Home राजनीति हर मोर्चे पर जीत को लेकर इतने आश्वस्त कैसे हैं अशोक गहलोत

हर मोर्चे पर जीत को लेकर इतने आश्वस्त कैसे हैं अशोक गहलोत

-हिना ताज़॥

राजस्थान के सियासी संकट के समय युवा नेताओं में धैर्य की कमी पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने अपने और नई पीढ़ी के दौर को ये कहते हुए समझाया था कि नये नेता रगड़ाई नहीं होने से राजनीति में सक्रिय रह कर की गई मेहनत को नहीं समझते। गहलोत का ये वक्तव्य इतना प्रासंगिक है कि वह हालिया चल रहे राजनीतिक घटनाक्रमों को भी साधता है। पंजाब सरकार की अस्थिरता को लेकर हुई हलचल में पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू का रोल भी कहीं न कहीं गहलोत के इस वाक्य पर सटीक बैठता है। क्योंकि राजनीति में वही टिकता है जो नितांत धैर्य से इसकी परिपक्वता की सीढ़ियों को चढ़कर किसी पद तक पहुंचे। यही वजह है कि राजस्थान कांग्रेस के नेतृत्व पर आलाकमान का विश्वास और अधिक बढ़ा है। पंजाब के घटनाक्रम के बाद राजस्थान के कैबिनेट विस्तार सहित कई अन्य मामलों में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के विज़न को अब और प्रमुखता दी जाएगी ऐसा कई सियासी पंडितों का मानना है।

हालांकि ये सिर्फ पंजाब के घटनाक्रम की वजह से नहीं है, राजस्थान में कैबिनेट विस्तार के लिए जल्दबाज़ी नहीं दिखाने के गहलोत के निर्णय के साथ हाईकमान का सहयोग पहले भी रहा है, इसकी वजह भी यही बताई जाती है कि सरकार बचाने के लिए सब को साथ लेकर चलने के गहलोत प्लान में आला नेतृत्व ने समझदारी और समय की मांग दोनों को देखा था। इस मामले पर विपक्ष और मीडिया द्वारा सरकार पर लगातार बनाए जा रहे दबाव के बीच मुख्यमंत्री की स्थिरता को भी गलत मायनों में लिया गया। उनकी एंजियोग्राफी जैसे मामले तक को संदेह की नज़र से देखने वाली ओछी मानसिकता भी सामने आई। यहां तक कहा गया कि पंजाब के घटनाक्रम से मुख्यमंत्री डरे हुए हैं। मगर अब पंजाब की कहानी ने उनके ऊपर आरोप लगाने वाली विरोधी शक्तियों को खामोश करते हुए सबको ये दिखा दिया है कि राजनीति घोड़े दौड़ाने का नाम नहीं है। इस परिप्रेक्ष्य में गहलोत एक बार फिर दिल्ली में मज़बूत बनकर उभरे हैं। आलाकमान तक को ये समझ आ गया है कि राजस्थान की कमान गहलोत भली भांति संभाले हुए हैं। इसलिए पंजाब के नवनियुक्त मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को दिल्ली से निर्देश मिले हैं कि वह राजस्थान जाकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से सरकार में बने रहने के गुर सीख कर आएं। क्योंकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत न सिर्फ राजनीति के एक माहिर खिलाड़ी हैं बल्कि कांग्रेस हाईकमान के सबसे विश्वसनीय नेता व मास्टरमाइंड अहमद पटेल की तरह ही कांग्रेस के सबसे मज़बूत रणनीतिकार भी हैं।

इसलिए अब मुख्यमंत्री भी निश्चिंत हैं। गांधी जयंती पर जिस आत्मविश्वास के साथ वह मीडिया पर गरजे उस आत्मविश्वास में उनके उसी धैर्य की चमक थी। अब इस रणभूमि में उनके बराबर कोई नहीं है। जिन निर्दलीयों की हवा बनाकर कांग्रेस को कमज़ोर करने की सुर्खियां छपवाई गई थीं, वह भी गहलोत के संरक्षण में खुश हैं। इसलिए अब सीएम गहलोत का फोकस धरियावद और वल्लभनगर उपचुनावों पर है, वह बेहद गंभीरता से इनहें साधने की रणनीति बना रहे हैं। कांग्रेस हाईकमान ने भी दोनों सीटों पर प्रत्याशी चयन के लिए गहलोत को फ्री हैंड दिया है। इसलिए इन दोनों ही सीटों पर उनकी सलाह को सर्वमान्य माना जाएगा। अपने तीसरे कार्यकाल के 31 महीनों में विपक्ष, सियासी संकट और कोरोना जैसे तीन मोर्चों की अग्निपरीक्षाओं को पार करते हुए वह उपचुनावों में भी अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने की ओर अग्रसर हैं। वह चुनावों से जुड़ी सभी छोटी मोटी चीज़ों और गतिविधियों की खुद मॉनिटरिंग कर रहे हैं। प्रत्याशी का चयन हो या प्रचार-प्रसार के तरीकों का मामला हो गहलोत ही इन पर अंतिम डिसीज़न ले रहे हैं। हालांकि प्रदेश में एंटी इनकंबेंसी फैक्टर नहीं होने की वजह से ये चुनाव जीत कर दिल्ली दरबार में अपना वर्चस्व कायम रखना उनके लिए बेहद आसान है।

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