कब तक ठगी जाएगी जनता.?

 

पांच राज्यों के चुनावी नतीजे सामने आ चुके हैं और चार राज्यों में भाजपा अपनी सरकार बनाने की कवायद शुरु कर चुकी है, ऐसे में एक बार फिर देश में तेल और गैस के दामों में बढ़ोतरी हो गई है। चुनाव के कारण ही पिछले चार महीनों से दामों पर अंकुश लगाकर रखा गया था, लेकिन अब महंगाई का कोई राजनैतिक नुकसान तत्काल नहीं होने वाला है, इसलिए सत्तारुढ़ भाजपा ने एक बार फिर आम आदमी को चोट पहुंचाने वाला काम किया है। देश में चुनाव दर चुनाव जीतने के कारण नरेन्द्र मोदी की नेतृत्व क्षमता की खूब तारीफें होती हैं। जनता के बीच उनकी छवि अवतारी पुरुष सी बना दी गई है, जो अपने दैवीय गुणों से लोगों का उद्धार कर देंगे।

वहीं एक के बाद एक चुनाव हारने के कारण विपक्ष के सांसद राहुल गांधी का मजाक बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी गई है। उनके लिए अपमानजनक संबोधन दिए गए, उनकी राजनीति का मखौल उड़ाया गया। लेकिन इस वक्त राहुल गांधी ही देश में एक ऐसे नेता नजर आते हैं, जिन्होंने हर बार सरकार के अगले कदम और उसके परिणामों को लेकर सटीक भविष्यवाणी की। कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए लॉकडाउन से लेकर टीकाकरण तक और बेरोजगारी से लेकर महंगाई तक जिस तरह के अनुमान राहुल गांधी ने व्यक्त किए, वे सही साबित हुए। राहुल गांधी कोई ज्योतिषी नहीं हैं, लेकिन उनकी भविष्यवाणियां हिंदुस्तान की सही समझ रखने के कारण सही साबित हुई हैं। एक जननेता को इसी तरह देश और समाज की नब्ज समझ आनी चाहिए।

नरेन्द्र मोदी भी जमीन से उठे नेता ही हैं, सरकार के सर्वोच्च पद पर पहुंचने से पहले उन्होंने भी जनता के बीच काफी वक्त बिताया है। इसलिए जनता की नब्ज वे भी सही पकड़ते हैं। लेकिन अपनी राजनीति चमकाने के लिए अब जनता की तकलीफों को देखकर भी वे नजरंदाज कर रहे हैं। उनकी सरकार में देश की अर्थव्यवस्था जिस तरह चल रही है, जिस हाल में पहुंच चुकी है, उससे यही साबित होता है नरेन्द्र मोदी अब जननेता की जगह उद्योगजगत के नेता बन चुके हैं। जनता की धार्मिक भावनाओं को भाजपा ने अपने फायदे के लिए खूब भुनाया है, मगर सरकार यह भूल चुकी है कि इंसान का पेट धर्म से नहीं रोटी से भरता है। भाजपा को याद रखना चाहिए कि भूखे पेट भजन न होए गोपाला। चुनावों में धर्म और जाति के जोश में मतदान करने वाली जनता का सामना अब महंगाई से हो रहा है।

होली के पहले ही देश में दूध के दाम बढ़ चुके थे, अब सब्जियां भी महंगी हो रही हंै और इसके साथ-साथ तेल और गैस के दाम भी बेतहाशा बढ़ गए हैं। घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दामों में कम से कम 50 रुपए की बढ़ोतरी हुई है और अब देश के कई शहरों में इसकी कीमत 9 सौ से एक हजार के बीच पहुंच गई है। वहीं पेट्रोल और डीजल के दामों में 80 पैसे की बढ़ोतरी हुई है और इस बात की पूरी आशंका है कि अगले चुनावों तक यानी इस साल के अंत तक ये कीमतें ऐसे ही बढ़ती रहेंगी। अभी पिछले दिनों ही डीजल की थोक खरीदारी में सीधे 25 रुपए की बढ़त कर दी गई थी। सरकार ने इसके पीछे रूस-यूक्रेन युद्ध को कारण बताया था और ये भी कहा था कि खुदरा बिक्री पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार ने अगर यह तर्क लोगों को गुमराह करने के लिए दिया है, तो इसे चालाक राजनीति का नमूना माना जाए और अगर वाकई सरकार को ये लगता है कि थोक की कीमतों का कोई असर खुदरा बिक्री पर नहीं होगा, यह निहायत अहमकाना बात है। फिर तो यही मानना चाहिए कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था को समझ ही नहीं रही है। विमानसेवा, रेलवे, बड़े वाहनों का चालन, औद्योगिक गतिविधियों इन सबके लिए जब महंगा डीजल खरीदा जाएगा तो क्या इससे जुड़े अन्य व्यवसायों पर इसका असर नहीं पड़ेगा। माल ढुलाई से लेकर यात्री किराए तक और उत्पादन से लेकर वितरण तक तमाम चीजों में लागत और वसूली दोनों बढ़ जाएंगे।

वैसे ही दो साल पहले सरकार की ओर से दी गई लॉकडाउन की मार से देश अब तक उबर नहीं पाया है। 24 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिंदुस्तान को बचाने के नाम पर आधी रात से लॉकडाउन लागू करने का ऐलान कर दिया था और यह भी कहा था कि इसकी आर्थिक कीमत देश को चुकानी पड़ेगी। लेकिन उन्होंने ये आश्वासन नहीं दिया था कि इस कीमत का भार वे आम आदमी पर नहीं पड़ने देंगे। उनके एक तुगलकी फरमान से करोड़ों लोगों को एक झटके में बेघर और बेरोजगार होना पड़ा। आजादी के बाद एक और बड़ा विस्थापन प्रवासी मजदूरों की घर वापसी की शक्ल में देश ने देखा। करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे आ गए, लाखों लोगों को नौकरियों से निकाल दिया गया। छोटे और मंझोले उद्योग धंधे बंद हो गए।

होटल, पर्यटन, रेस्तरां, जिम जैसे कई व्यवसाय ठप्प पड़ गए। कारीगरों का काम बंद हो गया, रेहड़ी-पटरी वालों की रोजी रोटी छिन गई। दो साल बाद भी हालात सुधर नहीं पाए हैं, क्योंकि सरकार ने राहत पैकेज के नाम पर जो दिखावा किया, उसमें फिर बड़े व्यवसायियों की ही हिस्सेदारी अधिक दिखी। इन दो सालों में देश में अरबपतियों की दौलत कुछ और बढ़ गई है, उनके व्यवसायों को पंख लग गए हैं। मगर आम जनता के हिस्से में तकलीफें और दर्द से समझौते ही आए हैं। प्रधानमंत्री के एक आह्वान पर खुशी-खुशी ताली-थाली बजाने और दिए जलाने वाली जनता अब भी इसी उम्मीद में है कि जो राम को ले आए हैं, वे अच्छे दिन भी ले आएंगे। देखना यही है कि अपनी उम्मीदों के कारण जनता कब तक ठगी जाती रहेगी।

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