Home गौरतलब जनता के हिस्से केवल अत्याचारों का विष..

जनता के हिस्से केवल अत्याचारों का विष..

-सर्वमित्रा सुरजन॥

लोकतंत्र में बहुमत राजनैतिक तौर पर ताकतवर होने का प्रतीक होता है, लेकिन बहुमत उच्छृंखलता की ओर बढ़े तो लोकतंत्र कमजोर होता है। यह देखना दुखद है कि इस वक्त गोदी मीडिया लोकतंत्र को कमजोर करने की इस मुहिम में भागीदार बन रहा है। किसान आंदोलन को लेकर नफरती माहौल बनाने में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। इस वजह से बहुत से लोग यह मानने लगे हैं कि किसान आंदोलन के कारण उनका बहुत नुकसान हो रहा है।

उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी में किसानों को गाड़ी से कुचलने का मामला भाजपा सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद दब नहीं सकेगा, ऐसा प्रतीत होता है। सरकार ने तो 20 घंटे के भीतर ही मामला निपटाने का दावा किया है। इससे पहले गोरखपुर में व्यवसायी की पुलिस जांच में हत्या का मामला भी इसी तरह खत्म किया गया था। लेकिन इन मामलों में इंसाफ तो अब तक हुआ ही नहीं है, केवल समझौता हुआ है। व्यवसायी की पत्नी को भी मुआवजा और नौकरी का आश्वासन मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने दिया और मृतक किसानों के परिजनों को भी ऐसा ही भरोसा दिलाया गया है। इससे पहले हाथरस मामले में भी मुआवजे की बात हुई थी। सरकार किसी दुर्घटना, प्रशासनिक चूक के कारण हुए नुकसान या किसी आकस्मिक आपदा के बाद मुआवजे का ऐलान करे तो यह उसका कर्तव्य निर्वहन माना जाएगा। लेकिन अभी जिस तरह मामले को रफा-दफा करने, विरोध की आवाज को दबाने के लिए मुआवजे की घोषणा होती है, उससे रिश्वत की बू आती है। गरीब जनता इंसाफ के लिए लड़ने जाएगी, तो भी इस बात की आशंका है कि उसे नाउम्मीदी ही हाथ लगेगी, खर्चीली और लंबी न्यायिक प्रक्रिया हर कोई सहन नहीं कर सकता। इसलिए बची-खुची जिंदगी जीने मिल जाए, इस खयाल से मुआवजे को स्वीकार कर लेती है।
लेकिन अत्याचार और मुआवजे के बीच लोकतंत्र, मानवाधिकार और इंसानियत के कई सवाल हैं, जो अनुत्तरित ही रह जाते हैं। उत्तरप्रदेश की घटना इस वक्त सुर्खियों में है, क्योंकि यह एक चुनावी प्रदेश है। हिंदी पट्टी का प्रमुख राज्य होने के कारण राजनैतिक तौर पर भी इसका खासा महत्व है, इसलिए यहां के मामले राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनते हैं। फिर इस बार तो विपक्ष ने, खासकर कांग्रेस ने इस तरह मोर्चा संभाला कि भाजपा सरकार हर ओर से घिरती नजर आई। आखिरकार तीन दिन बाद ही सही लेकिन कांग्रेस नेताओं को लखीमपुर जाने की इजा•ात योगी सरकार ने दी है। अब ये मामला कौन सा मोड़ लेगा, सरकार आरोपियों पर किस तरह कार्रवाई करेगी, आगामी चुनाव पर इसका क्या असर होगा, क्या योगी फिर से भाजपा के लिए मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे, कांग्रेस को क्या अपने पैर जमाने में मदद मिलेगी, क्या कांग्रेस अब प्रियंका गांधी को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाएगी, क्योंकि लखीमपुर मामले ने उनकी संघर्षशीलता का एक नया पहलू जनता के सामने रखा है, क्या कांग्रेस का साथ देने बाकी विपक्षी दल सामने आएंगे, या एक बार फिर सब अपनी-अपनी लड़ाई लड़ेंगे, 2021 का यह मामला क्या 2024 तक लोगों की याद में रहने दिया जाएगा या जनता का ध्यान भटकाने के लिए कई और मुद्दे खड़े कर दिए जाएंगे, ऐसे कई सवाल आने वाले वक्त में अपनी परतें खोलेंगे। फिलहाल गौर फरमाने की बात यह भी है कि अगर यह घटना उत्तरप्रदेश में नहीं हुई होती, तब भी क्या इतने दिन जिंदा रह पाती।
लखीमपुर में जिस तरह निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को जाने से सरकार ने रोका, कमोबेश वैसी ही रोक जम्मू-कश्मीर में भी लगाई गई थी। कानून-व्यवस्था के नाम पर धारा 144 लगा देना, इंटरनेट बंद करना, विपक्षी नेताओं की आवाजाही रुकवाना यह सब अब आम चलन बनता जा रहा है। लेकिन इससे एक ही संदेश निकल रहा है कि सरकार को अपनी कमजोरियों का एहसास है और वह लोकतंत्र से डर रही है। आजादी का अमृत महोत्सव देश भर में घूम-घूम कर सरकार मना रही है। लेकिन इस अमृत का कितना हिस्सा जनता को मिला है, यह सवाल अब पूछना जरूरी है। अभी तो यही दिख रहा है कि गरीब, पीड़ित जनता के हिस्से केवल अत्याचारों का विष ही आ रहा है। असम में अवैध कब्जा खाली करवाने के नाम पर मुसलमानों को प्रताड़ित किया गया, जम्मू-कश्मीर में तो जनता बरसों से सेना और आतंकियों के बीच घुन सी पिसती आ रही है, धरती के इस स्वर्ग में अब नागरिकों के लिए चैन के दो पल ही स्वर्ग समान बन गए हैं, देश के संपन्न लोग पर्यटन के लिए जम्मू-कश्मीर जरूर जाते हैं, लेकिन वहां के वास्तविक हालात क्या हैं, इससे आम जनता अनभिज्ञ ही है। यही हाल नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम जैसे पूर्वोत्तर प्रदेशों का है। अभी असम-मिजोरम के बीच सीमा विवाद ने हिंसक रूप ले लिया था। