जी हां, वह शैतान थी..

डॉ. अव्यक्त अग्रवाल॥

मैंने दिवाली गिफ़्ट खोला था ।

उसमें प्यारी सी शर्ट थी जिसपर लिखा था “आप मेरे भगवान हो ।”

मैं सुन्न सा…. महसूस करवा रहा था ख़ुद को कि क्या मैं वाकई किसी के लिए भगवान हूँ । उत्तर जो मिला था उन यादों से, ये संस्मरण वही है ।

लगभग 10 वर्ष पूर्व की बात है ।
एक 12 वर्षीय बच्चा स्नेक बाईट के साथ हमारे पास लाया गया था ।

मेरे चिकित्स्कीय जीवन में आये हज़ारों मरीजों में से यह केस मुझे ऐसे याद है जैसे कल की ही बात हो । बच्चे के सभी हाव भाव , रिपोर्ट्स , परिजनों के प्रश्न , चिंताएं , आई सी यू का माहौल सब वैसा का वैसा याद है । क्यों है ऐसा, ये आप पूरा पढ़ कर जान जाएंगे ।

बच्चा खेल रहा था,अन्य दोस्तों संग और बॉल गमले के पीछे गयी , जैसे ही हाथ डाला , सांप ने काट लिया था ।
सांप बहुत बड़ा था अतः ज़हर भी बहुत रहा होगा ।

फ़िर क्योंकि दूसरे शहर से रेफेर हो कर आया था तो लगभग 4 घंटे की देरी से पंहुचा था । बीच में शायद कुछ झाड़ फूंक भी की गई थी। 4 घंटे ,ज़हरीले रक्त दंश में काफी देर मानी जायेगी ।

बच्चा एक अमीर , प्रभावशाली परिवार से था ।

बच्चे को हाथ में बहुत सूजन थी , जो कि , कोहनी को पार कर रही थी ।
लक्षण देखते ही हम समझ चुके थे यह वाईपर बाईट है ।

वाईपर बाईट में काटे हुए स्थान पर सूजन आती है जो कि बढ़ती और फैलती ही जाती है । तीव्र दर्द होता है । देर होने पर रक्त स्त्राव , किडनी फेल होने , दिल पर असर होने की संभावना बढ़ती जाती है ।

उस समय तक मुझे स्नेक बाईट management में काफी अच्छा अनुभव और आत्मविश्वास था । मेरे साथी चिकित्सक भी बेहद अच्छे क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट थे ।
बच्चे के साथ जीप भर परिजन आये थे । ज़ाहिर तौर पर वे बेहद चिंतित थे ।

लेकिन जैसा कि भारत में होता है, बच्चा गर्मी की छुट्टियों में नानी के घर आया था और ननिहाल में बच्चे को कुछ हो जाये तो सारा दोष ननिहाल की लापरवाही का होता है ।

“हमारे पास बच्चा 12 वर्ष रहा , खरोंच भी नहीं आयी और अब ये । “

तो बच्चे के नाना , मामा , मम्मी इत्यादि इस बात पर भी चिंता व्यक्त कर रहे थे, कि ससुराल वाले दोष मढेंगे ।

कैजुअल्टी में गंभीर बच्चा, और मुझसे पूछा गया ।

” सर ठीक तो हो जाएगा न ? “

मैंने कहा ” भविष्य तो भगवान को पता है , हाँ हम कोशिश पूरी करेंगे । “

सर कितने चांस हैं ?

” रिजल्ट के मुझे पता नहीं, लेकिन 100 परसेंट कोशिश के 100 परसेंट चांस हैं । ” मैंने कहा था ।

परिजनों के हाव भाव , बातें हम पर भरोसे वाली लगीं तो हमने भर्ती कर लिया । लिखित कंसेंट में बच्चे की गंभीरता औऱ मृत्यु की संभावना को समझा दिया गया ।

बच्चे के किडनी फंक्शन की रक्त जांच में हल्की ख़राबी शुरू हुई थी । रक्त स्राव की जांच भी ख़राब थी हालाँकि रक्त स्त्राव आरम्भ नहीं हुआ था किंतु कहीं से भी, कभी भी शुरू हो सकता था । क्योंकि, कलॉटिंग टाइम बहुत बढ़ कर आ रहा था ।

हमने आई सी यू में भर्ती कर सभी आवश्यक उपचार शुरू किए थे और हाई dose एन्टी स्नेक वेनम देने का निर्णय लिया था ।

लेकिन लगभग 10 घंटे बाद भी बच्चे में न तो सुधार था बल्कि सूजन बढ़ कर सीने तक पंहुच गयी थी ।

परिजनों ने अपनी मर्ज़ी से एक बड़े चिकित्सक से ओपिनियन लेना चाहा हमने कहा , अवश्य लीजिये ।

