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दुष्कर्म के मामलों पर राजनीति दुर्भाग्यजनक

यूं तो प्रत्येक दुष्कर्म किसी भी महिला, उसके पूरे परिवार और समस्त समाज को झकझोरने के लिये काफी होता है पर भारत की बात कुछ और ही है। यहां ऐसी घटनाएं राजनैतिक फायदा उठाने का नायाब अवसर होती हैं। ऐसे मामलों में पीड़िताओं या उसके परिजनों को ढाढस बंधाना, उनके साथ खड़े होना अथवा न्याय दिलाना तो एक तरफ रह जाता है, उसे सभी सियासी दल एक-दूसरे पर आक्रमण करने का मौका मानते हैं। 

दिल्ली में एक 9 वर्षीय बालिका के साथ हुए दुष्कर्म को लेकर चल पड़ी राजनीति इसी नये भारत की झलक है जो पिछले कुछ समय से सबके सामने है। देश की राजधानी के ओल्ड नांगलगांव में इस मासूम से दुष्कर्म कर उसे जला दिया गया। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी उसके पीड़ित परिवार से मिलने गये। उन्होंने पीड़िता के मां-बाप से मुलाकात कर उनकी तस्वीरें ट्विटर पर शेयर कर दीं। मूल राजस्थान के उक्त परिवार की यह बच्ची शाम 5.30 बजे शमशान में पानी लेने गई थी। वहां वह संदेहास्पद स्थिति में मृत पाई गई। बलात्कार के बाद उसकी हत्या होने का शक है। सबूत मिटाने के लिये उसे आनन-फानन में जला दिये जाने का आरोप है। बस्ती में इस मामले को लेकर स्थिति बिगड़ गई। संबंधित परिवार एवं बस्ती वालों का आरोप है कि पुलिस मामले को दबाकर दोषियों को बचा रही है। घटना की जानकारी मिलने पर राहुल वहां गये और परिजनों से अपनी कार के भीतर ही मिले। उसके बाद उन्होंने ट्विटर पर तस्वीरें जारी कर लिखा- ‘माता-पिता के आंसू सिर्फ एक बात कह रहे हैं कि उनकी बेटी देश की बेटी है और न्याय की हकदार है। इस न्याय के रास्ते पर मैं उनके साथ खड़ा हूं।’ 

बेशक, पॉक्सो एक्ट की धारा 23 एवं जुवेनाईल जस्टिस केयर के सेक्शन 74 का उल्लंघन होने के नाते यह गैरकानूनी है। भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता सम्बित पात्रा ने इसे तत्काल मुद्दा बना लिया। दुष्कर्म की आलोचना करने की बजाय उन्होंने माता-पिता की तस्वीर के माध्यम से बच्ची की पहचान उजागर करने के लिए राहुल की आलोचना करते हुए कहा कि वे राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग से मांग करेंगे कि वह राहुल के खिलाफ आवश्यक कानूनों के अंतर्गत कार्रवाई करे। सम्बित यहीं तक नहीं रुकते और कहते हैं- ‘क्या राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पंजाब की दलित बेटियां हिंदुस्तान की नहीं हैं?’ उल्लेखनीय है कि दिल्ली की पुलिस केन्द्र के तहत है और जिन राज्यों का उन्होंने नाम लिया वहां कांग्रेस की सरकारें हैं। 

यह सचमुच बेहद निकृष्ट दर्जे की राजनीति है जिसे देशवासी पिछले कुछ समय से देख रहे हैं। भारत में बलात्कारों समेत महिलाओं-बच्चों के उत्पीड़न के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। नेशनल क्राईम ब्यूरो की 2019 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में औसतन 88 बलात्कार रोज होते हैं। हमारी राजनैतिक पार्टियां इस शर्मनाक परिस्थितियों से देश को निकालने, पीड़िताओं को न्याय दिलाने और महिलाओं के लिए एक सुरक्षित समाज बनाने की बजाय यह चिंता करती है कि ऐसे मामलों का कैसे स्वयं फायदा उठाया जाए और दूसरों को उसका लाभ न लेने दिया जाए। 

अब यह देखा जाता है कि वह किस राज्य की घटना है और वहां किस दल की सरकार है? फिर, पीड़िता का सम्प्रदाय या जाति क्या है? उन्नाव, हाथरस से लेकर जम्मू-कश्मीर में ऐसी कई घटनाएं देखी गई हैं। कहीं बलात्कार के दोषियों को समर्थन देने के लिए राष्ट्रीय झंडों एवं धार्मिक नारों के साथ लोगों का हुजूम उमड़ता है तो कहीं बलात्कारी को जमानत मिलने पर राजनेता जेल के दरवाजे पर खड़े मिलते हैं। पीड़िताओं के खिलाफ ही मामले दर्ज करने या उनके अभिभावकों, परिजनों यहां तक कि वकीलों पर भी हमले करने या मार डालने की घटनाएं हुई हैं। इन मामलों को ऐसा राजनैतिक रंग दे दिया जाता है कि न्याय के दरवाजे बंद हो जाते हैं। पुलिस, मीडिया आदि भी दोषियों के पक्ष में दिखती हैं। 16 दिसम्बर, 2012 की रात दिल्ली में हुए निर्भया कांड के समय बना फंड दुष्कर्म पीड़िताओं के न तो न्याय पाने की दिशा में काम आ रहा है और न ही उनके पुनर्वास के।  ऐसा इसलिए क्योंकि उसका मुश्किल से 27-28 फीसदी ही इस्तेमाल में लाया जाता है। शेष राशि अनुपयोगी रह जाती है। 

आश्चर्य की बात तो यह है कि ऐसी जघन्य घटना होने पर केन्द्र सरकार या गृह मंत्रालय का कोई नुमाइंदा नांगलगांव नहीं गया। ऐसे में, अगर कोई वहां जाता है तो उसकी होने वाली आलोचना हमारी राजनीति के स्तर को ही दर्शाती है। यह सोचने की बात है कि ऐसे में महिलाएं, अल्पसंख्यक, आदिवासी, दलित और कमजोर तबके किस तरह से अपने आपको इस समाज में महफू•ा पाएंगे? ऐसे वक्त में जब टोक्यो ओलिम्पिक में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही लड़कियों की देश भर में ‘हमारी बेटियांÓ, ‘देश की बेटियांÓ कहकर सराहना हो रही है, तो वहीं दूसरी ओर एक दलित लड़की के साथ बलात्कार कर उसे जला दिये जाने जैसी घटना पर राजनीति हो रही है। यह अत्यन्त दुर्भाग्यजनक है।

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