मोदीविरोधी एकजुटता के साथ, कुनबापरस्त होने की दिक्कत भी

मोदीविरोधी एकजुटता के साथ, कुनबापरस्त होने की दिक्कत भी

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-सुनील कुमार॥

सोनिया गांधी ने करीब डेढ़ दर्जन गैर-भाजपा, गैर-एनडीए पार्टियों से बात की और भाजपा के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाने की चर्चा की। कोरोना के खतरे को देखते हुए यह पूरी चर्चा ऑनलाइन हुई लेकिन इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि देश में आज यह चर्चा छिड़ चुकी है कि उत्तर प्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों के चुनावों को देखते हुए और 2024 के आम चुनाव को देखते हुए जो कोई पार्टी मोदी से निपटना चाहती है, उसे दूसरे विपक्षी दलों के साथ एक तालमेल बैठाना ही पड़ेगा, उसके बिना मोदी से पार पाना मुमकिन नहीं है। एक वक्त हिंदुस्तान की राजनीति में कांग्रेस के खिलाफ बाकी सबको एक करने की जो मुहिम चलती थी, वह मुहिम अब मोदी के खिलाफ बाकी सब एक में बदल चुकी है क्योंकि आज वक्त की जरूरत वही है। आज यह आसान नहीं रह गया है कि मोदी से सिर्फ यूपीए अकेले पार पा सके।

ऐसे मौके पर मोदी विरोधियों के बीच जेल से छूटे हुए लालू यादव भी हैं, जिनके आने के बाद बिहार की राजनीति में बड़े फेरबदल होने की उम्मीद जताई जा रही थी। यह एक अलग बात है कि पिछले हफ्ते-दस दिन से लालू की पार्टी उनके बेटों के आपसी झगड़ों और पार्टी के भीतर चल रही टकराहट को लेकर खबरों में बनी हुई है। सोनिया गांधी ने कांग्रेस के अलावा डेढ़ दर्जन और पार्टियों को साथ लेकर जो एक संयुक्त बयान जारी किया है वह अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण तो है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सोनिया गांधी अगले चुनाव तक ऐसे किसी प्रस्तावित गठबंधन में उसके नेता के रूप में, या कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय रहेंगी, या फिर कांग्रेस पार्टी को कोई दूसरा अध्यक्ष मिलेगा? यह बात जरूरी इसलिए है कि विपक्ष की पार्टियों में कांग्रेस चाहे सबसे बड़ी पार्टी न भी रह गई हो, वह अकेली पार्टी है जिसकी पूरे हिंदुस्तान में मौजूदगी है। कांग्रेस के अलावा गैर-एनडीए पार्टियों में पूरे देश में पहुंचे रखने वाली कोई दूसरी पार्टी नहीं है। इसलिए कांग्रेस के जो घरेलू मामले हैं, उन मामलों में भी कांग्रेस के साथ जुडऩे वाली दूसरी पार्टियों की फिक्र जुड़ी हुई है, और उन्हें फिक्र करने का हक भी है। आज कोई भी पार्टी मोदी के मुकाबले एक किसी गठबंधन में कई किस्म की कुर्बानी देकर जुडऩे के लिए तैयार होती है तो उस गठबंधन की मुखिया पार्टी के बारे में उसके कुछ सवाल भी हो सकते हैं, और इनका जवाब दिए बिना बचा नहीं जा सकता।

आज मोदी के मुकाबले जो भी मोर्चा खड़ा होगा उसमें बिहार में लालू यादव की आरजेडी की भूमिका रहेगी ही रहेगी, और ऐसे में अगर आरजेडी के भीतर, लालू के जेल के बाहर रहते हुए भी गृहयुद्ध चल रहा है कि उनके दोनों बेटे मीडिया और सोशल मीडिया के रास्ते एक दूसरे पर हमले कर रहे हैं, तो इससे लालू यादव की किसी भी विपक्षी गठबंधन पर पकड़ कमजोर भी होती है। आज जिस तरह कांग्रेस के अगले अध्यक्ष को लेकर एक रहस्य, और रहस्य से भी बड़ा असमंजस फैला हुआ है, तो उससे भी किसी संभावित गठबंधन में कांग्रेस की बात का वजन घटता है। ऐसे किसी भाजपा विरोधी गठबंधन के बीच आज वैसे भी बहुत किस्म के विरोधाभास और विसंगतियां हैं, लेकिन जब बड़ी-बड़ी पार्टियों के भीतर का गृहयुद्ध या उनके भीतर का असंतोष इस तरह खुलकर सामने आएगा, तो ऐसे गठबंधन की संभावनाएं कमजोर ही होती हैं। एक तो भाजपा के मुकाबले दूसरी बहुत सी पार्टियों पर कुनबापरस्ती की जो तोहमत लगती है, उसका कोई आसान जवाब किसी के पास नहीं है। कांग्रेस पार्टी पर तो देश में राजनीति में कुनबापरस्ती को शुरू करने की ही तोहमत लगती है, लेकिन कांग्रेस से परे भी एनसीपी का पवार परिवार, शिवसेना का ठाकरे परिवार, टीएमसी का ममता परिवार, आरजेडी का लालू परिवार, समाजवादी पार्टी का मुलायम परिवार, कश्मीर की दोनों पार्टियों के अपने कुनबे, डीएमके का स्टालिन परिवार, और इस तरह के और कई पार्टियों के परिवारवाद के जलते-सुलगते मामले सामने हैं। इनके मुकाबले भाजपा एक अधिक वजन के साथ अपने-आपको कुनबापरस्ती से परे की पार्टी साबित करने में कामयाब होती है। मोदी तो अपने को परिवारमुक्त नेता साबित करके एक साख पा ही चुके हैं।

अब देखना यही है कि मोदी विरोधी यह नया मोर्चा अपने आंतरिक विरोधाभास और अपनी विसंगतियों से किस तरह उभरता है, और इसकी हिस्सेदार पार्टियां किस तरह अपने आपको जनता के बीच एक भरोसेमंद विकल्प की तरह पेश कर पाती हैं। आज तो जिस अंदाज में लालू यादव का कुनबा जिस तरह सडक़ पर लड़ रहा है और जिस तरह पार्टी पर उनका कुनबा हावी है, यह विपक्षी गठबंधन में लालू यादव की स्थिति को कमजोर बनाने वाली बात है। कांग्रेस को भी अपने भीतर के दो दर्जन असंतुष्ट नेताओं के बीच अपने घर को चलाना सीखना होगा, वरना उसकी बात का वजन भी कम रहेगा। आगे आगे देखें होता है क्या!

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