सर्वत्र विद्यमान ईश्वर को किसी खास अवैध कब्जे, अवैध निर्माण की जरूरत क्यों? -HC

-सुनील कुमार॥

मद्रास हाई कोर्ट ने अभी एक सडक़ किनारे मंदिर के अवैध कब्जे के मामले में बड़ा शानदार हुक्म दिया है। एक स्टेट हाईवे के किनारे एक मंदिर अवैध कब्जे पर बनाया गया और जब इसे हटाने की बात हुई तो मंदिर ट्रस्ट हाईकोर्ट तक पहुंच गया और अपील की कि मंदिर न हटाया जाए। इस पर जस्टिस एस वैद्यनाथन और जस्टिस भरत चक्रवर्ती की बेंच ने कहा ईश्वर हर जगह मौजूद है और उसे अपनी दिव्य उपस्थिति के लिए किसी खास जगह की जरूरत नहीं है। जजों ने कहा कि कोर्ट में याचिका दायर करने वाले हाईवे की जमीन को मंदिर के नाम पर कब्जा नहीं कर सकते। इसके साथ ही यह जमीन सरकारी और सार्वजनिक है इसलिए इसका इस्तेमाल किसी भी जाति और धर्म के लोग कर सकते हैं। अगर याचिकाकर्ता भक्तों को उसी इलाके में पूजा की सुविधा देनी है तो इसके लिए वे आजाद हैं, वे अपनी खुद की जमीन दें, वहां मंदिर बनवाएं और मूर्ति को ले जाकर वहां पर रख दें। हाईकोर्ट जजों ने यह साफ किया कि अगर इस मंदिर को वहां रहने की इजाजत दी जाती है तो फिर हर कोई ऐसी मांग करेगा। जजों ने कहा कि अगर ऐसी मान मान ली जाती है तो हर कोई सरकारी और सार्वजनिक जमीन पर कब्जा करने लगेंगे, और यह तर्क देने लगेंगे कि उससे कोई जनसुविधा नहीं रुक रही है इसलिए उन्हें भी अपने अवैध कब्जे पर कायम रहने दिया जाए। साथ ही जजों ने यह टिप्पणी भी की कि धर्म के नाम पर लोगों को बांटने के लिए सभी समस्याओं का मूल कारण कट्टरपंथ है।

मद्रास हाई कोर्ट का यह आदेश शानदार और साहसी है जिसमें धर्म के नाम पर हिंदुस्तान में चल रही बदअमनी को कुछ हद तक रोकने की कोशिश की गई है। आज हम पूरे देश में देखते हैं चारों तरफ धर्म स्थलों के नाम पर सरकारी जमीन, सार्वजनिक जमीन, सडक़ों के किनारे, इन सब पर कब्जा कर लिया जाता है, और इस कब्जे के साथ-साथ वहां पर दुकानें निकाल दी जाती हैं, कारोबार शुरू हो जाता है, और मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी चले जाए तो भी राज्य सरकारें कोई कार्रवाई करने से कतराती हैं। छत्तीसगढ़ में ही ऐसा एक मामला है जिसमें राजधानी रायपुर में एक बड़े नेता के परिवार ने शहर के सबसे प्रमुख धर्म स्थल के पास की सरकारी जमीन पर मंदिर का विशाल अवैध निर्माण किया, सुप्रीम कोर्ट ने उसे तोडऩे के लिए समय सीमा तय की, लेकिन फिर जाने कौन सा कानूनी या गैर कानूनी रास्ता ऐसा निकाला गया कि वह निर्माण आज तक खड़ा है, और एक के बाद दूसरी सरकार भी धार्मिक भावनाओं को छूने से बच रही है. इसे देखते हुए पूरे प्रदेश में यह माहौल है कि धर्म के नाम पर किया गया कोई भी अवैध कब्जा या अवैध निर्माण देश की कोई अदालत नहीं हटा सकती। यह बात सिर्फ मंदिर को लेकर नहीं है, यह बात मस्जिद, मजार, दरगाह, गुरुद्वारा, और शायद चर्च को लेकर भी है। इन बड़े और संगठित धर्मों से परे छोटे धर्म या पंथ भी ऐसे हैं जो कि अवैध कब्जे और अवैध निर्माण को अपनी धार्मिक आजादी मानते हैं और धड़ल्ले से उसमें लगे रहते हैं।

