दिल्ली हाई कोर्ट में महिला के हक़ के खिलाफ केंद्र सरकार के तर्क विजय तेंदुलकर की याद दिलाते हैं..

-सुनील कुमार॥

विख्यात नाटककार विजय तेंदुलकर का एक नाटक था ‘शांतता कोर्ट चालू आहे’। इस नाटक में एक जगह फंसे हुए लोगों की रात गुजारने के लिए एक खेल खेलने की कहानी है जो वक्त गुजारने के लिए एक अदालत का नाटक खेलने लगते हैं। इसमें कोई जज बन जाता है, कोई वकील, और एक महिला को घेरकर उस पर तरह-तरह के आरोप लगाए जाते हैं, इस मामले में जैसे-जैसे यह नाटक आगे बढ़ता है वैसे-वैसे उसके पुरुष पात्र लगातार उस महिला के चाल-चलन पर, उसकी दूसरी बातों पर तरह-तरह के काल्पनिक हमले करने लगते हैं, और नाटक यह उजागर करने लगता है कि पुरुष की मानसिकता किसी महिला के खिलाफ किस हद तक घटिया और हिंसक हो सकती है। कल जब दिल्ली हाईकोर्ट में पति-पत्नी के बीच जबरिया सेक्स के खिलाफ वैवाहिक जीवन में बलात्कार नाम से चर्चित एक मुकदमे की सुनवाई चल रही थी तो उसमें केंद्र सरकार के तर्क सुनना कुछ इसी तरह का था, जिस तरह विजय तेंदुलकर के नाटक में कटघरे में खड़ी की गई एक महिला के खिलाफ पुरुषों की हिंसक सोच लगातार हमले करती है। बलात्कार के आरोपों से घिरा हुआ कोई आदमी अपने बचाव के लिए अदालत में जितने तरह के तर्क दे सकता है उससे कहीं अधिक किस्म के तर्क केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में दिए।

अदालत में केंद्र सरकार ने कहा कि इस मामले में भारत आंख मूंदकर पश्चिमी देशों का अनुकरण नहीं कर सकता। पश्चिम के कई देशों ने मैरिटल रेप को अपराध के दर्जे में रखा है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि भारत भी वैसा कर ले। केंद्र सरकार का तर्क था कि भारत विशाल विविधताओं से भरा देश है और इसमें इसकी अपनी समस्याएं हैं, साक्षरता, महिलाओं में आर्थिक सशक्तिकरण का अभाव, समाज का चरित्र, गरीबी जैसे कई पहलू हैं, जिन पर विचार किए बिना मैरिटल रेप को अपराध बनाने की बात नहीं सोची जा सकती। केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि दहेज उत्पीडऩ को रोकने के लिए बनाए गए कानून का बेजा इस्तेमाल जिस तरह से होता है उसे देखते हुए भी ऐसा कोई कानून वैवाहिक जीवन में बलात्कार स्थापित करने के लिए नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि यह तय करना मुश्किल लगता है कि वैवाहिक संबंध में कब किस परिस्थिति में महिला ने यौन संबंध बनाने की सहमति वापस ले ली। केंद्र सरकार का तर्क है कि बलात्कार के मौजूदा कानून में अपराध की शिकार महिला की गवाही ही सजा दिलाने के लिए पर्याप्त है, लेकिन शादीशुदा जिंदगी में यह साबित करना मुश्किल हो जाएगा कि कब महिला ने वैवाहिक संबंध के भीतर पति को दिए गए यौन संबंध बनाने के अधिकार को वापस ले लिया। इस सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि इसे अपराध घोषित करने के लिए समाज में एक आम सहमति का व्यापक आधार होने की जरूरत भी होगी।

