मोदी की भ्रष्टाचार पैरोडी..

यूपीए सरकार को हटाकर खुद सत्ता में आने के लिए भाजपा ने भ्रष्टाचार का भय देश में खड़ा किया था। इसकी शुरुआत 2011 में ही हो गई थी, जब अन्ना हजारे के जरिए लोकपाल आंदोलन खड़ा कर कांग्रेस के खिलाफ अविश्वास का माहौल देश में बनाया गया। खुद नरेन्द्र मोदी ने सितंबर 2013 में जयपुर की एक सभा में जनता को भ्रष्टाचार की एबीसीडी समझाई थी। उन्होंने कहा था ए फॉर आदर्श घोटाला, बी फॉर बोफोर्स घोटाला, सी फॉर कोयला घोटाला, डी फॉर दामाद का घोटाला। दामाद से उनका अभिप्राय राबर्ट वाड्रा से था, जो सोनिया गांधी के दामाद हैं। मोदीजी ने कहा था कि भ्रष्टाचार देश में एक बीमारी है। इसलिए अगर देश को भ्रष्टाचार से पीछा छुड़ाना है तो उसे कांग्रेस मुक्त भारत के लिए कमर कस लेनी चाहिए। इसी सभा में उन्होंने ये भी कहा था कि कांग्रेस के पास न नेता हैं, न नीति और नीयत है और नैतिकता भी नहीं है। ये चार बातें जब हैं ही नहीं तो देश को इनके हाथों में नहीं सौंपा जा सकता।
इसी तरह के भाषण 2014 से पहले मोदीजी ने कई जगह, कई मंचों से दिए। नतीजा ये रहा कि जनता ने सत्ता को कांग्रेस से मुक्त कर दिया। लेकिन देश अब भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हुआ है। भ्रष्टाचार की जो एबीसीडी मोदीजी ने पढ़ाई थी, वो तो सत्ता में आने के लिए गढ़ी गई थी, लेकिन उनके शासन में बात एबीसीडी से आगे बढ़कर एबीजी और एनएसई तक पहुंचती दिख रही है। गौरतलब है कि हाल ही में एक ऐसा घोटाला सामने आया है, जिसे 75 बरसों का सबसे बड़ा घोटाला माना जा रहा है। दरअसल गुजरात की एबीजी शिपयार्ड कंपनी पर सीबीआई ने कथित तौर पर 22,842 करोड़ रुपये की बैंक धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया है। एफआईआर के मुताबिक यह घोटाला 2012 से 2017 के बीच का है। यानी यूपीए सरकार के वक्त धोखाधड़ी का सिलसिला अगर शुरु हुआ तो मोदी सरकार आने के तीन साल बाद भी जारी रहा और इसके बाद लगभग पांच साल बाद जाकर इस पर कानूनी कार्रवाई शुरु हुई है। इससे पहले मोदी सरकार में ही नीरव मोदी और मेहुल चौकसी द्वारा पंजाब नेशनल बैंक के 13 हजार करोड़ हड़पने का मामला सामने आया था। अब तक इसे ही सबसे बड़ी धोखाधड़ी माना गया था। लेकिन अब पता चल रहा है कि एबीजी शिपयार्ड ने आईसीआईसीआई, आईडीबीआई, एसबीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक, इंडियन ओवरसीज़ बैंक और एलआईसी से 22 हजार करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज लिया, उस कर्ज को वापस न चुका कर विदेशों में संपत्ति खरीद ली।
एनसीएलटी यानी राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण में 2017 में इस कंपनी की शिकायत गई और 2019 में इसके बैंक खातों को ‘फ्रॉड’ घोषित कर दिया गया। लेकिन अब जाकर देश के लोगों को पता चल रहा है कि उन्हें एक बार फिर हजारों करोड़ों की ठगी का शिकार होना पड़ा है। जिन बैंकों से इस कंपनी ने कर्ज के नाम पर करोड़ों रुपए हासिल किए, उनमें कुछ सरकारी हैं, कुछ निजी हैं। इन सभी बैंकों में आम जनता को खाता खुलवाने से लेकर हर सारी गतिविधियों के लिए शुल्क चुकाना पड़ता है, अगर समय पर शुल्क का भुगतान न हो, तो अच्छा-खासा हर्जाना भी