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विपक्ष की सशक्त भूमिका में राहुल गांधी

-सर्वमित्रा सुरजन॥

इस मानसून सत्र में राहुल गांधी संसद में सरकार को घेरने का काम कर रहे हैं। इसके साथ ही विपक्ष के नेताओं को एक साथ जुटाने का काम भी वे बखूबी कर रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने दो बार विपक्ष के नेताओं के साथ बैठक की। पहली बैठक में टीएमसी के नेता मौजूद नहीं रहे। लेकिन मंगलवार को उन्होंने नाश्ते पर विपक्ष के नेताओं को बुलाया, तो इस बार 14 दलों के नेता उनके साथ एक मेज पर बैठे। इनमें टीएमसी, शिवसेना और एनसीपी के नेता भी थे।

देश में इस वक्त जिस तरह की सियासी हलचल हो रही है, उसमें नजर आ रहा है कि 2024 के चुनाव में भाजपा को विपक्ष की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि साम, दाम, दंड, भेद के सिद्धांत में माहिर भाजपा अगले आम चुनावों तक कौन से पैंतरे चलती है, इसका कोई अनुमान फिलहाल लगाया नहीं जा सकता। 2019 में ये अगस्त का ही महीना था जब तीन तलाक पर कानून और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला मोदी सरकार ने लिया था। इसके एक साल बाद अगस्त 2020 में मोदीजी ने राममंदिर का शिलान्यास किया। इन फैसलों से जनहित का उद्देश्य भले न सधता हो, लेकिन हिंदुत्व का एजेंडा जरूर पूरा होता है। अब एक बाऱ फिर अगस्त का महीना आ चुका है, संसद का मानसून सत्र चल रहा है और कयास लग रहे हैं कि भाजपा इस बार समान नागरिक संहिता को लेकर कोई बड़ा कदम उठा सकती है।

हालांकि पेगासस मामले, कृषि कानूनों और महंगाई जैसे मुद्दों पर विपक्ष संसद सत्र को लगातार हंगामेदार बना रहा है, और सरकार के लिए किसी भी विधेयक को पारित कराना आसान नहीं है। लेकिन बात वही है कि वर्तमान भाजपा यानी मोदी-शाह की जोड़ी कब कौन सा दांव खेल दे, इसका अनुमान लगाना कठिन है। इसलिए 2024 के लिए किसी भी तरह की भविष्यवाणी करना किसी भी राजनैतिक पंडित के लिए आसान काम नहीं है। फिर भी मौजूदा दौर की राजनैतिक गतिविधियों को देखकर तो यही लगता है कि गैरभाजपाई दलों का एक साथ, एक बैनर के तले आना अब दूर की कौड़ी नहीं है।

2014 में जब भाजपा ने भारी बहुमत से जीत हासिल कर यूपीए को केंद्र की सत्ता से बेदखल किया था, तब मोदीजी में राष्ट्र उद्धारक का अवतार देश की बहुसंख्यक जनता ने देखा था। उससे पहले 21वीं सदी के गांधी बनने की चाह पाले अन्ना हजारे और उनके चेलों ने कांग्रेस, गांधी परिवार का अपमान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। डॉ. मनमोहन सिंह सक्रिय राजनेता नहीं हैं, न ही चुनावी राजनीति के दांव-पेंचों का उन्हें खास अनुभव था। लिहाजा वे भाजपा और संघ की राजनैतिक चालों को न एकदम से समझ पाए, न उनका जवाब उनसे ढूंढते बना। उनके सलाहकारों पर यह महती जिम्मेदारी थी, लेकिन वे भी अपने-अपने क्षुद्र स्वार्थों में फंसे रहे। कांग्रेस के कई बड़े नेता जहाजी चूहे साबित हुए, जिन्होंने पाला बदलने और फिर सत्ता सुख पाने में देर नहीं की।

सोनिया गांधी ने 10 सालों तक यूपीए सरकार में अपनी भूमिका पार्श्व में रहकर बखूबी निभाई। सिविल सोसायटी और पत्रकारों से उनका जीवंत संवाद था, जिसकी झलक यूपीए शासन के फैसलों में कई बार नजर आई। फिर भी कांग्रेस के ही कई महत्वाकांक्षी नेताओं, हिंदुत्व की परवरिश ली हुई अफसरशाही और उद्योगपतियों के पोसे हुए पत्रकारों ने कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डालने का काम किया। इस बीच राहुल गांधी के कदम भी राजनीति में आगे बढ़े, हालांकि उनके काम से अधिक उनकी पहचान को बदनीयती से मीडिया के जरिए प्रोजेक्ट करने का काम दक्षिणपंथियों ने किया। वंशवाद की राजनीति की सारी बुराई अकेले राहुल गांधी में देश को दिखने लगी। मीडिया में उन्हें कभी युवराज, कभी राहुल बाबा के संबोधन दिए गए।

