Home राजनीति बाबुल के दर्द को जानना राजनीति को समझना है

बाबुल के दर्द को जानना राजनीति को समझना है

घर से निकलने के बाद भी दुनिया की किसी भी महिला से उसका बाबुल कभी नहीं छूटता। कुछ उसी अंदाज में पश्चिम बंगाल के नेता बाबुल सुप्रियो ने राजनैतिक संन्यास लेते हुए भारतीय जनता पार्टी की दहलीज पार कर ली है; पर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी दल का दामन नहीं थामेंगे। लगभग एक दर्जन भाषाओं में गीत गाने वाले सुप्रियो 90 के दशक से गीत-संगीत की दुनिया में रमे हुए थे। उनकी व्यापक लोकप्रियता को भुनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें 2014 के चुनाव के दौरान अपने खेमे में खींच लिया था। उस वक्त राजनीति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और देश में राष्ट्रभक्ति की लहर चल रही थी।

मोदी ने देश को इस भुलावे में डाल दिया कि भाजपा में शामिल होने का मतलब है राष्ट्र की सेवा। चार्टर्ड एकाउंटेंट से लेकर डॉक्टर और क्रिकेटरों से लेकर कलाकार तक इसमें शामिल हो गये। अब बाबुल ऐसे वक्त पर पार्टी से बिदा हो रहे हैं जब मोदी की लोकप्रियता का ज्वार उतार पर है और पानी के भीतर से देशभक्ति के नाम पर भाजपा की छोड़ी गाद किनारों पर साफ दिखने लगी है। पार्टी द्वारा उनके प्रति अपनाया गया रवैया उन्हें आहत कर गया है। राष्ट्रवादियों की राजनीति के खेल में बाबुल जैसे लोग किसी प्यादे से अधिक की हैसियत नहीं रखते। यह उन सबके लिए एक सबक है जो आज की भाजपा से प्रभावित होकर या तो उसमें शामिल हैं अथवा उसके समर्थक हैं। नेताओं से लेकर समर्थकों तक के लिए यह बात कही जा सकती है।

1970 में पश्चिम बंगाल के एक छोटे से कस्बे उत्तरपाड़ा में जन्मे बाबुल ने लिलाह के डॉन बास्को स्कूल में पढ़ाई की। कोलकाता विश्वविद्यालय से वाणिज्य में स्नातक की डिग्री ली और गायन को अपना कैरियर बनाने के पहले कुछ समय स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक में भी काम किया। भाजपा की टिकट पर उन्होंने 2014 में आसनसोल की सीट पर जीत दर्ज की। 2019 में दोबारा यहां से वे जीते और मंत्री बनाए गए। इस वर्ष हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में वे टॉलीगंज क्षेत्र से खड़े हुए परन्तु तृणमूल कांग्रेस के सामने हार गये। लोकप्रियता होने के बावजूद हारने का गम वे अभी ठीक से भुला भी नहीं पाए थे कि मोदी मंत्रिमंडल में हुए फेरबदल का शिकार हो गये। उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया। वे जल्दी ही सांसदी से भी इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर स्पष्ट कर दिया है कि उनके इस्तीफे का कारण उन्हें मंत्री पद से हटाया जाना है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया है कि वे न तो कोई दल बना रहे हैं या किसी अन्य पार्टी में जा रहे हैं। 

अपमान व व्यथा का ढेर सा दर्द अपने सीने में छिपाये हुए वे भाजपा को राम-राम तो कर चुके हैं, परन्तु उनकी दारुण कथा के अनेक आयाम हैं जो भाजपा नेतृत्व के चरित्र को दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं। पहला तो यह कि विधानसभा सीट हारने एवं उनके राज्य में चुनाव होने के साथ ही उनकी उपयोगिता एवं महत्ता खत्म हो गई। यह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को आघात पहुंचाने के लिए काफी है। ऐसा भी समझा जाता है कि इस चुनाव में भाजपा के ही लोगों ने उन्हें हराने के लिए उनके विपक्षी उम्मीदवार को मदद की ताकि वे मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल न हो सकें। यह बात भी सामने आई थी कि चुनाव प्रचार को लेकर पार्टी का प्रदेश नेतृत्व विभाजित था। दूसरे, जिस प्रकार से तृणमूल कांग्रेस की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की लोकप्रियता बढ़ी है और राज्य के भाजपा नेताओं पर शिकंजा कसता जा रहा है, उनके अंदर भय होना भी स्वाभाविक है। टीएमसी के ही कई वे नेता भाजपा में जा चुके थे, ममता के पास लौट आये हैं। साथ ही, अगले चुनावों तक उनके पास कोलकोता से दिल्ली और दिल्ली से कोलकोता की उड़ानें भरने के अलावा अन्य कोई विशेष काम नहीं रह जायेगा। विरोधी दल की सत्ता वाले राज्य में कुछ कर पाने की शून्य गुंजाइश को देखते हुए भी संभवत: उन्होंने यह कदम उठाया होगा। अलबत्ता, इस मुकाम पर पहुंचकर उन्हें यह इलहाम जरूर हुआ है; और जैसा कि उन्होंने लिखा भी है- ‘समाजसेवा करने के लिए राजनैतिक दल का सदस्य होना जरूरी नहीं है।’

हां, इस बात की तारीफ अवश्य होनी चाहिए कि असहज महसूस होते ही बाबुल ने पार्टी से अलग होने और उसके साथ ही नैतिक मानदंडों का पालन करते हुए लोकसभा से भी त्यागपत्र देने का ऐलान कर दिया है। वरना, बिना पद के भी वे सदस्य बने रह सकते थे। मंत्री पद ही गया था। बाकी सुविधाएं, भत्ते, बंगला, मोटी तनख्वाह और संसद सदस्य होने का रूतबा व ठसक तो उनसे कोई नहीं छीन सकता था। सुप्रियो से उनका ‘राजनैतिक बाबुल’ छूटना सामान्यत: हमारी समग्र राजनीति और विशेषकर भाजपा की कार्यप्रणाली का ज्वलंत उदाहरण है। संभव है कि उनके हटने के असली राज (अगर कोई हैं तो) कुछ समय के बाद सामने आएं।

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