बेहतरीन लोकतांत्रिक देशों से भी बेहतर साबित हुए तालिबान..

-सुनील कुमार॥

हिंदुस्तान में जब लोग सरकारी नियम-कानून से लड़ते हुए थक जाते हैं तो अंधा कानून किस्म की कहानियां लिखी जाती हैं, या फिल्में बनती हैं, और लोग बोलचाल में कहने लगते हैं कि कानून अंधा होता है. अब हिंदुस्तान में तो इस बात को बड़ा आम माना जाता है, लेकिन एक सबसे विकसित देश न्यूजीलैंड की एक ऐसी कहानी सामने आई है जो बताती है कि कोरोना महामारी के दौरान न सिर्फ दुनिया के तानाशाह देश और अधिक तानाशाह हो गए, बल्कि लोकतांत्रिक देशों में भी कई किस्म की तानाशाही की झलक दिखाई पडऩे लगी। कई देशों ने बहुत बुरी तरह से अपने लोगों को काबू किया, और जहां-जहां सरकारें लोगों पर शिकंजा कसना चाहती थीं, उन्हें कोरोना के महामारी नियम और लॉकडाउन के चलते हुए इसका बड़ा अच्छा मौका मिला। न्यूजीलैंड तो एक बड़ा संवेदनशील देश माना जाता है जहां पर अगर मां-बाप अपने बच्चों का ख्याल ठीक से न रखें तो सरकार उन बच्चों को मां-बाप से अलग करके किसी सरकारी इंतजाम में रखती है।

ऐसे न्यूजीलैंड की एक पत्रकार अफगानिस्तान में काम करते हुए गर्भवती थी और वह अपनी बच्ची को जन्म देने के लिए न्यूजीलैंड लौटना चाहती थी। कोरोना के चलते हुए बाहर से लौट रहे अपने ही देश के निवासियों के लिए न्यूजीलैंड की सरकार के नियम इतने कड़े थे कि वह बार-बार कोशिश करके भी अपने देश नहीं लौट पा रही थी जबकि वह वहां लौटकर आइसोलेशन में रहने के लिए भी तैयार थी। न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री भी एक महिला है, और वे अभी शादी करने वाली थीं, उनकी शादी भी देश में लगे हुए कोरोना प्रतिबंधों के चलते हुए आगे बढ़ी। ऐसे देश से तो यह उम्मीद की जा सकती थी कि अपनी नागरिक एक गर्भवती महिला के प्रति वह रहम दिखाए, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। बेलिस नाम की यह पत्रकार अफगानिस्तान में एक संवाददाता के रूप में काम कर रही थी लेकिन बार-बार की कोशिश के बावजूद वे अपने साथी फोटोग्राफर के देश बेल्जियम जा पाईं, और न ही अपने देश न्यूजीलैंड लौट सकीं, ऐसे में एक अविवाहित गर्भवती महिला के रूप में वे अफगानिस्तान में ही रह गईं, और उनका यह तजुर्बा है कि वहां के तालिबान उनके प्रति रहमदिल थे और बेलिस ने कहा कि तालिबान ने अपनी घोषित नीति के खिलाफ जाकर भी बहुत ही रहम की प्रतिक्रिया दी और कहा कि वे यहां सुरक्षित हैं, उन्हें होने वाली संतान मुबारक हो, और तालिबान-अफगानिस्तान उनका स्वागत करते हैं। जब वे बगल के देश कतर में रहते हुए बेल्जियम और न्यूजीलैंड जाने की कोशिश कर रही थीं, तब कतर के नियम भी अविवाहित गर्भवती महिला के खिलाफ थे और ऐसे में इस पत्रकार ने तालिबान के अफगानिस्तान ही लौटना पसंद किया जिन्होंने उसके संदेश पर तुरंत ही उसका स्वागत किया।

