भारत पर कलंक का इतिहास थूक से लिखा जा रहा है…

-सुनील कुमार॥

हिन्दुस्तान में जब कभी यह धोखा होने लगे कि इससे घटिया शायद और कुछ नहीं हो सकेगा, उसी वक्त देश के बहुत से लोग इस खुशफहमी को एक चुनौती की तरह ले लेते हैं, और यह साबित करने लगते हैं कि उनके पहले का घटियापन तो कुछ भी नहीं था, असली माल तो उन्होंने अभी छुपा ही रखा था, जिसे अब पेश कर रहे हैं। लता मंगेशकर गुजरीं, और उनके अंतिम संस्कार के वक्त प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक और सार्वजनिक जीवन के अनगिनत लोगों तक ने श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर फिल्म अभिनेता शाहरूख खान भी वहां पहुंचे, और उन्होंने अपने मुस्लिम रिवाजों के मुताबिक हाथ उठाकर लता मंगेशकर के लिए दुआ की, उनके साथ खड़ीं उनकी सेके्रटरी पूजा ददलानी अपने हिन्दू रिवाजों के मुताबिक हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रही थीं। दुआ करने के तुरंत बाद शाहरूख खान ने अपने धार्मिक रिवाजों के मुताबिक लता मंगेशकर के पार्थिव शरीर की ओर फूंका। इस पर भाजपा के एक नेता, हरियाणा के भाजपा आईटी सेल के प्रभारी अरूण यादव ने शाहरूख की फोटो के साथ यह लिखकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया- क्या इसने थूका है?

यह याद रखने की जरूरत है कि लता मंगेशकर अपनी पूरी जिंदगी सावरकर से लेकर नरेन्द्र मोदी तक की समर्थक रही हैं, कट्टर हिन्दू विचारधारा की रही हैं, और सार्वजनिक जीवन में वे अपनी सोच को बार-बार लिखती भी रही हैं। उनके गुजरने पर केन्द्र की मोदी सरकार ने दो दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया था, और महाराष्ट्र की सरकार ने तीन दिन का। यह शोक चल ही रहा था, राजकीय सम्मान के साथ लता का अंतिम संस्कार हो रहा था, पाकिस्तान सहित दुनिया के बहुत से हिस्सों से लता को श्रद्धांजलि दी जा रही थी, लेकिन दुख-तकलीफ के ऐसे मौके पर एक भाजपा शासित राज्य का भाजपा का आईटी सेल प्रभारी परले से परले दर्जे की यह घटिया नफरत हिन्दुस्तान की एकता पर थूक रहा था। फिर साम्प्रदायिकता को उपजाने-भड़काने और फैलाने के लिए बदनाम एक टीवी चैनल को तो यह नफरत रेडीमेड मिली, उसने अपने स्क्रीन पर इसे फैलाते हुए नफरत के इस थूक को पेट्रोल में तब्दील करने में अपना पसीना बहा दिया। हालत यह हो गई कि पेशेवर नफरतजीवियों ने सोशल मीडिया पर अपनी गंदी सोच के थूक का सैलाब ला दिया, और दुनिया को यह भरोसा दिलाने में लग गए कि शाहरूख ने लता मंगेशकर के शव पर थूका है। ये लोग अपने मां-बाप और उनके भी कई पीढ़ी पहले के पुरखों के नाम पर थूक रहे थे, इस देश की बहुत सी गौरवशाली परंपराओं के नाम पर थूक रहे थे, और हिन्दुस्तान के अच्छे वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं पर भी थूक रहे थे। दिक्कत यह है कि जिनका नाम जपते हुए ये नफरतजीवी रात-दिन सोशल मीडिया पर मेहनताना-प्राप्त भाड़े के हत्यारों की तरह काम करते हैं, उन नामों में से किसी ने भी नफरत के जहर से भरे हुए इस थूक पर कुछ नहीं कहा जो कि लता मंगेशकर के सम्मानपूर्ण अंतिम संस्कार की गरिमा पर थूका गया था। और तो और जिस पार्टी का पदाधिकारी नफरत की इस गंदगी को फैलाने में पूरी तरह बेशर्म और हिंसक हमलावर था, उस पार्टी ने भी अपने इस पदाधिकारी पर कुछ नहीं कहा।

यह देश एक अभूतपूर्व नवनफरत को झेल रहा है। जिस तरह कुछ बरस पहले केदारनाथ से आई हुई बाढ़ ने सब कुछ बहा दिया था, कुछ उसी अंदाज में आज नफरतजीवी लोग हिन्दुस्तान की सारी गौरवशाली परंपराओं, लोकतंत्र के सारे गौरवशाली तौर-तरीकों, और इंसानियत के सारे गौरवशाली मूल्यों को बहाकर गंदे नालों में बाढ़ ला रहे हैं। इनकी गंदगी से, उनकी बदबू से ये नाले भी अपनी नाक बंद कर ले रहे हैं, लेकिन इनकी सेहत पर फर्क नहीं पड़ता। देश के बहुत से लोगों का ऐसा मानना और कहना है कि हिन्दुस्तानियत, और इंसानियत पर सामूहिक रूप से थूकने वाले ये लोग इसी मकसद से मेहनताने पर तैनात किए गए हैं, अब इस बात की हकीकत तो यही लोग बता सकते हैं जो कि यह मेहनताना दे रहे होंगे, या पा रहे होंगे, लेकिन इससे परे एक बात तो तय है कि देश के भीतर साम्प्रदायिक नफरत और हिंसा फैलाने और भड़काने के ऐसे देशद्रोह पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा रही है। अब अगर लता मंगेशकर के पार्थिव शरीर पर भी ऐसा देशद्रोह किया जा रहा है, तो उस सरकार को तो इस पर कुछ कहना और करना चाहिए जिसने कि देश में तीन दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया है। क्या देश का आईटी कानून चुनिंदा लोगों की ऐसी नफरत, और हमारे हिसाब से ऐसे देशद्रोह, को अनदेखा करने के लिए बना हुआ है? एक लोकतांत्रिक देश में, गांधी के देश में ऐसी नफरती हिंसा की फसल लहलहा सकती है, यह सोचना भी कुछ वक्त पहले तक नामुमकिन था, लेकिन अब ऐसा लगता है कि यह देश गांधी का देश नहीं रह गया है, और यह गोडसे का देश हो गया है, एक ऐसा देश बन गया है जिसमें मुस्लिम की जगह महज पाकिस्तान तय कर दी गई है। इस देश को हांकने वाले लोग अगर ऐसी बातों पर भी चुप्पी साधे रखेंगे, तो सबको यह याद रखना चाहिए कि दुनिया का इतिहास बोले हुए शब्दों को तो जितना भी दर्ज करता हो, वह चुप्पी को बड़े-पड़े हर्फों में दर्

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