Home गौरतलब किसान आंदोलन को गुंडई से कुचलने की साज़िश

किसान आंदोलन को गुंडई से कुचलने की साज़िश

-यूसुफ किरमानी॥

लखीमपुर खीरी में किसानों की हत्या पर विपक्ष की एकजुटता ऐतिहासिक है लेकिन किसान नेता राकेश टिकैत का बयान निराशाजनक है।

टिकैत कह रहे हैं कि केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा पर केस दर्ज होना किसानों की बहुत बड़ी जीत है। यह ग़लत बयान है। माँग तो यह होनी चाहिए और उसके लिए फ़ौरन आंदोलन छेड़ा जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी अपने मंत्री को फ़ौरन बर्खास्त करें। योगी का इस्तीफ़ा लिया जाए। पुलिस बाप-बेटे को गिरफ़्तार करे। लखीमपुर में जब कल मंत्री का पुत्र गोलियाँ चला रहा था, गाड़ियों से रौंद रहा था तो वहाँ दो सौ पुलिस वाले मौजूद थे। वो पुलिस किसके आदेश से मूक दर्शक बनी हुई थी?

लखीमपुर को लेकर राजनीति बदलने जा रही है। हम और हमारे जैसे लोग जब यह लगातार लिख रहे हैं कि जो किसान का नहीं, वो हमारा नहीं। लगता है वरूण गांधी को यह बात समझ में आ गई है। वो अगर कांग्रेस में आ रहे हैं तो यूपी की राजनीति ज़रूर बदलेगी। फ़िलहाल उन्होंने भाजपा से दूरियाँ बनाना शुरू कर दी हैं।

कुछ बातें और भी हैं…

लखीमपुर खीरी में किसानों के क़त्ल-ए-आम के समय और उससे पहले की कड़ियों को जोड़कर देखिए।

एक भयावह तस्वीर नज़र आएगी। उन कड़ियों में आपको सारी बातें सामान्य दिखेंगी लेकिन वहीं से किसान आंदोलन को बर्बाद करने का भयावह सच सामने आता है।

1 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की सीमा पर बैठे किसानों के मामले की सुनवाई करते हुए किसानों को फटकार लगाई और एक तरह से उनके आंदोलन पर सवालिया निशान लगाए।

2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी का बयान सामने आता है कि तीनों कृषि क़ानूनों और किसान आंदोलन के नाम पर देश को गुमराह किया जा रहा है। विपक्ष बौद्धिक बेईमानी और राजनीतिक धोखाधड़ी कर रहा है। मोदी के भाषण का कुल सार यह था कि किसान गुमराह हैं। मोदी की यह सोच अचानक पैदा नहीं हुई है। यह उनकी, उनकी पार्टी और मातृ संगठन की पूँजीवादी व फासिस्ट सोच का हिस्सा है कि किसान आंदोलन ग़लत है।

2 अक्टूबर को ही केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी अपने प्रधानमंत्री के बयान से और सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसानों को दी गई नसीहत से इतना प्रभावित होता है कि वो सीधे किसानों को धमकी देते हुए कहता है कि सुधर जाओ वरना सुधार देंगे। मंत्री के इस बयान को भाजपा-आरएसएस के नेता वायरल कर देते हैं। कई और भाजपा नेताओं के बयान आने लगते हैं जिनमें किसानों को खालिस्तानी तक कहा जाता है।

2 अक्टूबर को ही हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर का वीडियो सामने आता है, जिसमें वे आरएसएस स्वयंसेवकों और भाजपा कार्यकर्ताओं की संयुक्त बैठक में कहते नज़र आ रहे हैं कि वे लोग लठ्ठ सँभालें और किसानों को सबक़ सिखाएँ यानी पीटें। खट्टर ने यह भी कहते देखे जा रहे हैं कि किसानों की पिटाई का काम उत्तर पश्चिमी हरियाणा में होना चाहिए। दक्षिण हरियाणा में किसान आंदोलन का असर नहीं है। खट्टर ने कहा कि किसानों को पीटने वालों को अगर जेल भी भेजा गया तो वे नेता बनकर लौटेंगे। यानी प्रदेश के मुख्यमंत्री ने खुद अपने लठैतों को गुंडागर्दी का लाइसेंस दे दिया।

3 अक्टूबर को यूपी के लखीमपुर खीरी में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का कार्यक्रम रखा जाता है। किसान उनके आने का विरोध करते हुए सड़क के किनारे शांतिपूर्ण धरने पर बैठ जाते हैं। पुलिस उसी रास्ते से केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के पुत्र आशीष मिश्रा उर्फ़ मोनू के क़ाफ़िले को गुजरने की इजाज़त देती है। किसान नारा लगाने लगते हैं और आशीष मिश्रा अपनी पिस्तौल से किसानों पर गोलियाँ बरसा देता है। जिस थार जीप में वह होता है उससे किसानों को रौंद दिया जाता है। चार किसान फ़ौरन दम तोड़ देते हैं। इसके बाद किसान बेक़ाबू हो जाते हैं। पुलिस भाग खड़ी होती है।

4 अक्टूबर को योगी सरकार पूरी गुंडई दिखाते हुए विपक्षी नेताओं को गिरफ़्तार कर लेती है। कई राज्यों के सीएम को लखनऊ के अमौसी हवाई अड्डे पर रोक दिया जाता है।

मीडिया हाउसों के दलाल खबर को किसानों का उपद्रव बताकर मामले को नया मोड़ देनेनकी कोशिश करते हैं।

मोदी चुप हैं, अमित शाह चुप हैं। देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं। बहुसंख्यक तबके के लोग गूँगे हो गए हैं।

भाजपा शासित राज्य यूपी में लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया है।

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