चौकोने मुकाबले होंगे पंजाब में..
-विनायक शर्मा॥
2017 के पंजाब विधानसभा व 2019 के लोकसभा चुनाव तक अकाली-भाजपा एनडीए गठबंधन में एक साथ थे और 2012 तक तो सरकार बनने पर भाजपा  (पूर्व की जनसंघ) विधायक दल से ही उपमुख्यमंत्री बनाया जाता था। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि 2012 में गठबंधन की सरकार बनने पर 56 विधायकों वाली अकाली पार्टी के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की सरकार में यह पद उन्होंने अपने सुपुत्र सुखवीर सिंह बादल को दे दिया था। यहीं से दोनों दलों में भीतरी खींचतान शुरू हो गई थी।
2017 में विधानसभा के चुनाव होने पर कोंग्रेस को जबरदस्त विजय मिली और कोंग्रेस के कै अमरेंद्रसिंह के नेतृत्व में सरकार ने प्रदेश की सत्ता संभाली। देखा जाए तो इस चुनाव में अकाली दल को जनविरोधी निर्णयों के कारण जनता की नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ा और उसे मात्र 16 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था जबकि चुनावों और सत्ता में वर्षों से उसकी सहयोगी रही भाजपा को भी गेहूं के साथ घुन के पिसने वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए मात्र 3 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था।
2012 के चुनावों में पराजय का सामना करने के पश्चात भाजपा ने 2019 के लोकसभा के चुनावों में अवश्य ही अपनी स्थिति में कुछ सुधार किया था। 2017 के विधानसभा के चुनावों में भाजपा को जहां 5.4% मत प्राप्त हुए थे वहीं 2019 लोकसभा के चुनावों में भाजपा ने विगत चुनावों की तुलना में अपनी स्थिति सुधारते हुये 7.38% मत प्राप्त करते हुये लोकसभा की दो सीटों पर अपनी विजय दर्ज की थी जबकि बड़े जनाधार वाली उसकी सहयोगी पार्टी अकाली दल भी जनता की नाराजगी सहते हुये 2 सीटों पर ही सफलता मिली थी।
अब बात करते हैं आगामी विधानसभा के चुनावों की। 2022 के वर्तमान चुनावों से पूर्व के चुनावों में भाजपा का अकाली दल के गठबंधन था और दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा था। अकाली दल तो 2022 के विधानसभा के चुनावों में भी गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रहा है। इस बार उसके साथ बहुजन समाज पार्टी है जबकि इस बार किसान आंदोलन के कारण कुछ स्थानीय विरोध के बावजूद भाजपा चुनावी समर में नेतृत्व संभालते हुए पहली बार अपने दमखम पर अपने दो नए सहयोगियों के साथ चुनावी मैदान में उतरी है। इस बार उसके सहयोगी हैं कोंग्रेस छोड़ अपना नया दल पंजाब लोक कोंग्रेस के नाम से अखाड़े में उतरने वाले पूर्व मुख्य मंत्री कै अमरेंद्र सिंह और शिरोमणि अकाली दल (संयुक्त) के सरदार सुखदेवसिंह ढींढसा। इसे प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में कहें तो “पंजाब में भाजपा पहली बार खुलकर चुनावी मैदान में उतरी है।”
पंजाब विधानसभा के चुनावों में इस बार जहां 4 दल प्रमुख रूप से चुनावी समर में अपना भाग्य आजमा रहे हैं वहीं किसान मोर्चे के कुछ लोग भी एक नया राजनीतिक दल बना किसानों के नाम पर अपना भाग्य आजमाने चुनाव में उतरे हैं। टिकट न मिलने से नाराज कुछ दलों के नेता निर्दलीय भी लड़ रहे हैं। मोटे तौर से मुख्य मुकाबला कोंग्रेस, अकाली-बसपा गठबंधन, भाजपा-अमरेंद्रसिंह गठबंधन और आम आदमी पार्टी के मध्य ही होने वाला है। इसके अतिरिक्त कुछ दलों के उम्मीदवारों के लिये उनके अपने ही दल के लोग मुसीबत खड़ी करने से बाज नहीं आएंगे और यह परिस्तिथि कमोवेश कोंग्रेस के प्रत्याशियों को ही झेलनी पड़ेगी।
 चौकोने मुकाबले में नतीजे किस दल के पक्ष में जाएंगे इसका कयास लगाना तो बहुत कठिन है लेकिन मैं राजनीतिक विश्लेषक होने के नाते अपने अनुभव के अनुसार कह सकता हूँ कि इस बार त्रिशंकु विधानसभा की प्रबल आशंका बनती है। ऐसे में राष्ट्रपति शासन ही विकल्प होगा। ऐसी परिस्थिति में राज्यपाल के माध्यम से केंद्र की भाजपा सरकार का ही शासन पंजाब में चलेगा और भाजपा इसमें भी लाभान्वित रहेगी।
त्रिशंकु विधानसभा के नतीजों का सबसे बड़ा कारण यह होगा कि चौकोने मुकाबले में मतों का बड़ी संख्या में स्थानांतरण होना । विभिन्न कारणों से दलों को परंपरागत मिलने वाले मतों का बंटवारा भी होगा, ऐसी सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता है। इसके चलते तीसरे या चौथे नम्बर वाले दल के प्रत्याशी द्वारा मत काटने से कोई दूसरा या तीसरा उम्मीदवार अप्रत्याशित रूप से विजयी हो जाए ऐसी परिस्थिति में जिस प्रत्याशी को विजयी समझा जा रहा हो उसे पराजय का मुहं देखना पड़ सकता है।
चौकोने मुकाबले में इतना तो स्पष्ट है कि हार-जीत बहुत ही कम मतों से ही होगी।
चार प्रमुख दलों/गठबंधन में से कोई भी दल 40-42 से अधिक सीटों पर विजय प्राप्त नहीं कर पायेगा। 117 विधायकों वाली पंजाब विधानसभा में सत्ता पर काबिज होने के लिये जादूई अंक 59 की आवश्यकता होगी। यानिकि 59 सीटों पर विजय प्राप्त करनेवाला दल या गठबंधन ही सरकार बनाने का अधिकारी होगा।
अब यदि चुवावोपरांत बनने वाले गठबंधन की बात करें तो कोंग्रेस और आम आदमी पार्टी ही एक दूसरे से मिलकर सरकार बना सकते हैं क्योंकि इन दोनों के साथ अकाली या भाजपा कोई भी मिलने को तैयार नहीं होगा। हां, राजोवाल की संयुक्त समाज पार्टी यदि कोई सीट जीतती है तो वह इनसे मिल सकती है। जहाँ तक अकाली-बसपा गठबंधन का प्रश्न है तो यह भी कोंग्रेस या आम आदमी पार्टी से कभी न समर्थन लेंगे और न ही देंगे। हां, यदि इनको बहुमत के लिये कुछ विधायकों की कमी रह जाती है तो कुछ शर्तों के साथ भाजपा इनको समर्थन दे सकती है। वैसे इसकी संभावना बहुत ही कम है क्योंकि पंजाब में अपने पैरों पर खड़े होने वाली देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा का लाभ तो राष्ट्रपति शासन में ही निहित है।
इन सभी कयासों के विपरीत छोटे दल या कम सीटों वाले दल से दलबदल की संभावना भी रहेगी क्योंकि लोभ लालच तो वर्तमान राजनीति के डीएनए में समा चुका है।
20 फरवरी को अभी एक सप्ताह का समय है और देखते है कि तबतक ऊंट किस करवट में बैठता है !!
-विनायक शर्मा
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