उन चिकत्सक ने परिजनों से कहा सूजन पूरे सीने तक पँहुच गयी है और खतरा बहुत अधिक है । नागपुर ले जाना बेहतर होगा ।

अब तक ससुराल पक्ष से भी परिजन आ गए थे ।

चिंताएं , बच्चे को खो देने की घबराहट चरम पर थी ।

नेताओं , प्रभावशाली लोगों , पत्रकारों के फोन आने लगे थे और जमावड़ा भी लग रहा था ।

मुझे अस्पताल मालिक जो कि दूसरी मेडिकल ब्रांच में सीनियर चिकित्सक थे ने फोन कर कहा अव्यक्त, इसे रेफेर कर दो नागपुर ।

मैंने कहा “सर 7 घंटे यात्रा करके वो रास्ते में ही मर जायेगा ।
सर उसे बचा सकते हैं तो यहीं बचा सकते हैं । नागपुर में भी स्नेक बाईट में यही तो इलाज करेंगे, वो लोग भी न ।”

“अरे भाई तुम समझते नहीं हो बहुत फोन आ रहे हैं , पत्रकारों के , नेताओं के , वकीलों के ।
बच्चा गंभीर है, उसे कुछ हुआ तो बहुत हंगामे , केस , पेपर बाजी होगी , अस्पताल तुड़वाओगे तुम । और सबसे पहले तो तुम्हें पकड़ेंगे ये लोग । भीड़ देख रहे हो बाहर ।”

मैंने कहा, सर मैं करता हूँ रेफेर । उनकी आशंकाए सही थीं, अनुभव जन्य थीं ।

फ़ोन रखने के बाद मैं आंख बंद कर आई सी यू में दो मिन के लिए बैठ गया ।

अब रेफेर करने का दबाव मुझपर परिजनों की ओर से था, अस्पताल की ओर से भी था, और साथी चिकित्सक ओपिनियन के तहत भी था । मृत्यु होने पर सर की आशंकाओं के सही हो जाने का भी पूरा भान था ।

आंख बंद करके मैंने ध्यान किया और स्वयं से कहा मुझे बच्चे को बचाना है या ख़ुद को ? मैं डॉक्टर खुद को बचाने बना हूँ या बच्चे को ।

उत्तर था बच्चे को बचाने

दूसरे मन ने उत्तर दिया था , फ़ालतू आदर्शवादी मत बन व्यावहारिक सोच रख ।

बच्चा ट्रांसपॉर्ट में और गंभीर हो जाएगा या नहीं बचेगा यह मुझे भी पता था और अन्य सभी चिकित्सकों को भी, किन्तु आई सी यू के बाहर परिजनों की भीड़ , यहां वहां से फोन करवाना , बचाने की गारंटी माँगना , आप से नहीं हो रहा तो तुरंत रेफेर कर दो जैसे वाक्य, किसी का ये कहना कि, अब तक बच्चे में कोई सुधार नहीं हुआ सर आपको पहले ही बताना था ,आग लगा देंगे….जैसे वाक्य..
वग़ैरह से आई सी यू में, स्टाफ में एक भय का माहौल बनना शुरू हो गया था ।

मुझे मेरे ड्यूटी डॉक्टर ने भी धीरे से कहा ” सर भेज दो, कहाँ पचड़े में पड़े हो । कुछ हो गया तो पूरा दोष मढ़ देंगे आप पर ।”

जहरीले स्नेक बाईट के ढेरों बच्चों के इलाज के बाद मुझे यह समझ आ गया था कि,तुरंत इलाज शुरू करना, समय रहते सही निर्णय , लगातार मॉनिटरिंग और उसके अनुरूप स्टेप्स ही जान बचाते हैं । एक एक मिनट कीमती है इस समय ।

ट्रांसपोर्ट के समय उपरोक्त सभी मानक प्रभावित होने वाले थे ।

मैंने परिजनों से बात करने का निश्चय किया ।

आई सी यू के बाहर मेरे निकलते ही मुझे घेर लिया जाता है ।

” आप सब मुझे घेर कर खड़े हैं , इस तरह भीड़ करने , डॉक्टर पर दबाव डालने , नेताओं से फोन करवाने से आपको लगता है बच्चा बच जाएगा तो आप 10 नहीं सभी परिजनों को बुला लीजिये मुझे घेर कर खड़े होने के लिए । “

” आप ठीक भी तो नहीं कर पा रहे हैं। “

मॉब की मूर्ख ताक़त से निकले आत्मविश्वास ने एक 20 साल के लड़के ( कोई परिजन ) को डॉक्टर से इस तरह बात करने उकसाया था । “

“मैंने कभी नहीं कहा कि हम इसे ठीक कर ही लेंगे । मैंने कहा कोशिश पूरी करेंगे । लिखित में आपने कंसेंट में यह सब लिखा है भर्ती के पहले ।”