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, झारखंड, बिहार, तमिलनाडु, गुजरात इन तमाम राज्यों में कभी नक्सल समस्या के नाम पर, कभी विकास के नाम पर आदिवासियों, किसानों, मजदूरों का उत्पीड़न होता है। हाशिए के इन समुदायों के लिए जो आवा•ा उठाता है, उसे पहले सरकार विरोधी कहा जाता था। अब देशद्रोही, अर्बन नक्सल जैसे विशेषणों से नवाजा जाता है। और इससे भी अगर सरकार का मकसद नहीं सधता, तो फिर आवाज उठाने वालों को दबाने के लिए कानूनी कार्रवाई का रास्ता अपनाया जाता है।
भीमा-कोरेगांव मामले में वकील, लेखक, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। दिल्ली दंगों में जेएनयू के छात्र नेता उमर खालिद को गिरफ्तार किया गया। हाथरस मामले में पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन को गिरफ्तार किया गया। किसान आंदोलन में साथ देने के लिए दिशा रवि को गिरफ्तार किया गया था। गोरखपुर आक्सीजन मामले में डा.कफील खान को गिरफ्तार किया गया था। ये कुछ ऐसी गिरफ्तारियां हैं, जो चर्चा में रही हैं। लेकिन देश में ऐसे सैकड़ों पीड़ित जेलों में बंद मिल जाएंगे, जो बिना किसी ठोस आधार के गिरफ्तार किए गए, कभी अपनी धार्मिक पहचान के कारण, कभी किसी सत्ताधारी के रास्ते में आने के कारण। इन गिरफ्तारियों पर ढंग से चर्चा भी नहीं हो पाती, क्योंकि जनता के सामने मंदिर-मस्जिद के मसले खड़े कर उसका ध्यान भटकाया जाता है और उसकी सही-सही शक्तिमहंगाई, बेरोजगारी, बीमारी जैसी समस्याओं से निपटने में खर्च हो जाती है। ऐसे में सरकार को अपनी मनमानी करने का पूरा अवकाश मिल जाता है।
सरकार देश की सार्वजनिक संपत्ति को औने-पौने दामों में निजी हाथों में दे रही है, करोड़ों-अरबों के सौदे राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हो रहे हैं, जिन पर सवाल उठाने से सरकार को ऐतराज है, बहुमत का लाभ उठाकर मनचाहे कानून बिना किसी चर्चा के बनाए जा रहे हैं, घोर आपदा में भी उत्सव मनाने के तरीके सरकार ढूंढ रही है। देश के बहुत से संवेदनशील और जागरुक नागरिकों को इन बातों पर आपत्ति है, विपक्ष भी इस पर सवाल उठाता रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी इन सवालों और विरोधों का भी मखौल उड़ाते नजर आते हैं। किसी घोषणा के बाद अगर मोदीजी तंज भरे लहजे में ये कहते हैं कि अब विपक्ष उनकी निंदा करेगा, तो इसका मतलब यही है कि उन्हें किसी आलोचना या निंदा की परवाह नहीं है। मानो उन्हें यह पता है कि इस देश में सत्ता अब उनके लिए ही सुरक्षित है। लोकतंत्र के लिए यह खतरनाक स्थिति है।
लोकतंत्र में बहुमत राजनैतिक तौर पर ताकतवर होने का प्रतीक होता है, लेकिन बहुमत उच्छृंखलता की ओर बढ़े तो लोकतंत्र कमजोर होता है। यह देखना दुखद है कि इस वक्त गोदी मीडिया लोकतंत्र को कमजोर करने की इस मुहिम में भागीदार बन रहा है। किसान आंदोलन को लेकर नफरती माहौल बनाने में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। इस वजह से बहुत से लोग यह मानने लगे हैं कि किसान आंदोलन के कारण उनका बहुत नुकसान हो रहा है। किसानों के सड़क पर बैठने से लोगों को तकलीफ है, किसान जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना चाहें तो उसकी इजाज़त उन्हें नहीं मिलती, किसान दूसरी जगह आंदोलन करें तो भी उन्हें ही फटकार मिलती है। आज किसानों को खलनायक की तरह पेश किया जा रहा है, उससे पहले यही सलूक धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता की बात करने वालों के साथ किया गया था, आगे भी जो सरकार के खिलाफ खड़ा दिखाई देगा, उसे ही खलनायक बना दिया जाएगा। मंदिर बनाने के लिए रास्ता बनाते-बनाते लोकतंत्र को चौराहे पर खड़ा कर दिया गया है। यहां से सही रास्ता संविधान में ढूंढने पर मिल सकता है। 70 साल तक देश उसी रास्ते पर चल रहा था। आगे जनता को तय करना है कि वह उदारता, सहिष्णुता वाले संविधान सम्मत रास्ते पर चलती है, या नफरत, हिंसा और शोषण की राजनीति को बढ़ावा देने वाले रास्ते को अपनाती है।

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