प्रेस्टीट्यूट के बाद सुपारी मीडिया, जनरल वी के सिंह का अचेतन मन

-सुनील कुमार॥

अमेरिका के एक सबसे प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाईम्स ने एक रिपोर्ट छापी है जिसमें उसने बताया है कि दुनिया के किन-किन देशों ने इजरायल से पेगासस नाम का जासूसी घुसपैठिया सॉफ्टवेयर खरीदा था, और अपने लोगों की जासूसी की थी। उसने इसमें अमेरिका की सबसे बड़ी जांच एजेंसी का नाम भी दिया है कि एफबीआई ने भी इसे खरीदा था और इसका इस्तेमाल भी किया है. जबकि पेगासस बनाने वाली कंपनी ने अधिकृत रूप से साल भर पहले यह कहा था कि उसने यह सॉफ्टवेयर इस तरह से बनाया है कि यह अमेरिका के टेलीफोन पर काम नहीं करेगा। अब एफबीआई ने इसे अमेरिकी फोन पर इस्तेमाल किया या किसी और देश के टेलीफोन पर, यह एक अलग मुद्दा है लेकिन मुद्दे की बात यह है कि न्यूयॉर्क टाईम्स ने खुद अमेरिका की सबसे बड़ी घरेलू जांच एजेंसी का नाम भी इसमें लिखा है। उसने हिंदुस्तान सरकार का भी नाम लिखा है कि इजराइल से एक बड़े हथियार सौदे के तहत उसने बाकी हथियारों के साथ-साथ पेगासस भी खरीदा था, और हिंदुस्तान के पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ इस्तेमाल किया था। इस पर भारत के केंद्रीय मंत्री और रिटायर्ड आर्मी जनरल वी के सिंह ने न्यूयॉर्क टाईम्स को सुपारी मीडिया बताया है। अब इन शब्दों को कोई अमेरिकी तो ठीक से समझ नहीं पाएंगे क्योंकि वहां सुपारी चलती नहीं है, लेकिन हिंदुस्तान में लोग इस बात को समझ सकते हैं कि वी के सिंह न्यूयॉर्क टाईम्स को ठेके पर काम करने वाला कोई मुजरिम गिरोह या हत्यारा साबित कर रहे हैं। लोगों को अगर याद होगा तो वे कुछ बरस पहले हिंदुस्तान के मीडिया को भी प्रेस्टीट्यूट कहकर प्रॉस्टिट्यूट से उसकी तुलना कर चुके हैं। उनके मन में लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए जो हिकारत है वह हर कुछ महीनों में खुलकर सामने आती है। केंद्र सरकार का एक मंत्री जो यह कहने की हालत में भी नहीं है कि उसकी सरकार ने यह सॉफ्टवेयर खरीदा या नहीं, और जिसकी सरकार संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस पर कुछ भी बोलने से बच रही है कि उसने हिंदुस्तान के लोगों पर पेगासस का इस्तेमाल किया है या नहीं, वह एक प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबार को सुपारी मीडिया कह रहा है। क्या यह सरकार की भाषा है? क्या यह फौज की सबसे ऊंची वर्दी पहनकर रिटायर होने वाले किसी इंसान की भाषा होनी चाहिए? हिंदुस्तान के एक केंद्रीय मंत्री की भाषा होनी चाहिए कि वह अपने देश के प्रेस को प्रेस्टीट्यूट कहे और उसे वेश्या करार दे? वैसे एक बात है कि वेश्या न तो अपने देश को बेचती है और न ही अपने देश के नागरिकों की आजादी को बेचती है, वह महज अपना बदन बेचती है जिस पर उसका 100 फीसदी हक होता है। दुनिया के इतिहास में ऐसी कोई वेश्या याद नहीं पड़ती जिसने अपने ग्राहकों के घर की भी जासूसी की हो, अब जो सरकारें ऐसी जासूसी कर रही हैं, वे अपने बारे में सोचें कि वे क्या हैं और क्या उन्हें प्रेस को प्रेस्टीट्यूट कहकर गाली देने का हक है, या किसी प्रॉस्टिट्यूट को भी गाली की तरह इस्तेमाल करने का कोई हक है?