यह याद रखने लायक बात है कि पिछले साल जब अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिक वापस लौटे और वहां पर अल जजीरा के लिए रिपोर्टिंग कर रही बेलिस ने तालिबान नेताओं से महिलाओं और लड़कियों से उनके सुलूक के बारे में सवाल करके पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था और पूरी दुनिया के सामने तालिबान के लिए शर्मिंदगी की एक नौबत खड़ी की थी। आज वही तालिबान उनकी मदद को तैयार थे और उनका अपना देश न्यूजीलैंड नियमों का जाल बिछाते चल रहा था। आखिर में जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मुद्दा चारों तरफ नाराजगी खड़ी करने लगा तब जाकर न्यूजीलैंड सरकार ने महीनों की मनाही के बाद अब बेलिस को वापस आने की इजाजत दी है। इस दौरान उसे न्यूजीलैंड सरकार ने यह भी कहा था कि अगर वह अपने-आपको खतरे में पड़ा हुआ बताकर लौटने की अर्जी देगी तो सरकार उसकी इजाजत दे सकेगी, लेकिन तालिबान के बीच हिफाजत से रह रही न्यूजीलैंड की इस पत्रकार ने ऐसी अर्जी देने से मना कर दिया था, और कहा था यह बात सच नहीं है कि वह खतरे में है, इसलिए वे ऐसा लिखकर नहीं देंगी। इस पत्रकार ने एक बुनियादी सवाल यह भी उठाया था कि अगर न्यूजीलैंड की सरकार एक गर्भवती महिला की हालत को देखते हुए उसे भी नाजुक वक्त के पैमाने पर खरा नहीं पाती है, तो फिर नाजुक वक्त और हो कौन सा सकता है?

हिंदुस्तान जैसे देश में तो लड़कियों और महिलाओं के साथ भेदभाव बहुत आम है और कहीं उनके जींस पहनने पर रोक लगाने की कोशिश होती है, तो कहीं उनके मोबाइल फोन रखने पर, और इस देश के मुख्यमंत्री तक ऐसे कहने वाले हैं, जो मानते हैं कि महिलाओं को रात को बाहर नहीं निकलना चाहिए, वरना मानो वे बलात्कार के लायक रहती हैं। दूसरी तरफ बहुत से नेता महिलाओं के चाल-चलन के बारे में गंदी और ओछी बातें करने के लिए जाने जाते हैं, जिनमें से बहुत सी बातें तो संसद के भीतर भी हुई हैं। दुनिया के और भी कई देश ऐसे हैं जो महिलाओं के साथ कई किस्म के भेदभाव करते हैं, लेकिन विकसित लोकतंत्रों से ऐसी उम्मीद नहीं की जाती है। अभी तो पूरी तरह से नियंत्रित सरकारी व्यवस्था वाले चीन का हाल यह है कि उसने अपनी आबादी बढ़ाने के लिए तीसरी संतान होने पर किसी महिला को मिलने वाला मातृत्व अवकाश पहले दो बार के मातृत्व अवकाश से और अधिक लंबा मंजूर किया है. यानी जब देश को अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए आबादी बढ़ाना जरूरी लग रहा है तो वह महिलाओं पर से एक बच्चे की बंदिश को हटा कर दो बच्चों की छूट दे रहा है, और 2 साल के भीतर भीतर दो बच्चों की छूट को हटाकर 3 बच्चों पर प्रोत्साहन दे रहा है। एक महिला का अपने शरीर पर, अपने बच्चों पर किसी तरह के हक का सम्मान नहीं है, उसके बदन को पूरी तरह से सरकार की अर्थव्यवस्था की जरूरत से जोड़ दिया गया है।

दुनिया की अलग-अलग व्यवस्थाओं में महिलाओं के साथ भेदभाव के अलग-अलग तरीके हैं, ये भेदभाव कमोबेश अधिकतर जगहों पर है। हमने अभी चीन की चर्चा की है, लेकिन चीन से ठीक उल्टे एक लोकतंत्र अमेरिका का हाल यह है कि वहां पर किसी कारोबार में सबसे अधिक ऊंचाई पर पहुंचने वाली महिला को भी रोकने के लिए एक अदृश्य और काल्पनिक कांच की छत लगी रहती है कि वह उससे अधिक तरक्की न कर सके। ग्लास सीलिंग वाली यह बात वहां पर अधिकतर जगहों पर साबित होते चलती है। न्यूजीलैंड जैसे उदार और विकसित लोकतंत्र का यह मामला बताता है कि महामारी के चलते सरकारों ने लोकतांत्रिक रुख को कई किस्म से छोड़ भी दिया है, और मनमानी लाद दी है। हमने हिंदुस्तान में भी लॉकडाउन और रातों-रात ट्रेन-बस बंद करने जैसे फैसले देखे हुए हैं। और पूरी दुनिया का यह अनुभव है कि महामारी को तानाशाह मिजाज देशों ने अपने लोगों के ऊपर एक हथियार की तरह भी इस्तेमाल किया है। इस गर्भवती महिला पत्रकार के मामले को लेकर अलग-अलग देशों को अपने महामारी नियमों के बारे में सोचने की जरूरत है।

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