दो बरस में हिंदुस्तान में दर्ज हुई, दो ऑपरेशन घर वापिसी…

-सुनील कुमार॥

यूक्रेन में फंसे हुए हिंदुस्तानी छात्र-छात्राओं को वापस लाने के लिए भारत सरकार ने कई विमान भेजे हैं, और उनमें भारतीय वायुसेना के विमान भी शामिल हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार ने 4 मंत्रियों को तैनात किया है जो कि इन्हें वापस लाने के लिए यूक्रेन के अगल-बगल के देशों तक जाकर वहां से उन्हें विमान में चला रहे हैं। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के वीडियो कल से तैर रहे हैं जिनमें वे छात्र-छात्राओं को मदद करते दिख रहे हैं, और एक जख्मी छात्रा को सहारा देकर विमान पर चढ़ा रहे हैं। भारत सरकार ने यह घोषणा भी की है कि इन सभी को सरकार अपने खर्च पर वापिस लेकर आएगी। यह एक अच्छी बात है कि सरकार अपने देश के नागरिकों की मदद करने के लिए दुनिया भर में जाकर अपने, या किराए के, और वायु सेना तक के, विमान भेजकर, मंत्रियों को भेजकर, इन छात्र-छात्राओं को मुफ्त में हिफाजत से घर लेकर आ रही है। यूक्रेन जाकर अप्लाई करने वाले हिंदुस्तानी छात्र-छात्राओं में अधिकतर ऐसे हैं जिन्हें हिंदुस्तान के मेडिकल कॉलेजों में दाखिला नहीं मिल पाया, और यहां के निजी मेडिकल कॉलेजों की करोड़ों रुपए तक जाने वाली फीस देने की उनकी ताकत नहीं थी, इसलिए वे कम फीस वाले यूक्रेन जाकर वहां डॉक्टर बन रहे हैं। यूक्रेन में कुछ साल रहकर डॉक्टर बनने का कुल खर्च शायद 25-50 लाख के भीतर ही होता है, जो कि हिंदुस्तान के मुकाबले खासा कम है, लेकिन है तो सही। इनमें से बहुत से बच्चे ऐसे परिवारों के थे जो कि महंगी हवाई टिकट भी खरीदने को तैयार थे लेकिन फिर यूक्रेन से विमान उडऩे बंद ही हो गये। पढऩे के लिए दूसरे देश जाने वाले या खासी रकम खर्च करने वाले छात्र-छात्राओं का भी महफूज रहने का अपना अधिकार है, और भारत सरकार की यह जिम्मेदारी भी है। इसलिए आज खबरें सरकार की कोशिशों से भरी हुई हैं। अब जब हर दिन सरकारी विमान यूक्रेन के आसपास के देशों से भारतीय छात्र-छात्राओं को लेकर वापस लौट रहे हैं तो इन खबरों की अहमियत खत्म हो गई है कि समय रहते हुए भारत सरकार ने वहां से भारतीयों को निकलने की न तो चेतावनी दी थी, और न ही कोई इंतजाम किया था।

केंद्र सरकार की यह कोशिशें देखकर याद पड़ता है कि करीब 2 बरस पहले जब हिंदुस्तान में लॉकडाउन हुआ, और एकाएक रेलगाडिय़ां, बस, सबको बंद कर दिया गया, तब किस तरह मजदूर तकलीफें झेलकर महानगरों से और दूसरे प्रदेशों से हिंदुस्तान तक लौटे, अपने गांव वाले हिंदुस्तान तक लौटे। जैसा कि पिछले कुछ समय से लोग लिख भी रहे हैं कि हिंदुस्तान के भीतर भी दो तरह के हिंदुस्तान हैं, तो एक हिंदुस्तान में रहने वाले गरीब लोग उस दूसरे हिंदुस्तान में काम करने गए थे जहां उन्हें काम हासिल था, लेकिन लॉकडाउन के दौर में बिना काम के उन्हें वहां रहने का कोई सहारा नहीं था, महामारी का डर था, और आम लोगों से लेकर केंद्र और राज्य सरकारों तक हर किस्म की अनिश्चितता फैली हुई थी, तो वैसे में लोग अपने बच्चों को गोद में लिए हुए पैदल और साइकिल पर हजार-हजार मील के सफर पर निकल गए थे. उनकी दर्दनाक तस्वीरें इतनी दर्दनाक हैं कि अभी जब फेसबुक पर बहुत से लोगों ने इन्हें पोस्ट करने की कोशिश की तो फेसबुक ने उन्हें एक-एक महीने के लिए ब्लॉक भी कर दिया। जाहिर है कि इन तस्वीरों के खिलाफ फेसबुक पर शिकायतों का सैलाब पहुंचा होगा और उसने इन तस्वीरों को फेक, नकली, दर्ज कर लिया होगा। खैर वह एक अलग बात है मुद्दा यह है कि हिंदुस्तान के ताजा इतिहास में वे दर्दनाक तस्वीरें और वीडियो बहुत अच्छी तरह दर्ज हैं जब इस देश के करोड़ों गरीब मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया था, उनके पास न सिर छुपाने को जगह बची थी, और न अगले वक्त के खाने के लिए पैसे थे, और तो और खाना खरीदने की जगह भी बंद थीं।

