फैसलों में भागीदारी से बचा जा सकता है बहुत बड़ी ऐतिहासिक चूक से..

-सुनील कुमार॥

आज कांग्रेस पार्टी के भीतर चुनावी शिकस्त को लेकर दिख रही बेचैनी कोई नई बात नहीं है। दो बरस पहले जब पार्टी को लोकसभा चुनावों में उम्मीदों के खिलाफ जाकर बड़ी बुरी हार मिली थी तब भी यह बेचैनी शुरू हुई थी, और तब से अब तक जारी ही थी। लेकिन इसे पार्टी के खिलाफ गद्दारी भी कहा गया, लोगों की भाजपा में जाने की कोशिश भी करार दिया गया। लोगों को बार-बार यह नसीहत दी गई कि घर की बात घर के भीतर रखनी चाहिए, हालांकि यह बात किसी ने नहीं कही कि घर की बात घर के भीतर रखने के लिए उस घर तक आखिर पहुंचा कैसे जाए जहां पार्टी के नेताओं को भी महीनों और बरसों तक वक्त नहीं मिलता? खैर, कांग्रेस पार्टी की आज की बदहाली के बारे में अधिक चर्चा करना आज का मकसद नहीं है, बल्कि यह एक शुरुआत के लिए दिख रहा मुद्दा है जिस पर बात की जानी चाहिए।

किसी भी सरकार या संगठन के भीतर, या किसी कारोबार के भीतर भी अगर लोगों का आपस में सोचना-विचारना कम हो जाता है, बंद हो जाता है, तो उनका आगे बढऩा भी बंद हो जाता है। जिस संगठन या कारोबार में ऊपर से फतवे आते हैं, और फिर वे नीचे के लोगों के लिए हुक्म बन जाते हैं, तो वहां पर गलतियों की सबसे अधिक गुंजाइश रहती है। गिनाने के लिए कई ऐसी मिसालें गिनाई जा सकती हैं कि फलां पार्टी तो एक व्यक्ति के हांके चलती आ रही है, और वह आगे भी बढ़ते जा रही है। लेकिन इस बात पर गौर करना चाहिए कि क्या वह सचमुच अपनी सभी संभावनाओं को पा सकी है? या फिर उन संभावनाओं से बहुत पीछे रह गई है, क्योंकि उसमें न तो कोई आत्ममंथन था, और न ही उसमें नई सोच, सोच की विविधता की कोई जगह रह गई थी। एक बंद टंकी के पानी की तरह उसकी सोच पर काई जमती चली गई, और ऐसी अधिकतर पार्टियां अपार संभावनाओं के रहते हुए भी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पातीं या कांग्रेस की मिसाल अगर देखें तो आसमान की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद यह पार्टी नीचे मिट्टी में मिल गई है क्योंकि न इसमें सोच की विविधता की जगह रही, न सामूहिक नेतृत्व नाम की कोई बात रही। ऐसे में उसका यह हाल होना ही था। लेकिन राजनीतिक दलों से परे की भी बात करें तो सोच की विविधता, प्रतिभा का सम्मान, और खुला दिमाग रखना, इन सबकी वजह से कोई भी संगठन या कोई देश बहुत आगे बढ़ सकते हैं।

