खामोश हुई रुहानी सुहानी आवाज..

‘जिस तरह कि फूल की ख़ुशबू या महक का कोई रंग नहीं होता, वो महसूस भर होती है, जिस तरह कि बहते हुए पानी के झरने या ठंडी हवाओं का कोई मसकन, या कोई घर-गांव या कोई वतन-देश नहीं होता, जिस तरह कि उभरते हुए सूरज की किरणों का या किसी मासूम बच्चे की मुस्कराहट का कोई मजहब या कोई भेदभाव नहीं होता…वैसे ही लता मंगेशकर की आवाज कुदरत की तखलीक का एक करिश्मा है! मसकन याने घर और तखलीक याने सृजन।

ऊपर लिखे ये शब्द अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के हैं, जो किसी कार्यक्रम में उन्होंने सुरों की साम्राज्ञी लता मंगेशकर के लिए कहे थे। एक महान हस्ती को दूसरी महान हस्ती ही इतने खूबसूरत तरीके से बयां कर सकती है। भारत रत्न, स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने 92 साल की उम्र में 6 फरवरी को अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से देश-दुनिया में फैले उनके प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई है। क्योंकि हर कोई उनकी आवाज से किसी न किसी तरह से जुड़ा हुआ था। करीब आठ दशक तक उन्होंने भारतीय सिनेमा को अपनी रुहानी-सुहानी आवाज के मोतियों से समृद्ध किया। सत्तर-अस्सी सालों में देश बदल गया, भारतीय सिने जगत बदल गया, कई सुपर स्टार रूपहले पर्दे पर चमके और कई अपनी चमक बिखेर कर अंधेरों में गुम हो गए, लेकिन इन सबके बीच ध्रुव तारे की चमक की तरह लता मंगेशकर की आवाज रौशनी बिखेरती रही। और शायद अनंतकाल तक उनकी आवाज का जादू यूं ही बरकरार रहेगा।

लताजी की आवाज की मिठास के लिए जितनी भी उपमाएं दी जाएं, कम हैं। और इस मिठास के साथ जब सुरों की सही संगत मिलती तो एक दैवीय संगीत फूटता। जैसे चमत्कारों का तार्किक वर्णन नहीं हो सकता, उसी तरह लता मंगेशकर की गायकी को चाहे जितना शब्दों में बांधने की कोशिश की जाए, वो कोशिश कम ही लगेगी। इसलिए दिलीप कुमार ने उनके बारे में जो कहा, उसे ही उद्धृत करना पड़ा। उन्होंने लताजी की आवाज को कुदरत की कारीगरी बताया और यही सच है। क्योंकि इस दुनिया में लाखों-करोड़ों लोग सुर साधना करते हैं, एक से बढ़कर एक लाजवाब गाने गाते हैं, हजारों गायकों के करोड़ों प्रशंसक होंगे, लेकिन लता मंगेशकर एक ही रहीं और उनके जैसा शायद ही कोई दूसरा हो। भारत या भारतीय उपमहाद्वीप में अधिकतर गायिकाओं ने उन्हें ही श्रेष्ठता का पैमाना माना।

चाहे स्टेज शो हों या टीवी पर आने वाले संगीत के कार्यक्रम, इनके प्रतिभागियों ने अक्सर लता मंगेशकर या आशा भोंसले के गाने गाकर, उन्हीं के अंदाज को अपनाने की कोशिश कर जीतने की कोशिश की। एक बार लताजी ने इस बारे में कहा भी था कि इन लोगों को अपने तरह से गाना चाहिए, हमारी नकल नहीं करनी चाहिए। लेकिन उन्हें ये कोई कैसे समझा सकता है कि वो गायकी का सबसे ऊंचा पैमाना बन गई थीं और उस पैमाने को छूने की कोशिश में ही बहुत से गायक अपनी सफलता समझते हैं।

लता मंगेशकर ने भी जब फिल्मों में पार्श्व गायकी की शुरुआत की, तो उन्हें नूरजहां, जोहरा बाई अंबाले वाली, राजकुमारी और शमशाद बेगम जैसी स्थापित गायिकाओं के समक्ष अपनी काबिलियत साबित करने और उनके बीच अपने लिए जगह बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। 40 के उस दशक में भारी आवाज वाली गायिकाओं की पूछ-परख थी। जबकि लताजी की आवाज महीन मानी गई। उन्हें अवसर भी मुश्किल से मिले। लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों की खातिर उन्होंने हरेक अवसर को अपना करियर बनाने के लिए बखूबी इस्तेमाल किया। उनके कई संस्मरणों में इस बात का जिक्र है कि कैसे कई बार केवल चाय, बिस्किट खाकर ही उन्होंने घंटों एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो जा-जाकर रिकार्डिंग की। फिल्मजगत में अपना स्थान बनाए रखने के लिए अवसरवादी और व्यवहार कुशल होना पड़ता है, तभी आपके गुणों की कद्र होती है। इस बात को भी लताजी ने बहुत जल्द समझ लिया था।

इसलिए वे अपने से पुरानी गायिकाओं और अपने बाद आने वाली नयी गायिकाओं के बीच भी अपनी जगह बनाए रख पाईं। हालांकि उन पर इस बात के आरोप भी लगे कि उनके कारण बहुत सी होनहार नवोदित गायिकाओं को वो मुकाम हासिल नहीं हुआ, जिसकी वे हकदार थीं। लेकिन फिल्मजगत में इस तरह के आरोपों की उम्र बहुत लंबी नहीं होती। लताजी के पास प्रतिभा के साथ-साथ दृढ़ निश्चय और अपने काम के लिए समर्पण का जो अनूठा मिश्रण था, उस वजह से उन्हें एक ऐसा स्थान हासिल हुआ, जहां कोई दूसरा कदम नहीं रख सका। उम्र हो जाने के बाद जहां बहुत से कलाकार बहकने लगते हैं, या अपनी महानता के गर्व में कला को सहेजने का ख्याल उन्हें नहीं रहता, वहीं लताजी ने कभी अपनी कलाकारी के साथ ढिलाई नहीं बरती। संगीत के रियाज को उन्होंने कभी नजरंदाज नहीं किया। जो लोग महज उनकी उपलब्धियों को देखकर उनकी तरह बनना चाहते हैं, उन्हें लताजी की संगीत यात्रा में आई बाधाओं और उनसे जूझने के उनके हौसले को भी जरूर देखना चाहिए।

एक भरी-पूरी उम्र लेकर लताजी ने इस दुनिया को अलविदा कहा है, हालांकि वे भी इस बात को जानती ही होंगी कि उनके गाए हजारों गानों के साथ लाखों-करोड़ों लोगों के दिलों में वे हमेशा जिंदा रहेंगी। उनकी गायकी का आकाश भी इतना विस्तृत है कि उसमें हर किसी ने अपना एक कोना बना रखा है, जहां लताजी के गाए गीतों के साथ अपने जीवन को जोड़ा जा सकता है। उनका पार्थिव शरीर दुनिया से विदा हुआ है, पर उनकी सुरीली तान तो हमेशा ही झंकृत करती रहेगी।

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