यूक्रेन पर रूसी हमले पर हिन्दुस्तान की तटस्थता, या चुप्पी से ऊपर कुछ नहीं?

-सुनील कुमार॥

हिन्दुस्तानी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उस भाजपा के नेता हैं जो कि विदेश नीति के मामले में अमरीका के अधिक करीब मानी जाती है। इसकी वजह भी बहुत साफ है कि सोवियत संघ के वक्त से लेकर आज के रूस के वक्त तक रूसी नीतियां भारत में वामपंथी दलों के करीब है, दूसरी तरफ चीन के साथ सरहदी टकराव और ऐतिहासिक जंग के तजुर्बे से परे भी भारत का एक वामपंथी दल चीन की नीतियों के करीब माना जाता है, और इसलिए भाजपा का इन दोनों देशों से परहेज समझ आता है। इसलिए जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने और उन्होंने अमरीका से अपने रिश्ते मजबूत रखे तो वह कोई हैरानी की बात नहीं थी। बाद के बरसों में वे जिस तरह पिछले अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के करीब हो गए, और दोनों ने एक-दूसरे का चुनाव प्रचार किया, तो ऐसा लगने लगा था कि भारत अब अमरीकी कैम्प में है। लेकिन जटिल अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में न तो कोई स्थाई दोस्त होते हैं, और न ही स्थाई दुश्मन। यह जरूर हुआ है कि हर आड़े वक्त हिन्दुस्तान के साथ खड़े रहने वाला रूस आज जब यूक्रेन पर हमला करके पश्चिमी दुनिया और योरप का सबसे बड़ा दुश्मन बना हुआ है, तब भारत ने रूस का साथ देना तय किया है, या कम से कम रूस का विरोध नहीं किया है। इससे एक ही बात साबित होती है कि देश के हित किसी पार्टी या नेता के निजी हितों से ऊपर रहते हैं, और मोदी की आज की रूस-यूक्रेन नीति देश की नीति की तरह है, और भारत के विपक्षी राजनीतिक दल भी इस मोर्चे पर सरकार से सहमत दिख रहे हैं। आज अगर भारत का विपक्ष सरकार की आलोचना कर रहा है तो वह यूक्रेन से भारतीय छात्रों की वापिसी को लेकर है, न कि सरकार की विदेश नीति को लेकर।
सरकार की नीतियों से प्रत्यक्ष रूप से न जुड़े हुए स्वतंत्र विचारक रूस के ऐसे हमले के खिलाफ भी हैं। लेकिन यह तो लोकतांत्रिक आजादी है जो कि लोगों को अपने देशहित से ऊपर विश्वहित में सोचने का मौका देती है, सोचने को मजबूर करती है। नक्शे की सरहदी लकीरों को नजरअंदाज करते हुए जो लोग सोच पाते हैं, वे ही लोग किसी एक देश के नागरिक से ऊपर का दर्जा पाते हैं। सरकारों के सामने तो यह मजबूरी रहती है कि उन्हें सबसे पहले अपने देश के भले के बारे मेें सोचना पड़ता है, अपने देश की हिफाजत करनी पड़ती है। लेकिन स्वतंत्र सोच रखने वाले लोग इससे ऊपर की बात भी सोचते हैं और करते हैं। और ऐसा भी नहीं है कि किसी देश का नेता रहते हुए, शासन प्रमुख या राष्ट्र प्रमुख रहते हुए दुनिया के कुछ नेताओं ने अपने देश के हित से ऊपर उठकर कुछ न किया हो। यहीं पर आकर यह पता चलता है कि कोई व्यक्ति अपने देश के शासन प्रमुख हैं, या कि वे विश्व के नेता हैं। कभी-कभी व्यापक अंतरराष्ट्रीय हित के लिए अपने सीमित राष्ट्रीय हितों को कुछ हद तक कुर्बान भी करना पड़ता है, और दुनिया के महान नेताओं ने ऐसी दुविधा की नौबत आने पर विश्वहित को ऊपर रखकर फैसले लिए हैं, पहल की है, और इतिहास में न सिर्फ अपनी बल्कि अपने देश की एक अलग जगह बनाई है।