अब आज हिन्दुस्तान की एक सबसे बड़ी, और अच्छी-खासी साख वाली कंपनी टाटा को अगर देखें तो पारसी परिवार की शुरू की हुई कंपनी जिसके अधिकतर शेयर पारसी परिवारों के बीच थे, उसके अलग-अलग अफसर बदलते हुए आज एक दक्षिण भारतीय मुखिया इस कंपनी को चला रहा है। इसका न तो टाटा परिवार से कोई लेना-देना था, और न ही शेयर होल्डरों से। ऐसी बहुत सी कंपनियां हैं जिनमें पेशेवर सीईओ काम करते हैं, और उसे आसमान तक ले जाते हैं। अमरीका में आज बड़ी-बड़ी कंपनियां चलाने वाले सुंदर पिचाई, सत्या नडेला, इन्द्रा नूरी जैसे लोगों का उन कंपनियों से कोई लेना-देना नहीं था, वे केवल पेशेवर कर्मचारी थे, और कंपनियों के मुखिया बने। ऐसी कामयाब कंपनियों के भीतर यह बात रही कि लोगों के बीच साथ बैठकर सोचने-विचारने की आजादी रही। हिन्दुस्तान में आज कारोबार से लेकर सरकार तक, और राजनीतिक पार्टियों तक इसी बात की कमी है। जयललिता और मायावती जैसे लोगों के सामने दंडवत होना ही उनकी पार्टियों में विचार-विमर्श का पैमाना था। इनका अंत आगे-पीछे होना ही था। कुछ वैसा ही अंत अकाली दल का हुआ, समाजवादी पार्टी अपनी संभावनाओं तक नहीं पहुंच पाई, और लालू की पार्टी उनके कुनबे की गुलाम होकर खत्म हो गई। शरद पवार लंबे समय तक महाराष्ट्र के मुखिया रहने के बाद आज वहां के सत्तारूढ़ गठबंधन के तीन भागीदारों में से एक रह गए हैं, और केन्द्र की सत्ता में उनकी कोई भागीदारी नहीं रह गई है। इसलिए बदहाली हासिल करने वाली कांग्रेस अकेली पार्टी नहीं है।

दरअसल कामयाबी तक पहुंचने के लिए अपने घर के भीतर, संगठन के भीतर जिस तरह की आंतरिक असहमति का स्वागत होना चाहिए, वह जहां बिल्कुल नहीं रह जाता, वहां गलतियां ही गलतियां होने लगती हैं, और संभावनाएं धरी रह जाती हैं। संगठन या कारोबार के भीतर जहां असहमति का सम्मान होता है, वहां बहुत से दिमाग मिलकर काम करते हैं, वहां विविधता का फायदा मिलता है। लेकिन जहां असहमति को गद्दारी मान लिया जाता है, और विचार-विमर्श को बगावती तेवर करार दिया जाता है, वहां आगे बढऩा खत्म हो जाता है। हिन्दुस्तान में आज भाजपा जिस आसमान पर पहुंची हुई है उसके पीछे पिछले कुछ दशकों को देखें तो नेताओं की एक विविधता भी रही है। हर दो-चार बरस में पार्टी अध्यक्ष बदलते रहे, पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बदलते रहे, और वक्त आने पर लालकृष्ण अडवानी जैसे लोगों को हाशिए पर करके नई लीडरशिप आई, और उसने नई कामयाबी भी पाई। लोगों की आवाजाही जहां लगी नहीं रहती, वहां संगठन खत्म होने लगते हैं, आगे-पीछे यह खतरा ममता बैनर्जी की पार्टी के साथ भी रहेगा जहां वे अकेली ही सब कुछ हैं, और अगर उनके अलावा जरा सी गुंजाइश किसी और के लिए है, तो वह उनके भतीजे के लिए ही है।

सरकारों के भीतर भी यह देखने में आता है कि जहां प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपने फैसलों को लेकर किसी से सलाह-मशविरा करने के मोहताज नहीं रहते, वहां पर उनसे नोटबंदी जैसी ऐतिहासिक गलतियां होती हैं, और जिनसे उबरने की गुंजाइश हर किसी के पास नहीं होती, नरेन्द्र मोदी के पास तो फिर भी थी। इसके बजाय जिन सरकारों में सलाह-मशविरे की भागीदारी अधिक रहती है, उनमें कामयाब होने की संभावना भी अधिक होती है। सार्वजनिक जिंदगी से परे निजी जिंदगी में भी जो व्यक्ति या परिवार अपने बड़े फैसले अपने छोटे से दिमाग से अकेले लेते हैं, वे बड़ी गलतियां करने का खतरा अधिक उठाते हैं। इसलिए अपने आसपास के लोग, अपने संगठन या सरकार, या कारोबार के लोग न सिर्फ विचार-विमर्श के लिए साथ रखने चाहिए, बल्कि उन्हें उनकी असहमति को भी सामने रखने के लिए बढ़ावा देना चाहिए।

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