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ज्ञान की बोली लगाता शिक्षा माफिया

-सर्वमित्रा सुरजन॥

राजन समिति ने कहा है कि नीट परीक्षा राज्य को स्वतंत्रता से पहले के समय में ले जाएगी, जहां छोटे शहरों और गांवों में केवल ‘नंगे पांव’ जरूरतों को पूरा करने वाले डॉक्टर उपलब्ध थे। जब समाज के कमजोर वर्गों से आने वाले छात्र नीट जैसी परीक्षा में पीछे रहेंगे तो इसका मतलब ये हुआ कि आगे रहने वाले छात्र संपन्न, सुविधाभोगी तबके के होंगे, सबका साथ, सबका विकास के बिल्कुल उलट।

तमिलनाडु में स्टालिन सरकार ने अपने मेडिकल कॉलेजों को नीट से छूट देने के लिए एक विधेयक पिछले दिनों विधानसभा में पेश किया। तमिलनाडु सरकार का कहना है क राज्य अपने मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए नीट को एक मानदंड नहीं बनाए रखना चाहता है और इसकी जगह बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं में प्राप्त अंकों के आधार पर प्रवेश की व्यवस्था चाहता है। सरकार का तर्क है कि नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए साधन-सम्पन्न लोगों को ही अंतत: मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश मिल पाता है, और आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी पृष्ठभूमि वाले छात्र पीछे रह जाते हैं। वैसे तो तमिलनाडु में पहले भी नीट को लेकर आवाज उठ चुकी है। लेकिन इस बार सेलम, कोझियार के छात्र धनुष की आत्महत्या के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया। धनुष ने 2019 में बारहवीं पास कर ली थी, और उसके बाद वह किसी अच्छे मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए नीट की तैयारी कर रहा था। मगर परीक्षा के दबाव में आकर उसने आत्महत्या कर ली।

एक होनहार युवा को देश ने गंवा दिया और न जाने ऐसे कितने होनहार अपने जीवन को दांव पर लगाने की कतार में होंगे। दुख इस बात का है कि अपने भाषणों में अक्सर युवाशक्ति का जिक्र करने वाले सत्ताधारियों के फैसलों और नीतियों में इस युवाशक्ति के भविष्य की परवाह नजर ही नहीं आती। नीट और जेईई जैसी परीक्षाएं भी अब राजनीति का मुद्दा बन गई हैं। वैसे ये प्रतियोगी परीक्षाएं राजनीति से पहले व्यापार का जरिया बन चुकी हैं, जहां ज्ञान की बोली लगाकर अरबों का साम्राज्य खड़ा किया जा चुका है। और जहां बेखौफ मुनाफा काटने की गुंजाइश हो तो शिक्षा माफिया का खड़ा होना स्वाभाविक है। राजनीति में अक्सर धनबल, बाहुबल और सत्ताबल के कुत्सित गठजोड़ पर चिंता व्यक्त की जाती है। लेकिन अब यही घिनौना गठजोड़ शिक्षा के क्षेत्र में खुलकर दिखने लगा है।

इस गठजोड़ की ओर तमिलनाडु में राजन समिति ने इशारा किया है। वंचित वर्ग के छात्रों पर पड़ने वाले प्रभाव के अध्ययन के लिए गठित न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ए के राजन समिति का मानना है कि नीट के कारण एमबीबीएस और अन्य स्तरों की उच्च चिकित्सा शिक्षा में विविध सामाजिक प्रतिनिधित्व कमजोर हो गया है। ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले तमिल माध्यम के सरकारी स्कूलों के छात्र, जिनके माता-पिता की आय 2.5 लाख रुपये प्रति वर्ष से कम है, और सामाजिक रूप से दमित और वंचित समूह यानी ओबीसी, अजा, अजजा आदि, नीट के कारण सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। राजन समिति ने कहा है कि नीट परीक्षा राज्य को स्वतंत्रता से पहले के समय में ले जाएगी, जहां छोटे शहरों और गांवों में केवल ‘नंगे पांव’ जरूरतों को पूरा करने वाले डॉक्टर उपलब्ध थे। जब समाज के कमजोर वर्गों से आने वाले छात्र नीट जैसी परीक्षा में पीछे रहेंगे तो इसका मतलब ये हुआ कि आगे रहने वाले छात्र संपन्न, सुविधाभोगी तबके के होंगे, सबका साथ, सबका विकास के बिल्कुल उलट। इसलिए समिति ने कहा है कि तमिलनाडु सरकार को कानूनी और विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाते हुए इसे हर स्तर पर समाप्त कर देना चाहिए।