जनरल वी के सिंह को अपना सामान्य ज्ञान थोड़ा सा बढ़ाना चाहिए और दुनिया के जो प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय अखबार या टीवी चैनल हैं, उनकी साख के बारे में भी देखना चाहिए कि वे किस तरह अपनी आजादी कायम रख सकते हैं, रखते हैं, और कुछ दूसरे लोकतंत्रों के ठेके पर काम करने वाले समर्पित भक्त-मीडिया की तरह जो लोग सचमुच ही सुपारी उठाकर काम नहीं करते हैं। बात थोड़ी अटपटी है लेकिन मन में उठती है कि सुपारी मीडिया का यह संदर्भ जनरल वी के सिंह के दिमाग में आया कहां से होगा? क्योंकि अमेरिकी मीडिया तो खुलकर अपनी नीति घोषित करके किसी पार्टी या प्रत्याशी का साथ देता है या उसका विरोध करता है उसमें लुका-छिपा कुछ भी नहीं रहता, लेकिन क्या वी के सिंह की नजर में कोई दूसरे ऐसे मीडिया घराने हैं जो कि सुपारी मीडिया की तरह काम कर रहे हैं? क्या वी के सिंह के अचेतन की कोई जानकारी उनकी जुबान पर आ गई? इस बारे में जानकार लोगों को वी के सिंह से पूछना चाहिए। इसके पहले के वर्षों में भी वे लगातार अनर्गल, अवांछित, नाजायज बातें कहते हैं और अपनी वर्तमान या भूतपूर्व वर्दी का अपमान करते हैं। वी के सिंह एक अकेली ऐसी बड़ी वजह है जो लोगों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि लोकतांत्रिक राजनीति में किसी रिटायर्ड फौजी की जगह क्यों नहीं होनी चाहिए।


आज से संसद का सत्र शुरू हुआ है और यह जाहिर है कि पेगासस का मुद्दा वहां उठेगा, इसलिए सुप्रीम कोर्ट से लेकर देश की दूसरी लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी इस बारे में सोचना होगा कि पेगासस का यह रहस्य खुलने में और कितना वक्त लगेगा? सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा साफ-साफ कुछ भी कहने से मना कर देने के बाद अदालत ने अपने स्तर पर एक एक्सपर्ट जांच कमेटी बनाई थी, और उससे 60 दिनों के भीतर रिपोर्ट मांगी थी कि क्या भारत सरकार ने पेगासस खरीदा था, क्या उसका इस्तेमाल हुआ था, और इससे जुड़ी हुई और बहुत सी बातें। इन 60 दिनों का वक्त तो शायद निकल गया है, और वह जांच अभी किसी किनारे पहुंची हो या ना पहुंची हो, पेगासस को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स की ताजा रिपोर्ट सामने आई है। किसी भी अखबार की रिपोर्ट को हम अदालती सुबूत तो नहीं मान रहे, लेकिन उसे लेकर इस जांच कमेटी को सरकार से पूछताछ तो करनी ही चाहिए। क्या पेगासस खरीदने के लिए केंद्र सरकार ने एक इतना बड़ा पैकेज तैयार करके इजराइल से हथियार खरीदे कि जिसके ग_े के बीच दबकर पेगासस भी आ जाए, और सरकार के किसी बिल में पेगासस का भुगतान अलग से न दिखे ? अब जब इजराइल के साथ हुए ऐसे बड़े सौदे की जानकारी छपती है, सुप्रीम कोर्ट और उसकी जांच कमेटी की भी जिम्मेदारी हो जाती है कि जांच कमेटी इस जानकारी को परखे और सरकार से उस पर जवाब मांगे। इस तरह का कोई घुसपैठिया हथियार खरीदकर अपने ही लोकतांत्रिक नागरिकों के खिलाफ अगर उसका इस्तेमाल भारत सरकार ने किया है, तो यह बात खुलकर सामने आनी चाहिए। खुद सत्तारूढ़ भाजपा के एक वरिष्ठ सांसद जो कि कांग्रेस और सोनिया परिवार के प्रति अपनी नफरत के लिए बरसों से जाने जाते हैं, सुब्रमण्यम स्वामी ने भी सरकार से पेगासस की ऐसी खरीदी की इस अखबार की रिपोर्ट पर जवाब मांगा है। अभी पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट में है और वहां सरकार से कोई जवाब देते बन नहीं रहा है क्योंकि वह शायद वहां सच मानने की हालत में नहीं है, इसलिए अब पूरी जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट की बनती है कि जितनी ताजा जानकारियां आ रही हैं उन पर भी गौर करने के लिए अपनी एक्सपर्ट कमेटी को कहे। लोकतंत्र में यह सिलसिला नहीं चल सकता। लोगों को याद होगा कि अमेरिका में विपक्षी पार्टी की जासूसी जब पकड़ाई और वाशिंगटन पोस्ट नाम के अखबार के रिपोर्टरों ने वॉटरगेट कांड नाम से सच को उजागर किया, तो उस वक्त के ताकतवर राष्ट्रपति निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा था। आज हिंदुस्तान अपनी ही सरकार को लेकर एक संदेह से घिरा हुआ है। यह नौबत सुधरनी चाहिए, और ऐसी कोई वजह नहीं है कि हिंदुस्तान का सुप्रीम कोर्ट इस नौबत को सुधार न सके. ऐसे में वक्त इसलिए मायने रखता है कि इस दौर में देश के नागरिकों की आजादी खतरे में बनी हुई है।

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