Home गौरतलब नारी विमर्श की नई गुंजाइश..

नारी विमर्श की नई गुंजाइश..

देश में महिलाओं के लिए हर स्तर पर पूरी तरह बराबरी हासिल करना अब भी आकाश कुसुम जैसा ही है। इस बात की पुष्टि करते हाल-फिलहाल के कुछ उदाहरण हैं। जैसे, बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि एनडीए की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए इस नवंबर से ही महिलाओं को अवसर दिया जाए। दरअसल ये आदेश तो पहले पारित हो चुका था कि एनडीए की प्रवेश परीक्षा अब से महिला उम्मीदवार भी दे सकेंगी। लेकिन केंद्र ने सर्वोच्च अदालत में एक याचिका दायर कर अनुरोध किया था कि अगले साल से महिला उम्मीदवारों को परीक्षा में शामिल किया जाए। महिला उम्मीदवारों को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रवेश परीक्षा में बैठने की अनुमति देने वाली अधिसूचना अगले साल मई तक जारी की जाएगी। लेकिन शीर्ष अदालत ने कहा कि वह नहीं चाहती कि महिलाओं को उनके अधिकार से वंचित किया जाए तथा महिलाओं को एनडीए में शामिल करने के लिये एक साल तक प्रतीक्षा नहीं की जा सकती।

न्यायपालिका ने तो संविधान की भावना के अनुरूप फैसला सुना दिया, लेकिन राजनीति और समाज में अभी बराबरी के अधिकार के दर्शन होना बाकी हैं। कुछ दिनों पहले आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा ने हिंदी फिल्मों की अदाकारा राखी सावंत का नाम अपनी एक टिप्पणी में घसीटा। राघव चड्ढा ने नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब की राजनीति का राखी सावंत कहा। हमें नहीं मालूम कि राघव चड्ढा नवजोत सिंह सिद्धू और राखी सावंत को निजी तौर पर कितना जानते हैं। लेकिन जहां तक दोनों के सार्वजनिक जीवन का सवाल है, दोनों ही हस्तियों ने अपनी मेहनत से एक मुकाम हासिल किया है।

सिद्धू ने क्रिकेट से लेकर टीवी शो और राजनीति में अपने लिए जगह बनाई है, जबकि राखी सावंत भी कई बरसों से दर्शकों का मनोरंजन करती आ रही हैं। दोनों अपने कामों के कारण कई बार विवादों में रहे हैं, दोनों का बड़बोलापन भी जाहिर है, और ऐसा करने वाले इस देश में और भी कई लोग हैं। लेकिन राघव चड्ढा को राखी सावंत का नाम ही शायद इसलिए याद आया, क्योंकि उनके नाम से सुर्खियां जल्दी बनती हैं। एक महिला होने के बावजूद राखी अक्सर जो उन्मुक्त व्यवहार दिखाती हैं, वही उन्हें विवादों में घसीटने के लिए काफी होता है। क्योंकि इस समाज की मानसिकता किसी महिला का बिंदास अंदाज को बर्दाश्त नहीं कर पाती। राघव चड्ढा विदेश में पढ़े एक नौजवान है, जिनकी सौम्य छवि आम आदमी पार्टी के लिए उपयुक्त बैठती है। लेकिन फिर भी उनकी टिप्पणी प्रगतिशील सोच के विपरीत है।

32 बरस के राघव चड्ढा अगर एक महिला के नाम का इस्तेमाल अपने राजनैतिक मकसद के लिए करते हैं, तो 74 बरस के हृदयनारायण दीक्षित भी कोई अलग मिसाल पेश नहीं करते। हाल ही में भाजपा के प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन में उत्तरप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने वक्ताओं द्वारा उन्हें लेखक, पढ़ने वाला और विद्वान व प्रबुद्ध बताए जाने के जवाब में कहा कि केवल पढ़ने या लिखने भर से महान नहीं बनता उसमें और भी तमाम गुण होते हैं।  अपनी बात स्पष्ट करने के लिए गांधीजी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अगर कोई कपड़े उतार देने भर से महान बन जाता तो राखी सावंत महान बन जातीं। अच्छी बात है कि दीक्षितजी बड़ी विनम्रता से खुद को प्रबुद्ध न कहने के लिए कह रहे हैं, लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें राखी सावंत या किसी भी स्त्री का अपमान करने का कोई हक नहीं है। अपने इस बयान पर श्री दीक्षित ने सफाई दी है कि उनकी बात को गलत संदर्भ में पेश किया गया। वहीं राखी सावंत ने भी जवाब दे दिया कि वे उनके दादा की उम्र के हैं, ऐसे में उन्हें अपनी पोती के लिए इस तरह की बात करने से पहले लिहाज रखना चाहिए।

लेकिन यहां सवाल किसी की उम्र या ओहदे का नहीं है, सवाल उस स्त्री विरोधी मानसिकता का है, जो सदियों से समाज में बनी ही हुई है। हाल ही में दो विज्ञापन इसी स्त्री विमर्श को लेकर भी सुर्खियों में आए हैं। मान्यवर मोहे के विज्ञापन में आलिया भट्ट कन्यादान की रस्म पर सवाल उठाती हैं कि बेटी पराया धन क्यों है। इस विज्ञापन के अंत में दूल्हे के माता-पिता अपने बेटे का हाथ आगे बढ़ाते हैं और आलिया कहती हैं – नया आइडिया कन्या मान। कन्यादान को लेकर कई महिलाएं पहले भी सवाल उठा चुकी हैं कि क्या लड़कियां किसी की संपत्ति हैं, जिसे दान किया जाए। लेकिन परंपराओं और संस्कृति के नाम पर ऐसे सवालों को दबा दिया जाता है। दूसरा विज्ञापन कैडबरी चॉकलेट का है, जिसमें कैडबरी के ही एक पुराने विज्ञापन को बदली भूमिकाओं के साथ पेश किया गया है। इसमें एक महिला क्रिकेटर मैदान पर छक्का लगाती है और एक पुरुष उसकी इस उपलब्धि पर खुश होता है। विज्ञापन का अंत गुडलक गर्ल्स की टैगलाइन के साथ होता है। जो समाज में एक नए चलन, एक नई सोच को बढ़ाती है।

अदालत से लेकर विज्ञापनों तक के ये उदाहरणों में गहरे विमर्श की गुंजाइश है, जिसमें स्त्री स्वातंत्र्र्य और उससे भी बढ़कर लैंगिक बराबरी के नए रास्ते खुल सकते हैं। लेकिन यह विमर्श पूर्वाग्रह रहित मानसिकता के साथ होना चाहिए, क्या देश इसके लिए तैयार है।

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