तमिलनाडु में इस तरह के विधेयक के पेश होने के बाद महाराष्ट्र में भी नीट समाप्ति की आवाज उठने लगी है। आपको बता दें कि नीट 2010 में प्रभावी हुआ था, जब भारतीय चिकित्सा परिषद ने 21 दिसंबर को एक अधिसूचना जारी करके मेडिकल दाखिलों के नियमों में संशोधन कर पूरे भारत में एमबीबीएस और बीडीएस के लिए नीट को एकमात्र पात्रता तथा प्रवेश परीक्षा बना दिया था। उस वक्त गुजरात, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों ने नीट का विरोध किया था। गुजरात की नरेन्द्र मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री जय नारायण व्यास ने तब कहा था कि गुजरात नीट को स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन 2016 में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद नीट को लागू कर दिया गया- तब तक नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा केंद्र की सत्ता में आ चुकी थी।

नीट में न केवल सामाजिक बराबरी को लेकर आवाज उठ रही है, बल्कि इसमें धोखाधड़ी के मामले भी सामने आए हैं। हाल ही में वाराणसी पुलिस ने नीट सॉल्वर गैंग के सरगना की शिनाख्त की है। विश्व गुरु बनने की चाह रखने वाले भारत में सॉल्वर गैंग जैसे शब्द घोर शर्मिंदगी का कारण बनने चाहिए। लेकिन शर्मिंदगी तो दूर, ऐसा लगता है कि प्रभावितों को छोड़ इस तरह के मामलों में समाज को कोई अफसोस भी नहीं होता और समाज की इस उदासीनता का फायदा राजनीतिक दल उठाते हैं। बिहार में टॉपर घोटाला, मध्यप्रदेश का व्यापमं घोटाला, प्रतियोगी परीक्षाओं में मुन्नाभाइयों का पकड़ाना, ये बातें अब भारत में सामान्य होने लगी हैं।

अभी जेईई मेन्स की परीक्षा में सॉफ्टवेयर हैक करके उन छात्रों की मदद करने का मामला सामने आया है, जो अपने बूते इस परीक्षा में सफल नहीं हो सकते थे। खबर है कि एक-एक छात्र से कम से कम 15 लाख इस काम के लिए वसूले गए। जेईई मेन्स भी नीट की तरह एक प्रवेश परीक्षा है जिसमें छात्र देश के इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश के लिए शामिल होते हैं। परीक्षा में सफल होने वाले शीर्ष 2.5 लाख उम्मीदवार जेईई एडवांस में हिस्सा लेने के योग्य हो जाते हैं, जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) का प्रवेश का रास्ता है। डिजीटल इंडिया वाले भारत में ये परीक्षा कम्प्यूटर पर बैठकर दी जाती है।

यानी फर्रे बनाकर नकल करने की कोई गुंजाइश नहीं होती। लेकिन गोरखधंधे दीमक की तरह किसी भी सड़ी-गली जगह में अपना घर बना ही लेते हैं। देश में परीक्षाओं की व्यवस्था भी सड़ी-गली ही है और इसका फायदा परीक्षा माफिया उठाना जानता है। इस बार अपराधियों ने कुछ उम्मीदवारों से करीब 10-15 लाख रुपये वसूले और ‘सॉल्वर’ नियुक्त किए, जिन्होंने दूसरी जगह पर बैठकर परीक्षा केंद्र में बैठे छात्र का सिस्टम हैक कर लिया और उनके लिए प्रश्नपत्र हल किया।

