अमेरिकी फौजों की वापसी से उठते सवाल

अमेरिकी फौजों की वापसी से उठते सवाल

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पूरी तरह से तालिबान के नियंत्रण में आ चुके अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की अंतिम विदाई हो गई है। सोमवार को इस देश को रक्तरंजित और गैर निर्वाचित सरकार के हाथों में छोड़कर आखिरी अमेरिकी सैनिक के रूप में 82वीं एबीएन डिविजन के कमांडिंग जनरल मेजर जन. क्रिस डोनाहु के यूएस एयर फोर्स के जहाज सी-17 से रवाना होने के साथ ही अफगानिस्तान 20 साल की अमेरिकी फौजों की तैनाती से मुक्त तो हो गया लेकिन अब अनेक सवाल सामने हैं। तालिबानियों से देश को मुक्ति दिलाने आये विदेशी सेना की वापसी के बाद देश वहीं खड़ा है जहां 20 वर्ष पहले था। 

अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9 सितंबर, 2001 को हुए भीषण आतंकवादी हमले के तुरन्त बाद ही 11 सितंबर को अमेरिकी फौजें यहां उतार दी गई थीं, जो आतंकी गतिविधियों का अड्डा बन चुका था। देश में शरिया कानूनों को लागू करने के उद्देश्य से तालिबान ने एक तरह से देश पर कब्जा कर रखा था और वहां की निर्वाचित सरकार को लगभग अप्रासंगिक कर दिया था। उसके कुछ साल पहले सोवियत रूस की फौजें भी वहां लगभग दो दशक काट चुकी थीं परन्तु वह भी आतंकी संगठनों के खिलाफ बहुत कुछ नहीं कर पाई थी क्योंकि शीत युद्ध के कारण तालिबान को बनाने एवं संवर्धित करने का काम स्वयं अमेरिका ने किया था।

 जब आतंकवाद की मार खुद अमेरिका ने झेली तो अमेरिकी लश्कर ने यहां मोर्चा सम्भाला था। 20 साल में लगभग 63 लाख करोड़ खर्च करने और विदेशी धरती पर अपने सैकड़ों जवान गंवाने के बाद अमेरिकी जनता को यह कवायद व्यर्थ लगी। वहां की जनता का दबाव अपनी सरकार पर सैन्य अभियान को समेटने के लिए बढ़ने लगा। कुछ खास हासिल न होता देखकर अंतत: पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ऐलान कर दिया था कि अमेरिकी सेना 11 सितम्बर, 2021 तक अफगानिस्तान को पूरी तरह से खाली कर देगी। नये राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस वादे को निभाने की घोषणा की। सैन्य वापसी की इस तारीख को थोड़ा पहले खींचकर 31 अगस्त कर दिया गया।

अमेरिकी जवानों की वापसी की बात चलते ही तालिबान के लड़ाके नये जोश के साथ अफगानिस्तान की ओर बढ़ने लगे, जो एक तरह से सीधी लड़ाई से पीछे हट चुके थे। उन्हें वहां की निर्वाचित सरकार के पिछले राष्ट्रपति हामिद करजई और अभी देश छोड़ गये अशरफ गनी ने अमेरिकी सेना की मदद से खदेड़ दिया था। आतंकवादी संगठन के इन लड़ाकों के बारे में अनुमान था कि वे इस साल के अंत तक देश को फिर से अपने कब्जे में ले सकते हैं; परन्तु यह भी उम्मीद थी कि विश्व की सबसे ताकतवर कही जाने वाली सैन्य शक्ति के द्वारा प्रशिक्षित और आधुनिकतम अस्त्र-शस्त्रों से लैस अफगान सेना तालिबानियों को कड़ी चुनौती देगी। हुआ वक्त के काफी पहले और एकदम विपरीत। अफगानी सेना ने तालिबानी लड़ाकों के सामने दो दिनों के भीतर ही हथियार डाल दिये। 14-15 अगस्त तक राजधानी काबुल पर तालिबान की फतह हो गई। सारी संस्थाएं भी उसी के अधीन कार्यरत हैं। 

तालिबान का नया वर्जन पहले के मुकाबले परिमार्जित दिख रहा है लेकिन शरिया कानूनों को लेकर वह पहले की तरह ही कोई समझौता न करने की बात कह चुका है। आधुनिक शिक्षा, महिलाओं को स्वतंत्रता आदि को लेकर उसका कट्टर रवैया जारी रहेगा। अमेरिका, पाकिस्तान, रूस और चीन जहां तालिबान सरकार को मान्यता देने और बातचीत के लिये तैयार बैठे हैं, वहीं भारत की इस परिप्रेक्ष्य में प्रमुख चिंता है उसकी पाक और चीन से बढ़ती नज़दीकियां। हालांकि तालिबान को भारत की वहां चल रही परियोजनाओं से कोई आपत्ति नहीं हैं। दूसरी राहत यह है कि नई सरकार ने कहा है कि भारत-पाक अपनी लड़ाइयां खुद की सीमाओं पर लड़े। वह किसी को भी लड़ाई के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देगा।

अफगानिस्तान से ऐतिहासिक बीटिंग रीट्रिट के बाद वहां मानवाधिकारों की रक्षा का सवाल तो पैदा हो ही गया है, यह भी देखना होगा कि अमेरिकी फौजों द्वारा वहां भारी मात्रा में छोड़ दिया गया गोला-बारूद किस काम में आता है।

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