Home गौरतलब फिर पगड़ी संभाल उतरे किसान..

फिर पगड़ी संभाल उतरे किसान..

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन करते किसानों को 10 महीने हो चुके हैं। बड़ी संख्या में किसान दिल्ली की तीन सीमाओं पर 26 नवंबर से धरना दिए बैठे हैं। इस दौरान मौसम बदल गए, कई राज्यों में सरकारें बदल गईं, कई राज्यों में शासक बदल गए, लेकिन सरकार की नीयत नहीं बदली। लोक कल्याणकारी औऱ किसान हितैषी होने का दावा करने वाली सरकार देख रही है कि किसान सारी मुश्किलों और संघर्षों के बावजूद इस मांग पर टिके हुए हैं कि तीनों कानून सरकार वापस ले और एमएसपी की गारंटी दे। लेकिन सरकार इन मांगों को सुन ही नहीं रही है। जनवरी तक तथाकथित तौर पर किसान नेताओं और सरकार के बीच बातचीत के दौर चले, लेकिन हरेक दौर की वार्ता का विफल रहना यह साबित करता है कि सरकार अपने फैसले से पीछे हटने का कोई इरादा रख ही नहीं रही है।

26 जनवरी की घटना के बाद सरकार को मानो एक बहाना मिल गया कि किसानों को देशविरोधी साबित करे औऱ किसान आंदोलन को गलत ठहराने की उसकी मंशा पूरी हो जाए। लेकिन ये मंशा पूरी नहीं हुई। किसान न केवल अपने आंदोलन को जारी रखे हुए हैं, बल्कि अब कानून वापसी तक घरवापसी न करने का इरादा दिखला चुके हैं। देश के कई हिस्सों में सफल महापंचायतें करने के बाद 27 सितंबर को किसानों ने भारत बंद का आह्वान किया था।

सोमवार सुबह 6 बजे से 4 बजे तक भारत बंद के इस ऐलान में किसानों का साथ देने कई राजनैतिक दल भी उतर आए। किसान भले इस आंदोलन को राजनीति से दूर रखने का प्रयास करें, लेकिन जब बात देश के करोड़ों नागरिकों के भविष्य से जुड़ी हो, तो फिर उसे राजनैतिक नजरिए से दूर नहीं रखा जा सकता। सत्तारूढ़ भाजपा अपने बहुमत के मद में चूर है, इसलिए उसे किसानों की पीड़ा और नए कानूनों पर आपत्ति समझ नहीं आ रही है। लेकिन देश के बहुत से राजनैतिक दल देख रहे हैं कि किसान आंदोलन का कितना दूरगामी असर हो सकता है।

इसलिए वे किसानों के मंच पर जगह न मिलने के बावजूद पार्श्व से अपना समर्थन दे रहे हैं। लोकतंत्र में राजनीति का एक रंग यह भी है।
बहरहाल, किसानों का भारत बंद छिटपुट घटनाओं और व्यवधानों को छोड़कर पूरी तरह सफल ही रहा। देश के कई राज्यों में भाजपा की सरकार है, फिर भी भारत बंद का असर हर जगह दिखाई दिया। सड़क और रेल यातायात प्रभावित रहे। बाजार सुबह से शाम तक बंद रहे।

सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा। हालांकि इस दौरान दिल्ली के पास गुरुग्राम और नोएडा में भयंकर सड़क जाम भी हुआ। आम लोगों को हुई इस परेशानी के लिए किसानों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। जब किसानों ने कई दिनों से बंद का ऐलान कर दिया था, तो नागरिकों से इस समझदारी की अपेक्षा की जाती है कि वे उस अनुसार ही कहीं आने-जाने की योजना बनाते। लेकिन केंद्र सरकार की तरह ही शायद नागरिकों का एक तबका किसानों की मांगों से बेपरवाह अपनी ही दुनिया में मगन है। कुछ लोगों को लगा होगा कि किसानों के भारत बंद का कोई असर नहीं होगा। सोशल मीडिया पर भी किसानों की खिल्ली उड़ाते हुए कुछ पोस्ट की गईं और अपने इलाके में चल रही गतिविधियों को दिखाते हुए भारत खुला है का ट्रेंड चलाया गया।

जब कोई काम सार्वजनिक जीवन से जुड़ा होता है, तो उसमें इस तरह का विरोध, मखौल और तंज स्वाभाविक है। जब किसान देशद्रोही ठहराए जाने पर भी विचलित नहीं हुए, तो वे अपनी मुहिम के खिलाफ चल रही इस आभासी मुहिम से परेशान क्यों होंगे। लेकिन यहां सवाल किसानों के आंदोलन को सफल या विफल ठहराने से अधिक सरकार की नीयत का है। नोटबंदी, जीएसटी, लॉकडाउन जैसे फैसले भी जब देश पर थोपे गए थे, तो सरकार ने बड़े बदलाव का हवाला दिया था। लेकिन बदलाव हर बार बेहतरी के लिए नहीं होते, कई बार बर्बादी का सबब बन जाते हैं।

कृषि कानूनों के लागू होने पर भी बर्बादी का ऐसा ही डर किसानों को लग रहा है। ‘कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020’ इस कानून से कृषि उपज मंडियों की उपयोगिता खत्म हो जाएगी। कार्पोरेट को खुली छूट मिल जाएगी कि वह मनमानी कीमत पर किसानों की उपज खरीदे। ‘कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत अश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक, 2020’ को आसान शब्दों में अनुबंध वाली खेती कह सकते हैं। इस कानून में पूंजीपति ठेकेदार की मर्जी से तयशुदा राशि पर किसान फसल उगाएगा, औऱ विवाद होने की स्थिति में 30 दिनों के भीतर आपस में उसे सुलझाना होगा या फिर नौकरशाही के पास जाना होगा।

जाहिर है इस व्यवस्था में फायदा पूंजीपति का ही होगा, गरीब किसान का नहीं। और तीसरा कानून ‘आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक, 2020’ तो किसानों के साथ-साथ आम जनता के लिए भी खतरनाक है। क्योंकि इसमें जमाखोरी की खुली छूट मिलेगी। उसके बाद दामों पर किसका नियंत्रण होगा, यह समझना कठिन नहीं है।

किसान इन तीनों कानूनों का विरोध केवल अपने लिए नहीं, इस देश की आम जनता को बचाने के लिए कर रहे हैं। एक ऐसा ही विरोध शहीदे आजम भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह ने अंग्रेजों के बनाए तीन कृषि कानूनों का विरोध 1907 में किया था, जो 9 महीने तक चला था। लगभग सवा सौ साल बाद देश के हालात फिर उसी मुकाम पर आ पहुंचे हैं। देश के किसान एक बार फिर पगड़ी संभालने मैदान में उतरे हुए हैं।

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