जब एटीएम से अपराधी पैसे निकालने में कामयाब हो जाते हैं, जब नेटबैंकिंग में धोखाधड़ी हो जाती है, तो परीक्षा के लिए दिए कम्प्यूटर को हैक करना कौन सा अजूबा है। जब नीयत चोरी की हो, तो दुनिया का कोई भी ताला कारगर साबित नहीं होता। दरअसल इन परीक्षाओं में चोरी और गैरबराबरी के साथ-साथ नीयत पर भी समाज को चिंता करना चाहिए। हमारे देश में अब भी विद्यार्थी के लिए विज्ञान पढ़ना सम्मान की बात है और मानविकी जैसे विषयों को बेकार समझने की मानसिकता बरकरार है।

विज्ञान पढ़कर भी हर छात्र के लिए डॉक्टर या इंजीनियर बनना ही एकमात्र लक्ष्य निर्धारित कर दिया जाता है। मां-बाप की इन उम्मीदों को और परवान चढ़ाने के लिए कोचिंग संस्थान आगे आते हैं, जो लाखों की फीस के बदले आपके बच्चे का शर्तिया दाखिले का दावा करते हैं। इन दावों को पूरा करने के लिए बच्चों पर परीक्षा का बेतहाशा बोझ लाद दिया जाता है। मां-बाप भी लाखों की फीस की एक-एक पाई वसूलने के लिए बच्चों पर दबाव बनाए रखते हैं। इसका नतीजा कभी आत्महत्या, कभी कुंठा, कभी अवसाद के रूप में बच्चों में नजर आता है। जो बच्चे लाखों की फीस देकर आते हैं, उनके सामने इस निवेश की भरपाई की चुनौती होती है और जो बच्चे इतनी फीस देने में सक्षम नहीं हैं, उनके लिए बिना संसाधनों और प्रशिक्षण के परीक्षा देना ही अपने आप में पहाड़ जैसी चुनौती है। तिस पर अगर बच्चा गांव या छोटे शहर का हो, जातिगत व्यवस्था में निचले क्रम का हो तो उसके लिए इस पहाड़ को पार करना और कठिन हो जाता है। जाति, धर्म और धन के साथ-साथ कम्प्यूटर और इंटरनेट तक आसान पहुंच की समस्या भी इन बच्चों के सामने है और कोढ़ में खाज की तरह नकल कराने वाला माफिया इनके बचे-खुचे रास्ते भी बंद कर देता है।

जो मां-बाप लाखों रुपए पढ़ाई में दे सकते हैं, परीक्षा में नकल कराने के लिए भी वही मां-बाप सक्षम होते हैं। बच्चों के पास तो 10-15 लाख रुपए आएंगे नहीं। लेकिन सवाल ये है कि इस तरह अपने बच्चों को मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश दिलाकर मां-बाप न केवल गरीब बच्चों के साथ बल्कि अपने बच्चों के साथ भी अन्याय करते हैं। वे उन्हें उस काम के लिए बाध्य करते हैं, जिसके योग्य वो हैं ही नहीं। प्रतियोगी परीक्षाओं का मामला हो या अच्छे शिक्षण संस्थानों में पढ़ने का, संपन्न तबके के बच्चों को हमेशा फायदा मिलता है, लेकिन समाज को इसका भारी नुकसान होता है, क्योंकि गैरबराबरी समाज के लिए घातक है। अफसोस इस बात है कि चुनावों में ये गैरबराबरी, स्कूल-कॉलेजों की घटती संख्या, परीक्षा में धांधली, शिक्षा का अरबों का व्यापार कभी प्रमुख मुद्दे नहीं बनते। इनकी जगह धर्म और जाति का बोलबाला रहता है। लेकिन देश पढ़-लिखकर ही आगे बढ़ेगा, नए-नए धार्मिक स्थल खड़े करने से नहीं।

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