“मैं मात्र दो परिजनों से बात करूंगा । बाकी लोग बाहर चले जाएं ।”

बेमन से पिता ने बाकी लोगों को हटाया था ।

” देखिए आप सब नागपुर ले जाना चाहते हैं बच्चे को , लेकिन बच्चा ट्रांसपोर्ट करने में और गंभीर हो जाएगा और वहां के चिकित्सकों को और भी कम संभावनाएं मिलेंगी । यहाँ तक कि रास्ते में मृत्यु भी हो सकती है ।

जो इलाज है , दवाएं हैं वे सब लगभग यही होंगी ।”

“अस्पताल मेरा नहीं है और बच्चे के यहां रुकने से मेरा कोई आर्थिक फायदा नहीं है । चाहे तो मेरी फीस मैं 0 लिखवा देता हूँ जिससे आपको यह भरोसा हो जाए । “

और हाँ, यहां रुकने से वह बच ही जायेगा मैं यह नहीं कह सकता । आप लोग मेरे यह समझाने के बावज़ूद ले जाना चाहें तो ले जाएं मैं मदद ही करूँगा ।”

अब वो लोग, जो ले जाने तैयार बैठे थे, कंफ्यूज हो गए थे ।

उन्होंने कहा, हम सोच कर बताते हैं सर ।

भारी डिस्कशन हुआ परिजनों का ।

अंततः वे आ कर बोले , “ठीक है आप यहीं रख कर उसे ठीक करिये ।”

दरअसल उन्होंने नागपुर के एक बड़े अस्पताल के चिकित्सक से भी बात की । पूरी स्थिति समझते हुए उन्होंने भी यही कहा कि नहीं यहां मत लाओ । स्थित और ख़राब हो जाएगी और इलाज सही चल रहा है ।

मैंने पिता से तब कहा कि , लेकिन यह तब ही हो सकेगा यदि आप यहां परिजनों की भीड़ न करें, नेताओं से फोन करवाना , गारंटी माँगना वग़ैरह न करें ।
मैं और आप एक टीम हैं , एक ही उद्देश्य है बच्चे को बचाना । मैं और आप दोनों सिर्फ यही चाहते हैं कि यह ठीक हो जाये , नहीं ?

लेकिन भय का माहौल बनाने से इलाज और बेहतर नहीं , खराब होता है ।

” नहीं नहीं सर आप , अपना काम कीजिये । “

उनके ये कहने के बावजूद भीड़ , अफरातफरी कम नहीं, बढ़ी ही थी वहां । स्टाफ में भय का माहौल साफ था ।
गार्ड ने मुझे बताया था, लोग कह रहे थे कुछ हुआ तो छोड़ेंगे नहीं ।

लेकिन 16 वें घंटे से बच्चे में सुधार दिखने लगा , अंततः बच्चा बच गया ।

पिता ने आकर मेरे और मेरे साथी चिकित्सक के पैर पड़ लिए ।

हर दिवाली वे हमें गिफ़्ट भेजते रहे । जिसमें लिखा होता आप भगवान से कम नहीं ।

मैंने वे गिफ्ट्स किसी ज़रुरतमंद को दे दिये । क्योंकि मुझे पता ही नहीं था मैं भगवान हूं या शैतान । वे गिफ़्ट भगवान के लिए थे ।

भगवान या शैतान के बीच जो महीन रेखा मुझे विभाजित कर रही थी वह था हमारे प्रयासों का रिज़ल्ट ।
result जो कि पूर्णतः प्रयासों पर निर्भर भी नहीं ।

यदि बच्चा नहीं बचता तो भीड़ मार पीट, तोड़ फोड़ जो कि भारत में कानूनी लगती है करती ही , अगले दिन छपा होता , पैसों के लालच में नहीं किया गया रेफेर ।

ठीक वैसे, जैसे डॉक्टर अर्चना शर्मा के लिए लिखा गया था ।

डॉ अर्चना का आत्महत्या से पहले लिखा गया नोट

आज जब डॉक्टर अर्चना शर्मा का सुसाइड नोट पढ़ता हूँ तो समझ आता है, मेरे सीनियर और अस्पताल ओनर कितने सही थे, और मैं कितना मूर्ख l हाँ मुझे उसे जाने देना था । ये शर्ट नहीं मिलती लेकिन मेरी शैतान बन जाने की संभावना भी तो न होती ।

डॉक्टर अर्चना शर्मा ने भी PPH केस रेफेर नहीं किया था
लगातार ब्लीडिंग की वजह से उन्हें पता था PPH में सर्वाधिक ज़रूरी है समय रहते उपाय करना है ।

लेकिन वे उस महीन लाइन के दूसरी ओर थीं । जिसके एक ओर मैं भगवान बन पाया था और वो हत्यारिन … शैतान ।

जी हाँ वह शैतान थी ।

आपका
डॉ अव्यक्त ।।

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