अगर लोगों की याददाश्त थोड़ा भी साथ देती होगी तो यह भी दो बरस पहले की ही बात है जब केंद्र सरकार ने फैसला लेकर यह घोषणा की थी कि राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों के मजदूरों को अपने खर्च पर वापस लेकर जाएं। हर राज्य ने अपने अफसरों की तैनाती भी की थी और रेलगाडिय़ों के लिए भारत सरकार को एडवांस में भुगतान करके अपने राज्य के मजदूरों को वापस लाने का काम किया था। दो बरस के भीतर की इन दो घटनाओं को देखें तो यह साफ दिखता है कि जो लोग बिना रिजर्वेशन वाले रेल डिब्बे में ही सफर करने की ताकत रखते हैं, उन्हें सब कुछ अपनी जेब से करना है, या फिर वे अपने राज्य की सरकार के रहमो-करम पर छोड़ दिए जाएंगे। दूसरी तरफ 25-50 लाख रुपए खर्च करके जो लोग अपने बच्चों को यूक्रेन या ऐसे किसी दूसरे देश पढऩे के लिए भेज सकते हैं, उन्हें वापस लाना भारत सरकार की अपनी जिम्मेदारी है, और उन्हें सरकार अपने पैसों पर वापिस लेकर आएगी, उसके मंत्री जाकर इन छात्र-छात्राओं को सहारा देकर विमान में चढ़ाएंगे, और भारतीय वायुसेना के विमान भी इस काम के लिए जाएंगे।

लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि चाहे-अनचाहे हिंदुस्तानी मीडिया का कुछ हिस्सा उस वक्त लगातार लॉकडाउन के वक्त की घर वापिसी की खबरों को दिखा रहा था, और उन खबरों को लेकर सबके दिल जले हुए थे, लेकिन उस वक्त की केंद्र सरकार की ऐसी कोई अपील याद नहीं पड़ती कि रास्ते की सरकारें लोगों की मदद करें, केंद्र सरकार की रेलगाडिय़ां मुफ्त में लोगों को उनके गांव के पास के स्टेशन तक पहुंचाएं, केंद्र सरकार की तरफ से लोगों को खाना भी मिल जाए, और खुले में हजार मील चलने वाले बच्चों को दूध मिल जाए। ऐसी कोई भी कोशिश सरकार के तरफ से की गई हो ऐसा याद नहीं पड़ता, और ऐसा दर्ज नहीं है। बिहार में तो डबल इंजिन की सरकार ने तो राज्य की सरहद पर पहुंचे अपने मजदूरों पर लाठियां भी बरसाई थीं. पता नहीं तथाकथित हिंदुस्तानी जनचेतना को यह याद है या नहीं कि किस तरह मध्य प्रदेश लौटते मजदूर थके हुए महाराष्ट्र में पटरियों पर सो गए थे और ट्रेन तले थोक में कट गए थे।

आज यूक्रेन से अपने बच्चों को वापस लाने के लिए सरकार की कोशिश खबरों में तारीफ पा रही है, लेकिन हिंदुस्तानी याददाश्त इतनी कमजोर है कि वह मजदूरों की घर वापसी को पूरी तरह भूल चुकी है और वैसे भी उन मजदूरों के साथ हिंदुस्तान की जनता के एक हिस्से की हमदर्दी कभी भी नहीं रहती जिन्हें मजदूरी के लिए दूर-दूर दूसरे प्रदेश तक जाना पड़ता है। इतने कमजोर लोगों के साथ तो उस तथाकथित ईश्वर की भी हमदर्दी नहीं रहती जो सर्वशक्तिमान है, और जिसने इन मजदूरों की ऐसी हालत देखी हुई है, तय की हुई है। एक लोकतंत्र का इतिहास कई किस्मों की मिसालों की तुलना दर्ज करता है। आज यह छोटी सी बात हमारे दिमाग में आ रही है, और आगे जाकर जब कभी हिंदुस्तानी लोकतंत्र का इतिहास लिखा जाएगा तो इस देश के ताजा, नवोदित इतिहासकारों से परे, इस देश के बाहर के कुछ ऐसे इतिहासकार भी होंगे, जिन्हें यूक्रेन से घर वापिसी और मुंबई दिल्ली से घर वापिसी में सरकार के रुख और नजरिये का फर्क दिखेगा। लोकतंत्र में तंत्र तो अपनी मनमर्जी कर सकता है, लेकिन लोक को तो तमाम बातों को जोडऩा, और उन पर सोचना चाहिए। उसके बिना उनका तंत्र में पिस जाना तय रहता है।

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