बहुत सा धार्मिक निर्माण तो इसलिए होता है कि उसके आसपास कारोबारी निर्माण हो जाए और स्थानीय प्रशासन उनमें से किसी को भी न छू सके। लोगों का यह भी देखा हुआ है कि किस तरह जब अदालत बंद रहती है और 2 दिनों के लिए सरकारी दफ्तर बंद रहते हैं तो ऐसे दिनों को छांटकर किसी धर्म के लोग बड़ी संख्या में कारसेवक जुटाकर, पहले से तैयारी करके, अंधाधुंध रफ्तार से अवैध निर्माण करते हैं, और फिर नेता और सरकार उनकी तरफ से तब तक आंखें मूंदे रहते हैं जब तक कि वह निर्माण पूरा न हो जाए। यह मिली-जुली नूरा कुश्ती जनता की कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों और धर्म को हाँक रहे लोगों के बीच चलती ही रहती है. दोनों के बीच अच्छी सांठगांठ और समझ-बूझ रहती है कि किस तरह कभी अदालत को बीच में डालकर धार्मिक अवैध निर्माण को बचाया जा सकता है, और छत्तीसगढ़ का मामला तो पूरे हिंदुस्तान के सामने एक मिसाल हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की दी गई समय सीमा में निर्माण को तोडऩे के बजाय उसे बरसों बाद भी बचाए रखने के लिए कौन सी तरकीब इस्तेमाल की गई थी। सभी धर्मों के लोग इस तरकीब पर चलकर देशभर में जहां चाहे वहां अवैध कब्जा, अवैध निर्माण कर सकते हैं।

कहने को तो हिंदुस्तान की अदालतों के पास अंधाधुंध ताकत है, लेकिन हकीकत यह है कि उस ताकत के इस्तेमाल से खुद जज बचते हैं कि कहीं ऐसे अलोकप्रिय फैसले न हो जाएं कि जिन्हें मानने से सरकारें भी इंकार कर दें, और फिर जज एकदम ही बेबस और लाचार साबित हों। अदालतों में जज कई बार बातें कड़ी करते हैं, लेकिन फैसला ऐसा देते हैं कि जिसमें भ्रष्ट और राज्य सरकारों के बच निकलने का रास्ता निकल जाए। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। मद्रास हाई कोर्ट के जजों का यह साफ-साफ कहना पूरे देश पर लागू होना चाहिए, सभी धर्म स्थलों पर लागू होना चाहिए। धर्म ने अपने आप को जिस हद तक अराजक बना रखा है, उससे भी छुटकारा पाने की जरूरत है। ऐसा लगता है कि धर्म स्थलों के प्रसाद से हिंदुस्तान का हर पेट साल के 365 दिन, तीन वक्त भरते रहेगा। ऐसा लगता है कि जब ईश्वर मेहरबान रहेगा तो किसी को कोई काम करने की जरूरत नहीं रहेगी, और किसी को कोई कमी नहीं रहेगी। लोग संविधान के ऊपर ईश्वर को चढ़ाते हैं, रोज की जिंदगी की प्राथमिकताओं से ऊपर धर्म को जगह देते हैं, और इन सबको धार्मिक भावनाओं के नाम पर सरकारें बढ़ावा देती हैं, राजनीतिक दल भडक़ाते हैं। यह सिलसिला खत्म करने की जरूरत है।

हर प्रदेश के हाई कोर्ट को, और देश के सुप्रीम कोर्ट को हिंदुस्तान की धर्मांधता के खिलाफ एक कड़ा रुख लेने की जरूरत है, और सुप्रीम कोर्ट को ही यह भी तय करना पड़ेगा कि जब स्थानीय संस्थाएं और राज्य सरकारें अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी नहीं करती हैं तो उन्हें किस तरह की सजा दी जाए. इस सजा का फैसला कुर्सियों के आधार पर तय होना चाहिए और जिस दिन यह खतरा खड़ा हो जाएगा कि धार्मिक अवैध निर्माण को न हटाने वाले म्युनिसिपल कमिश्नर या कलेक्टर-एसपी जेल भेजे जाएंगे, उस दिन यह पूरा सिलसिला ठीक हो जाएगा। आज दिक्कत यह है कि सत्तारूढ़ पार्टियां, और विपक्षी पार्टियां भी, धर्म को छूने से कतराती हैं, बल्कि बहुत हद तक उन्हें मनमानी का बढ़ावा देती हैं, और अदालतों की कार्रवाई एक अमूर्त मसीहाई नसीहत की तरह साबित होती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही एक दूसरी मिसाल है जहां एक रिहायशी बस्ती के बीच में बसे हुए एक मंदिर से रात-दिन लाउडस्पीकर बजता था और पास में बसे हुए लोगों का जीना हराम हो गया था। जब बात किसी तरह नहीं सुलझ पाई तो आसपास के लोग हाई कोर्ट गए और वहां के हुक्म के बाद भी जब मंदिर नहीं सुधरा तो बजते हुए लाउडस्पीकर की रिकॉर्डिंग की गई और मंदिर को बताया गया कि अब अदालत की अवमानना का मुकदमा चलाया जा रहा है, इस चेतावनी के बाद मनमानी बंद हुई। अधिक से अधिक लोगों को धार्मिक अवैध कब्जों और अवैध निर्माण के खिलाफ अदालत जाना चाहिए क्योंकि एक धर्म की अराजकता दूसरे धर्म को भी वैसा ही करने के लिए बढ़ावा देती है।

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