केंद्र सरकार ने अपने तर्कों में समझदारी को हक्का-बक्का करने वाली कई बातें कही हैं। उसका यह तर्क कि भारत की अपनी समस्याएं हैं और यहां पर साक्षरता, और महिलाओं में आर्थिक सशक्तिकरण का अभाव है, यह तर्क शादीशुदा महिलाओं को पति के बलात्कार के खिलाफ अधिकार देने के खिलाफ इस्तेमाल किया गया है! यह तर्क कायदे से तो भारतीय महिलाओं को मजबूत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए था कि आज उनमें आर्थिक सशक्तिकरण का अभाव है, साक्षरता का अभाव है, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे महिलाओं के खिलाफ इस्तेमाल कर लिया है जैसे कि हिंदुस्तानी समाज में महिलाओं की आर्थिक सशक्तिकरण न होने के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं। फिर केंद्र सरकार ने दहेज प्रताडऩा से संबंधित कानून के बेजा इस्तेमाल की बात कही है। इस कानून के तहत कोई महिला शिकायत दर्ज करा सकती है लेकिन इस पर सजा तो जांच और सबूतों के बाद ही हो सकती है। और जहां तक किसी कानून के बेजा इस्तेमाल होने की बात है तो हिंदुस्तान का सवर्ण तबका लगातार यह बात कहता है कि देश में दलित और आदिवासी तबकों के संरक्षण के लिए बनाए गए विशेष कानून एससी-एसटी एक्ट का बेजा इस्तेमाल होता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक बार-बार यह मामला जाने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट को आखिर यह मानना पड़ा कि इस कानून के तहत शिकायत होने पर गिरफ्तारी से कोई रियायत नहीं दी जानी चाहिए। ऐसे दूसरे कानून हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि उनका बेजा इस्तेमाल होता है। केंद्र सरकार जिन सांसदों के बहुमत से बनती है उनमें से अधिकतर सांसद चुनाव कानून को तोडक़र, अंधाधुंध खर्च करके, काले धन का इस्तेमाल करके सत्ता पर आते हैं, और सरकार बनाते हैं। तो क्या चुनाव कानून को तोडऩे वाले सांसदों का बहुमत देखते हुए संसद को भंग कर दिया जाए, या चुनावों को भंग कर दिया जाए? सरकारें भ्रष्ट रहती हैं, यह बात निर्विवाद रूप से स्थापित है, तो क्या निर्वाचित लोगों को सत्ता देने के बजाय फौज को सत्ता दे दी जाए? जब कानूनों के बेजा इस्तेमाल का तर्क दिया जा रहा है तो वह महिलाओं के खिलाफ दिया जा रहा है, यह तर्क नहीं दिया जा रहा कि इस देश में कानून रहते हुए भी समाज महिलाओं को उनके माता-पिता की संपत्ति में जायज हक क्यों नहीं देता? जितने कानून गिनाये जा रहे हैं वे महिलाओं को कसूरवार मानकर बताये जा रहे हैं कि वे बलात्कार की झूठी रिपोर्ट लिखवाती हैं, वे दहेज प्रताडऩा की झूठी रिपोर्ट लिखवाती हैं। यह नजरिया अपने-आपमें बतलाता है कि इस केंद्र सरकार, या ऐसी किसी और केंद्र सरकार से भी हिंदुस्तानी औरत को कोई इंसाफ मिलने की उम्मीद नहीं हो सकती।