राहुल गांधी ने अपने पिता और चाचा के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी से अपनी संसदीय पारी की सफल शुरुआत की। राहुल गांधी ने सत्ता को भले ही बेहद करीब से देखा है, उसके दुष्परिणामों को उन्होंने और ज्यादा गहराई से महसूस किया है। 21 साल की आयु तक अपने पिता और दादी की नृशंस हत्या देखना और उसके बाद अपने परिवार पर अनगिनत आरोप देखना आसान नहीं है। इसलिए राहुल गांधी भी शुरु में राजनीति को लेकर अनिच्छुक ही दिखाई दिए। हालांकि सांसद निर्वाचित होने के बाद वे लोगों से सहज भाव से मिलते रहे। फिर भी राजनीति में जिस तरह की निरंतर सक्रियता और जनता से जीवंत संपर्क की जरूरत होती है, वे उसमें कई बार चूक गए। उनकी कई खास मौकों पर विदेश यात्रा भी उनके आलोचकों को उनकी छवि खराब करने का मौका देती रही। राहुल गांधी ने अपने प्रारंभिक राजनैतिक कॅ रियर में कई गलतियां कीं और ये भी शायद सीखने की ही प्रक्रिया है। और अब ऐसा लग रहा है कि राहुल गांधी फ्रंट सीट संभालने के लिए खुद को तैयार कर चुके हैं।

2019 में आम चुनावों में मिली हार के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था। हालांकि उन पर इस पद पर बने रहने का दबाव लगातार पड़ता रहा। लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे न खींचने का फैसला लिया। उनकी लगातार न के बाद सोनिया गांधी को फिर से कांग्रेस का बीड़ा उठाना पड़ा। पर राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद राजनैतिक परिदृश्य से हटे नहीं, बल्कि कुछ और अधिक जोश के साथ वे मोदी सरकार को घेरने की रणनीतियां बनाने में जुट गए। कोरोना महामारी के दो सालों में मोदी सरकार को अपने सवालों से जिस तरह राहुल गांधी ने आड़े हाथों लिया है, वैसा काम किसी और विपक्षी नेता ने नहीं किया।

राहुल गांधी केवल सरकार के आलोचक ही नहीं बने, बल्कि इस दौरान जनता से उनका सीधा संपर्क और संवाद बढ़ा। कभी वर्चुअली, कभी प्रत्यक्ष वे जनता के बीच जाते रहे, उनके साथ सहज भाव से मिलते रहे। खास तौर पर युवाओं और बच्चों से उन्हीं की जुबान में बात करना, उनकी रूचियों के अनुसार उनके साथ समय बिताना आज नेताओं में दुर्लभ गुण होता जा रहा है। मोदीजी तो हर मौके पर देश की जनता से एकालाप करते हैं, उसमें भी प्रवचन ही अब अधिक दिखने लगा है। राहुल गांधी ने आम जनता के साथ-साथ अर्थशास्त्रियों, डाक्टरों, वैज्ञानिकों से भी विमर्श के अवसर तलाशे, जो यह बतलाने के लिए काफी है कि वे खुद को सर्वगुण संपन्न नहीं मानते, बल्कि हर क्षेत्र के जानकारों से सीखने-समझने की इच्छा रखते हैं।

इस मानसून सत्र में राहुल गांधी संसद में सरकार को घेरने का काम कर रहे हैं। इसके साथ ही विपक्ष के नेताओं को एक साथ जुटाने का काम भी वे बखूबी कर रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने दो बार विपक्ष के नेताओं के साथ बैठक की। पहली बैठक में टीएमसी के नेता मौजूद नहीं रहे। लेकिन मंगलवार को उन्होंने नाश्ते पर विपक्ष के नेताओं को बुलाया, तो इस बार 14 दलों के नेता उनके साथ एक मेज पर बैठे। इनमें टीएमसी, शिवसेना और एनसीपी के नेता भी थे। आप और बसपा ने अपनी गैरमौजूदगी से यह दिखा दिया कि वे किसके साथ हैं।

लेकिन बाकी बड़े दलों के नेताओं का एक साथ आना राजनीति में नई इबारत लिखने के संकेत देता है। ममता बनर्जी, शरद पवार के बाद लालू प्रसाद यादव भी विपक्ष के नेताओं को एकजुट करने की मुहिम में जुटे हैं और इनमें से हरेक का यही मानना है कि कांग्रेस को ही इस मोर्चे की अगुवाई करनी होगी। सवाल ये है कि क्या ये सारे नेता राहुल गांधी को यह नेतृत्व करने देंगे। नाश्ते के बाद संसद तक साइकिल यात्रा से तो यही लगा कि राहुल गांधी के हाथ में कमान आ सकती है। लेकिन इस कमान को मजबूती से पकड़ने के लिए अब उन्हें और अधिक फोकस के साथ काम करने की जरूरत है। सांकेतिक विरोध से आगे बढ़कर जनता के बीच अधिक से अधिक जाने की जरूरत है। राहुल गांधी चाहें तो इस मानूसन सत्र के बाद देशव्यापी यात्रा पर निकल जाएं और लोगों से सीधा संवाद कायम करें।

कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं में हौसला जगाएं, उनके ठंडे पड़ चुके जोश में नई ऊर्जा भरें। प्रियंका गांधी उत्तरप्रदेश में यह काम कर ही रही हैं, बाकी राज्यों में भी गांव-गांव घूमकर कांग्रेस के मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांतों को जगाने की जरूरत है। लोगों में इस बात का यकीन जगाएं कि कांग्रेस महज एक पार्टी नहीं, एक आंदोलन का नाम है, जिसने हमेशा भारत की आत्मा को जगाने का काम किया। जो लोकतंत्र और संविधान के आदर्शों के खाद-पानी से संचालित है। इस मुहिम में खरपतवार की तरह बढ़ चुके स्वार्थी नेताओं की छंटनी करना पड़े, तो उसमें भी देर नहीं करना चाहिए।

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