अब सीरिया, इराक, या अफगानिस्तान जैसे देशों से योरप पहुंचने वाले शरणार्थियों की बात देखें तो पश्चिम के विकसित देशों ने अपने देश के लिए आर्थिक बोझ, समस्याएं, और कुछ हद तक खतरा भी खड़ा करके शरणार्थियों को जगह दी, और अपनी वैश्विक जिम्मेदारी पूरी की। आज भी जब यूक्रेन से दसियों लाख लोगों के शरणार्थी होकर दूसरे देशों में जाने की खबर है तब भी योरप के दूसरे देश इस ऐतिहासिक चुनौती के मौके पर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए डटे हुए हैं। दुनिया का इतिहास तंगनजरिए और तंगदिली को तारीफ के साथ दर्ज नहीं करता, बल्कि उन देशों के बड़प्पन को दर्ज करता है जो कि आसपास या दूर-दूर के देशों से आने वाले शरणार्थियों की मदद करते हैं। जब योरप से दूर बचे हुए देशों से लाखों मुस्लिम शरणार्थी समंदर पार करके बोट से यूरोपीय देश पहुंचे, तो स्थानीय सामाजिक असमंजस के बीच भी सरकारों ने लाखों लोगों को जगह दी। ऐसे में हिन्दुस्तान के उन लोगों को अपने बारे में सोचना चाहिए जिन्हें म्यांमार से जान बचाकर आए हुए रोहिंग्या शरणार्थियों की मौजूदगी आंख की किरकिरी की तरह खटक रही है।
आज जब दुनिया की सारी घोषित महाशक्तियां रूस के हमले पर खेमों में बंटी हुई हैं, तो यूक्रेन से लेकर रूस तक हर एक ने भारत की तरफ देखा, और भारत के साथ की अपील की, उम्मीद की। अब तक हिन्दुस्तान का रूख कूटनीतिक रूप से संयुक्त राष्ट्र में रूस की मदद करता हुआ दिखा, और हिन्दुस्तान ने रूस के खिलाफ वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। लेकिन क्या अपने नागरिकों को यूक्रेन से निकालने के अलावा, रूस के हमले की आलोचना से परहेज करते हुए भी भारत के पास यह विकल्प था, कि वह ऐसे हमले में लोगों की मौत रोकने के लिए इन दोनों देशों के बीच किसी किस्म की मध्यस्थता कर सकता था? या उसका ऐसा कोई वजन नहीं है कि कोई उसकी बात सुनते? ऐसे ही वक्त देश के नेताओं का अंतरराष्ट्रीय महत्व पता चलता है कि वे अपने से सीधे-सीधे न जुड़े हुए लेकिन विश्व शांति के मुद्दे पर किस किस्म की भूमिका निभा सकते हैं। यह मौका अपने देश और अपने वोटरों से ऊपर उठकर विश्व इतिहास में अपने देश की भूमिका दर्ज करवाने का भी रहता है, और आज के दुनिया के तमाम तटस्थ बने हुए देशों के लोगों को अपने देश और अपने नेता की भूमिका के बारे में भी सोचना चाहिए। दुनिया का इतिहास सरहदों के आरपार असर रखने वाले कई नेताओं के ऐतिहासिक वैश्विक योगदान से भरा हुआ है। हम यहां पर किसी की किसी से तुलना करना नहीं चाहते, लोग खुद ही यह काम कर सकते हैं। हम सिर्फ इतना कह सकते हैं कि यूक्रेन से अपने लोगों को बचाने के अलावा भी हिन्दुस्तान की एक भूमिका जंग के इस मोर्चे पर रहनी चाहिए थी, जो कि आज नजर नहीं आ रही है। राष्ट्रहित के सीमित नजरिये से ऐसी तटस्थता को जायज ठहराना कोई मुश्किल काम नहीं होगा, लेकिन इतिहास में अपनी जगह तय करना खुद के हाथ में नहीं होता है, इतिहास आत्मकथा नहीं होती है, उसे दूसरे लोग लिखते हैं।

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