यह समझने की जरूरत है कि इस देश में महिलाओं के हक के लिए जब भी कोई कानून बने हैं, उनका जमकर विरोध हुआ है। जब सती प्रथा को रोकने की बात हुई तो एक हिंदुस्तानी हाई कोर्ट जज तक सती प्रथा के पक्ष में खुलकर सामने आ गए थे कि यह हिंदू महिला का अपना अधिकार है। जब मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से आजादी दिलवाने का कानून बना तो हिंदुस्तान के तमाम भाजपा विरोधी दल मुस्लिम, और खासकर मुस्लिम मर्द के सबसे बड़े हिमायती बन कर सामने आ गए कि मानो मुस्लिम औरत तीन तलाक पाने के ही लायक है। जिस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने एक मुस्लिम महिला शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया था, उस वक़्त राजीव गांधी की अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बहुमत वाली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए कानून बना दिया था कि मुस्लिम महिला को हक कैसे दिया जा सकता है। और कांग्रेस पार्टी शाहबानो की आह से कभी नहीं उबर सकी। इसी तरह बाल विवाह से लड़कियों को बचाने के लिए जब कानून बना था, तो बाल विवाह को सामाजिक परंपरा करार देते हुए उस कानून का जमकर विरोध हुआ था और आज भी जहां-जहां सामाजिक कार्यकर्ता या सरकार बाल विवाह को रोकने जाते हैं, उनका विरोध करने के लिए समाज के ठेकेदार खड़े हो जाते हैं। इस तरह के अनगिनत मामले हैं जिनमें महिला को किसी अधिकार के लायक समझा ही नहीं गया था, लेकिन या तो पहले सामाजिक आंदोलन हो गए, या पहले कानून बना और उसके बाद कानून और समाज दोनों ने मिलकर लंबा संघर्ष करके लड़कियों और महिलाओं को उनका हक दिलाया।

जिस भ्रूण परीक्षण मेडिकल जांच से गर्भवती लडक़ी को मारा जाता था, उस जांच को गैरकानूनी करार देने का काम बहुत समय बाद हो पाया जब तक उस जांच की मेहरबानी से दसियों लाख या करोड़ों लड़कियों को मार डाला गया होगा। तो जन्म के पहले से लेकर पति के मरने के बाद सती बनाने तक हिंदुस्तानी लडक़ी और महिला को तरह-तरह से कुचला जाता है और जब कभी उसके हक के लिए किसी कानून को बनाने की बात होती है तो सरकार और समाज शुरू में लंबे समय तक इसके खिलाफ कमर कसकर खड़े हो जाते हैं. महिला को हक़ देने के खिलाफ कुछ वैसे ही मर्दाने तर्क कल दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार ने दिए हैं, और सरकार की भाषा बहुत ही अपमानजनक है। किसी कानून के बेजा इस्तेमाल होने के डर से अगर उस कानून को न बनाया जाए तो देश का ऐसा कौन सा कानून है जिसका आज बेजा इस्तेमाल नहीं होता है? देश में टैक्स की छूट के लिए या किसी सब्सिडी को पाने के लिए, जिस किसी भी बात के लिए कोई कानून बना है, उसे करोड़ों लोग तोड़ रहे हैं। सरकार में बैठे हुए और जनता के पैसों पर पल रहे नेता और अफसर रात दिन भ्रष्टाचार कर रहे हैं, तो क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कानून न बनाया जाए? क्या उस कानून को लोग तोड़ते हैं इसलिए उसे खत्म कर दिया जाए? केंद्र सरकार की नीयत और सोच बहुत ही दकियानूसी है और इससे न सिर्फ भारतीय महिलाओं का बल्कि पूरे भारतीय समाज का बहुत बुरा होगा। केंद्र सरकार अगर अपनी बात यहां तक सीमित रखती कि ऐसे किसी कानून पर विचार करते हुए पहले यह देखना चाहिए कि उसका कैसा-कैसा बेजा इस्तेमाल हो सकेगा, तब भी बात समझ में आती, लेकिन केंद्र सरकार ने तो भारतीय महिलाओं में सशक्तिकरण न होने की बात उठाकर ऐसा कहने की कोशिश की है कि मानो भारतीय महिला की आर्थिक कमजोरी के लिए वह खुद मुजरिम है। केंद्र सरकार के वकील के रखे गए पूरे पक्ष को और अधिक खुलासे से देखना चाहिए और देश के जागरूक लोगों को इसके खिलाफ एक जनमत तैयार करना चाहिए। जिस देश की संसद और सरकार कई दशक गुजार दें लेकिन महिला आरक्षण का कानून न बनाएं, उस देश में महिलाओं को किसी इंसाफ की कोई उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए।
-सुनील कुमार

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