मुश्किल में कांग्रेस, खिल्ली तक उड़ी..

उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए नया जीवनदान पाने का मौका है। पंजाब में तो अब भी उसकी सत्ता है और इसे बरकरार रखने के लिए कांग्रेस जी-तोड़ कोशिश कर ही रही है। उत्तराखंड में भाजपा की हालत पस्त है और अब भाजपा से कई नेता कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं, तो कांग्रेस को सत्ता पाने की उम्मीदें बंध रही हैं। उत्तरप्रदेश में कांग्रेस राजनीति की अलग राह तैयार कर रही है, जिसमें अभी सत्ता हासिल करना तो मुश्किल है, लेकिन अस्तित्व पर उठते सवालों का जवाब कांग्रेस तलाश ही लेगी। प्रियंका गांधी ने लड़की हूं लड़ सकती हूँ का नारा देकर राजनीति का एक नया कथानक देश के सामने रखा है। जिसमें धर्म, जाति की जगह स्त्री विमर्श राजनीति के केंद्र में आया है।

कांग्रेस के इस विचार की खिल्ली भी उड़ाई जा रही है कि कांग्रेस के पास करने को कुछ नहीं है, इसलिए इस बार महिलाओं का मुद्दा खड़ा किया गया है। लेकिन क्रिकेट की तरह राजनीति भी तो संभावनाओं का खेल है, जिसमें कब, कौन सा दांव काम कर जाएगा, कहा नहीं जा सकता। कई बार छोटे-छोटे प्रयोग बड़ा कमाल कर जाते हैं। इसलिए उप्र में कांग्रेस को सत्ता भले न मिले, लेकिन महिलाओं को जागरुक करने का जो काम होगा, कौन जाने, उससे देश में आने वाले वक्त में कैसे बदलाव देखने मिलें। अपनी रचनात्मक राजनीति से कांग्रेस एक बार फिर कोई नया विचार देश को दे रही है। लेकिन कांग्रेस के भीतर असंतोष और दगाबाजी का जो पुराना रोग है, अब उसके इलाज की ओर भी कांग्रेस को ध्यान देना होगा।

उत्तरप्रदेश में चुनाव के पहले कांग्रेस नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला बना हुआ है। हाल ही में आर पी एन सिंह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा में जाने से जो नुकसान पूर्वांचल में भाजपा को हो सकता था, उसकी भरपाई करने की कोशिश आर पी एन सिंह को लाकर की गई है। लेकिन सवाल ये है कि जिन आर पी एन सिंह को झारखंड चुनाव की कमान कांग्रेस ने दी थी, जो राहुल गांधी के करीबी थे, उन्होंने यह कदम क्यों उठाया। इसका जवाब तलाशना कठिन नहीं है। सीधी सी बात है कि आर पी एन सिंह भी राजनीति में बेहतर भविष्य के लिए भाजपा में चले गए। अगर उप्र में भाजपा सत्ता में आती है, तब तो उनका फायदा होगा ही, अगर नहीं आती है, तब भी राज्यसभा जाने के मौके तो खुले ही रहेंगे। इसके अलावा राष्ट्रनिर्माण, देश की प्रगति जैसी तमाम बातें जो दल बदल करने वाले नेता भाजपा के मंच से आकर करते हैं, वो सब अब इतनी बासी हो चुकी हैं कि उनमें कोई नया स्वाद नहीं मिलता।

आर पी एन सिंह हों या कोई और नेता, सब भाजपा में अपने स्वार्थ के लिए जा रहे हैं और ये साबित कर रहे हैं कि राजनीति अब समाजसेवा का जरिया नहीं रह गई है। इसमें अब विचारधारा जैसी बातों का भी कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि जब तमाम विपरीत विचारधारा वाले दल सरकार बनाने के लिए साथ आ रहे हों, तो फिर दलबदल पर भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

सवाल अब ये है कि कांग्रेस अपनी टूट से सबक लेना कब सीखेगी और कब जाकर संगठन को नए सिरे से मजबूत करने के कड़े फैसले लिए जाएंगे। बेशक कुछ वक्त पहले राहुल गांधी ने खुलकर ऐलान किया था कि जो डरपोक हैं, वो चले जाएं। लेकिन राहुल गांधी को इसके आगे भी अब सख्ती दिखानी है तो खुलकर कमान अपने हाथ में लेनी होगी। दरअसल कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि पार्टी बिना गांधी परिवार के चल नहीं सकती और गांधी परिवार नेतृत्व करता है तो फिर परिवार का दबदबा जैसे आरोपों से गुजरना पड़ता है। गांधी परिवार इस आरोप को भी सहन करता आया है, लेकिन फिर उनका साथ देने के लिए वफादारों की जो मजबूत टीम होनी चाहिए, वह अभी नजर नहीं आ रही है। राहुल गांधी ने अपने लिए जो साथी चुने थे, उनमें से ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और अब आर पी एन सिंह चले गए।

इससे पहले सुष्मिता देव, अशोक तंवर और प्रियंका चतुर्वेदी जैसे लोग कांग्रेस छोड़ चुके हैं। उप्र में तो इस एक महीने में पार्टी के 10 बड़े नेता दूसरे खेमों में जा चुके हैं। हालत ये है कि 2017 में जीते पार्टी के सात विधायकों में से केवल प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू और कांग्रेस विधायक दल की नेता आराधना मिश्रा को छोड़कर सभी ने पार्टी छोड़ दी है। कुछ लोगों ने टिकट न मिलने के कारण पार्टी छोड़ी, कुछ टिकट मिलने के बावजूद चले गए। इधर गुलाम नबी आजाद को पद्म भूषण मिलने के बाद कांग्रेस में जिस तरह तंज और आरोपों का सिलसिला चला है, वह एक बार फिर उसकी अंदरूनी कलह को उजागर कर रहा है।

पिछली बार विधानसभा चुनावों के पहले भी कांग्रेस में इसी तरह की आंतरिक खेमेबाजी सामने आई थी और उसका नुकसान कांग्रेस को हुआ था। इस बार फिर वैसे ही आसार बन रहे हैं। अब ये कांग्रेस आलाकमान यानी सोनिया गांधी और उनके साथ-साथ राहुल और प्रियंका गांधी को तय करना होगा कि वे कांग्रेस को फिर से चोट खाने से बचाने के लिए कौन से कदम उठाएं। पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं को पहचानना और उनके साथ दिग्गजों के दबाव को नकारने का जोखिम उठाना ही होगा। इसके बिना न कांग्रेस का कचरा साफ होगा, न उसमें साफ पानी बहने की जगह बनेगी।

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