देना पड़ता है। आम आदमी अपनी गाढ़ी कमाई इन बैंकों में रखती है, ताकि उसके आड़े वक्त में दिक्कत न हो। इसके बाद भी घर, गाड़ी, पढ़ाई, व्यवसाय इन सबके लिए कुछ हजार या लाख का कर्ज लेना पड़े तो उसके लिए सख्त नियम होते हैं, जिनका पालन इन बैंकों के ग्राहक करते हैं। लेकिन एक दिन अचानक पता चलता है कि जिस बैंक में उनका खाता है, उसे सरकार ने किसी दूसरे बैंक में मिला दिया, या उस बैंक पर किसी गड़बड़ी के कारण लेन-देन रोक दिया गया, या फिर किसी बड़े उद्योगपति के कर्ज के नाम पर उनकी गाढ़ी कमाई डूबी हुई बता दी जाती है। कमाल की बात ये है कि उद्योगपतियों को न कर्ज लेने में कोई बाधा होती है, न कर्ज की रकम हड़पने में ना धोखाधड़ी करके देश से बाहर निकलने में कोई तकलीफ होती है। क्योंकि इन उद्योगपतियों के रिश्ते सीधे सत्ता में बैठे लोगों से जुड़े होते हैं।
ना खाऊंगा, न खाने दूंगा का दावा करने वाले नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल में बैंकों में धोखाधड़ी बढ़ी है, ये खुद आरबीआई की रिपोर्ट से जाहिर होता है। 2013-14 में, 205 हजार करोड़ रुपये के डूबे हुए कर्ज थे, जो 2018-2019 में बढ़कर 1,173 हजार करोड़ रुपये हो गए। इसके बाद भी सरकार इस मामले में अपनी कमजोरी देखने की जगह अब भी यूपीए सरकार पर ठीकरा फोड़ने में व्यस्त है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि एबीजी शिपयार्ड का खाता यूपीए के कार्यकाल में एनपीए हुआ था, लेकिन बैंकों ने औसत से कम समय में इसे पकड़ा और अब इस मामले में कार्रवाई चल रही है। यानी घोटाला क्यों हुआ, इसका जवाब देने की जगह सरकार इस बात का श्रेय लूटना चाहती है, इस घोटाले को जल्दी पकड़ लिया गया। सरकार के इस रवैये के बाद भ्रष्टाचार से लड़ने की उसकी कमजोर नीयत पर कोई संदेह नहीं होना चाहिए। भाजपा के पास मोदीजी के रूप में नेता हैं, लेकिन नीति, नीयत और नैतिकता के बारे में उनकी राय क्या है, इस बात का जवाब उन्हें देना चाहिए। क्योंकि देश ने उनकी बातों पर यकीन कर उन्हें सत्ता सौंपी थी।
इस सबसे बड़े घोटाले की जांच और सजा की कार्रवाई कब पूरी होगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन इस बीच नेशनल स्टाक एक्सचेंज से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। शेयर बाजार नियामक सेबी ने कहा है कि एनएसई की पूर्व प्रमुख चित्रा राम कृष्ण ई-मेल पर एक रहस्यमयी ‘योगी’ से मिले निर्देश या सलाह के आधार पर फै़सले लेती रहीं। और उनसे एनएसई की गोपनीय जानकारियां भी साझा करती रहीं। इस अज्ञात ‘योगी’ की सलाह पर उन्होंने आनंद सुब्रमण्यम को एक्सचेंज में समूह परिचालन अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक का सलाहकार नियुक्ति किया था। जिस जगह पर शेयरों की खरीद-फरोख्त से मिनटों में लाखों करोड़ का कारोबार होता है, वहां इस तरह के खुलासे का एक ही अर्थ है कि कोई बड़ी ताकत या ताकतें हैं, जो भारत की अर्थव्यवस्था में खिलवाड़ की नीयत से काम कर रही हैं। देखना यही है कि इस खिलवाड़ में सरकार की भी कोई भूमिका है, या फिर सरकार को कुछ पता ही नहीं कि देश किन हालात से गुजर रहा है।

 

 

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