाप से लेकर पुतलियों और रेटिना के स्कैन, जैविक नमूने और शरीर के नाप समेत अन्य निजी जानकारियों को एकत्र कर सकेगी और इस डेटा को 75 साल कर संरक्षित रखा जाएगा। इससे भी खतरनाक बात ये है कि मौजूदा कानून के तहत पुलिस केवल आरोपियों, जमानत प्राप्त दोषियों और गंभीर अपराधों में सजायाफ्ता लोगों के ही आंकड़े जुटाती थी, लेकिन इस नए संशोधित विधेयक में उन तमाम लोगों की निजी जानकारियां पुलिस इकटृठा कर सकेगी, जिन्हें किसी भी अपराध में सजा मिली है। ऐसे गिरफ्तार लोग जिन पर किसी भी कानून के तहत सजा के प्रावधान की धाराएं लगी हैं। इसके साथ ही ऐसे लोग जिन पर सीआरपीसी की धारा 117 के तहत शांति बनाए रखने के लिए कार्रवाई की गई है, उन पर भी ये कानून लागू होगा। विधेयक के मुताबिक महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों को छोड़कर जिन मामलों में सात साल से कम की सजा है उनके आरोपी अपने जैविक नमूने देने से मना कर सकते हैं। विधेयक में कहा गया है कि मजिस्ट्रेट के लिखित आदेश को छोड़कर आरोपी के बिना ट्रायल के रिहा होने या दोष मुक्त होने पर उसका डेटा भी नष्ट किया जा सकता है। विधेयक के मुताबिक ये डेटा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के पास रखा जाएगा। एनसीआरबी ये रिकॉर्ड राज्य या केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन या किसी दूसरी कानूनी एजेंसी से इका करेगी। एनसीआरबी के पास इस डेटा को संग्रहित करने उसे संरक्षित करने और उसे नष्ट करने की शक्ति होगी। ये विधेयक कानून का रूप लेता है तो ये कैदियों की पहचान अधिनियम, 1920 की जगह लेगा। सरकार का मानना है कि बीते 102 साल में अपराध की प्रकृति में भारी बदलाव आया है, इसलिए कानून में बदलाव जरूरी है। इस बदलाव से अपराधियों के शारीरिक मापदंड का रिकॉर्ड रखने के लिए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की इजाजत मिलेगी। पुलिस के पास सभी अपराधियों का हर तरह का डेटा मौजूद रहेगा। इससे जांच करने और सबूत इका करने में आसानी होगी। अपराधियों के खिलाफ सख्ती बरतने की आड़ में उठाया गया यह कदम दरअसल नागरिक स्वतंत्रता पर आघात है। इससे पहले भी आतंकवाद की रोकथाम, देश की सुरक्षा, या बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के खिलाफ कई सख्त कानून बने, मगर इनसे अपराध की दर कम नहीं हुई, न ही अपराधियों में किसी किस्म का डर कायम हुआ।
पहचान के मकसद से अपराधियों और अन्य लोगों के शरीर का नाप लेने और उस रिकॉर्ड को संरक्षित रखने का विकल्प संविधान की धारा 14, 19 और 21 के विरुद्ध है, जिनमें मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के अधिकार दर्ज हैं। इसी तरह डेटा सुरक्षा को लेकर भी संदेह है, क्योंकि गलत हाथों में पड़ने से इसका दुरुपयोग होने की आशंका हमेशा बनी रहेगी। साइबर अपराध में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। जो आशंकाएं आधार कार्ड या आरोग्य सेतु ऐप को लेकर जानकार पहले व्यक्त कर चुके हैं, वही चिंताएं इस विधेयक के बारे में भी हैं, क्योंकि इसमें मात्र संदेह के आधार पर शारीरिक और अन्य निजी जानकारियां एकत्र की जा रही हैं। सरकार का कहना है कि यह संदिग्धों और अपराधियों पर सख्ती के लिए है, लेकिन ये आशंकाएं भी उठ रही हैं कि सरकार इसका इस्तेमाल अपने राजनैतिक विरोधियों के दमन के लिए कर सकती है।
मौजूदा शासन में सीएए और एनआरसी का विरोध करने वालों के साथ सरकार ने जिस तरह की सख्ती दिखाई, वह सबके सामने है। इसी तरह विपक्षी दलों के नेताओं, प्रशासनिक अफसरों, पत्रकारों या छात्रों को सरकार के विरोध की सजा भुगतनी पड़ी है, और यह सब देश की सुरक्षा के नाम पर हुआ है। इसलिए नया कानून आने से यह आशंका बलवती है कि निगरानी के नाम पर सत्ता अपने विरोधियों का दमन पुलिस के जरिए कर सकती है। वैसे संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने विपक्षियों के विरोध पर आश्वासन देते हुए कहा है कि सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करेगी कि कानून का कोई गलत इस्तेमाल ना हो। लेकिन उनके आश्वासन पर यकीन करने का अभी कोई पुख्ता आधार नहीं है। क्योंकि सदन से बाहर सरकार के नुमाइंदे ही कभी कपड़ों से पहचान करने तो कभी बुलडोजर की धमकी देते नजर आते हैं। शिवसेना सांसद विनायक राउत ने इस विधेयक को ‘मानवता के साथ क्रूर मजाक’ बताया था। लोकतंत्र औऱ नागरिक स्वतंत्रता पर यकीन रखने वाले उनकी इस बात से इत्तेफाक रखेंगे।

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