12 साल की उम्र से भूपेन ने खोला था फिल्मी करीयर का खाता, 85 की उम्र में किया बंद

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पिछले कई दिनों से जिंदगी और मौत से जूझ रहे जानेमाने गायक भूपेन हजारिका का शनिवार को निधन हो गया। कई दिनों हजारिका की हालत गंभीर बनी हुई थी। वे मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में भर्ती थे और डायलिसिस पर थे। निमोनिया होने के बाद 23 अक्टूबर को हजारिका की हालत बिगड़ गई थी।

वैसे तो आज के हिंदी फिल्म दर्शक भूपेन हज़ारिका को एक उत्कृष्ट शास्त्रीय गायक के तौर पर जानते हैं, लेकिन जिन्होंने उनका दौर देखा है उनके लिए वे एक ऐसी शख्सियत थे जिनकी पहचान एक नहीं रही है। भूपेन को उत्कृष्ट गीतकार, लाजवाब गायक, उम्दा अभिनेता, गंभीर लेखक, सफल निर्देशक, सक्रिय समाजसेवी और इन सबसे बढ़कर असमिया संस्कृति के जीवंत प्रतीक के तौर पर जाना जाता रहा है। भूपेन दा के गीतों में भदेस भाषा, सुरों में बंजारापन और रचनाओं में वेदना होती थी। असमिया संस्कृति और वहां की माटी की खूबशू को दुनिया भर में बिखेरने का श्रेय उन्हीं को जाता है।

भूपेन हज़ारिका को संगीत की शिक्षा अपने पिता शंकर देव से ही मिली थी। बचपन में संगीत ने उनके दिल पर इस कदर राज कर लिया की वे कम उम्र में ही कविताएं लिखने लगे और 10 की आयु तक आते आते उन कविताओं को अपनी आवाज़ तक देने लग गए। बड़े होने पर संगीत ने उनकी रचनात्मकता को और भी ज्यादा निखार दिया। उन दिनों असमिया फिल्मों का नया दौर शुरु हुआ था। भूपेन के नाम असमिया चलचित्र की दूसरी फिल्म इंद्रमालती में अभिनय के लिए 1939 में ही दर्ज हो चुका है। उस समय भूपेन महज़ 12 साल के थे।

तब से संगीत और संस्कृतिक के जिस सफर पर भूपेन निकले हैं वो उनकी जिंदगी भर चलता रहा। बंगला फिल्मों के लिए भी भूपेन हज़ारिका को हमेशा याद किया जाएगा। मृणाल सेन के लिए इन्होंने पटकथा लिखी थी। तब उन्हें इस काम के लिए 1500 रुपये मिले थे। ऐसा नहीं था कि 60-70 के दशक में भूपेन हज़ारिका एक बड़े नाम थे। उन्हें भी अपने शुरुआती दौर में काफी संघर्ष देखा है। लेकिन भूपेन कभी निराश नहीं हुए।

60 के ही दशक में बंगाल में असमिया विरोधी माहौल पनपने लगा था। भूपेन ने बंगाल में अपने लिए नफरत और गुस्से का दौर भी देखा है। इसका असर उनके करीयर पर भी पड़ा। भूपेन हज़ारिका ने अपने गृहस्थ जीवन में भी कई उतार चढ़ाव देखे था। 1950 में उनकी शादी प्रियम से हुई थी और 1963 में दोनों ने अलग रहने का निर्णय ले लिया। पत्नी से अलग होने के बाद भूपेन काफी अकेले हो चुके थे। 1965 तक तो वे कहीं गाने जाते भी तो किसी से पैसे नहीं लेते थे। पैसों की तंगी से उनका परिवार भी बिखरने लगा था। पिता और भाई की अकाल मृत्यु ने भूपेन को काफी तोड़ कर रख दिया था।

भूपेन ने राजनीति में भी अपने हाथ आज़माए थे। लेकिन अपना पहला चुनाव वे हार गए। असल में कहा जाए तो भूपेन हजारिका की जिंदगी का दूसरा पड़ाव उन्हें प्रसिद्धि के अर्श तक लेकर गया। रचना की भूख तो थी ही उनमें और आवाज़ में दर्द भरा था। जब वे एक दफ़ा नागा रिबेल्स से बात करने गए तो आपनी एक रचना ‘मानुहे मनोहर बाबे’ को वहां के एक नागा युवक को उन्हीं कि अपनी भाषा में अनुवाद करने को कहा और जब उन लोगों ने इस गीत को सुना तो सभी के आंखों में आँसू आ गए।

भूपेन दा के इस गीत के बंगला अनुवाद ‘मानुष मनुषेरे जन्में’, को बी.बी.सी.की तरफ़ से ‘सॉंग ऑफ द मिलेनियम,के खिताब से नवाजा गया। इसके बाद भूपेन ने एक से बढ़कर एक कालजयी रचना को मूर्त रूप दिया और उनकी शख्सियत एक अगल पहचान के साथ उभरती गई। भूपेन दा के कई गीतों का हिंदी में भी अनुवाद किया गया है। इनमें से कई गीत के अनुवाद खुद गुलज़ार साहब रहें हैं। हिन्दी क्षेत्र में भूपेन हज़ारिका के जिन रचनाओं ने लोगों को विभोर किया है उनमें गंगा बहती हो क्यों… ”दिल हूम हूम करे..” प्रसिद्ध हैं। उनके कई गीतों को स्वर कोकिला लता मंगेश्कर जी ने भी गाया है।

भूपेन जी को पद्मश्री पुरस्कार के साथ साथ दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, असम गंधर्व, कलारत्न,शिल्प शिरोमणी, यायावर शिल्पी, बींसवीं सदी के संस्कृतिदूत जैसे सम्मानों से नवाज़ा गया है।

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