Home गौरतलब मिसाल एक ऐसी ख़बर, जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया

एक ऐसी ख़बर, जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया

भगवान जगन्नाथ के घर से निकली एक मिसाल पर बाकी हिंदुस्तान भी चले…

-सुनील कुमार॥

अभी चार दिन पहले हिंदुस्तान में बड़ी अहमियत वाली एक बात हुई लेकिन उसे खबरों में ठीक से जगह भी नहीं मिल पाई क्योंकि वह सनसनीखेज नहीं थी, वह राजनीति या क्रिकेट नहीं थी, जुर्म नहीं थी, सेक्स नहीं थी, उससे अधिक जगह राज कुंद्रा की पॉर्नोग्राफी को मिलती रही, उससे अधिक जगह राजनीति के ओछे आरोपों को मिलती रही। लेकिन यह मुद्दा ऐसा है जिस पर लिखना सोचना और अमल करना जरूरी है। देश में जो एक पिछड़ा हुआ राज्य माना जाता है, उस ओडिशा के पुरी को यह फख्र हासिल हुआ है कि वह हिंदुस्तान का ऐसा पहला शहर बना है जहां नल के पानी को पिया जा सकता है। भारत के शुद्ध और साफ पानी के जो पैमाने हैं, उन पर जगन्नाथपुरी शहर के नलों का पानी खरा उतरा है। और ऐसा भी नहीं कि नल से साफ पानी कुछ गिने-चुने घंटे आता है कि लोग उन्हें घरों में भर लें। चौबीसों घंटे पुरी के नलों से ऐसा साफ पानी आ रहा है कि जिसे पूरी तरह भरोसे के साथ पिया जा सकता है। वहां के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पहल पर पूरे प्रदेश में इस सुजल योजना का विस्तार किया जा रहा है। और ओडिशा राज्य सरकार का यह कहना है कि पुरी की ढाई लाख आबादी और साल भर में वहां पहुंचने वाले दो करोड़ पर्यटकों को यह शुद्ध पानी पूरे वक्त हासिल रहेगा जिसे पूरे भरोसे के साथ पिया जा सकेगा। सरकार का यह अंदाज है कि इससे हर बरस करीब तीन करोड़ प्लास्टिक बोतलें बचेंगी जिनमें भरा हुआ पानी साल भर में यहां खर्च होता है। सरकार का यह भी अंदाज है कि इससे करीब 400 टन प्लास्टिक कचरा बचेगा।

आज हिंदुस्तान की किसी भी किस्म की सरकारी तस्वीरों को देखें, जिनमें कोई कार्यक्रम हो रहा हो या मंच पर कुछ चल रहा हो, या कोई सरकारी बैठक हो रही हो, तो उनमें से हर मेज पर प्लास्टिक की बोतल में पानी लोगों के सामने दिखता है। सरकारी दफ्तरों में बड़े अफसरों के लिए, या नेताओं के बंगलों में अधिकतर लोगों के लिए, ऐसी बोतलों के बक्से भरे रहते हैं। और लोग अब आदी हो गए हैं कि कौन खतरा उठाएं, उसके बजाय बाजार का बोतल बंद महंगा ब्रांड पानी खरीद कर अपनी हिफाजत का ख्याल रखा जाए। नतीजा यह हो रहा है कि प्लास्टिक की बोतलों का अंबार बढ़ते ही चल रहा है. प्लास्टिक प्रदूषण का एक तरफ पहाड़ बन रहा है और दूसरी तरफ समंदर के पानी में ऐसी खाली बोतलें पहुंचकर किनारों को इतना प्रदूषित कर रही है कि वहां जल जीवन खत्म होते जा रहा है क्योंकि इन बोतलों को पार करके सांस लेना पानी के जानवरों के लिए मुमकिन नहीं रह गया है। फिर जैसा कि प्लास्टिक का विज्ञान बतलाता है ये बोतलें धरती पर हजारों बरस तक खत्म नहीं होनी हैं। और आज प्लास्टिक के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बोतलबंद पानी हो गया है जो कि पूरी तरह से गैरजरूरी था। अगर स्थानीय सरकारें साफ पानी उपलब्ध करा सकतीं तो इन बोतलों की किसी को जरूरत ही नहीं पड़ती।

यूरोप के देशों में आमतौर पर यह दिखता है कि सार्वजनिक जगहों पर नल लगे हुए हैं जिनसे लोग पानी पीते ही रहते हैं और अपनी बोतलों में भरते रहते हैं। बहुत से विकसित देश ऐसे हैं जहां होटलों के बाथरूम में यह तख्ती लगी रहती है कि बाथरूम के नल से पीने के लिए पानी लिया जा सकता है, पानी एकदम साफ और सुरक्षित है। दूसरी तरफ आज हिंदुस्तान में अतिसंपन्न तबका ऐसा भी है जो अपने घर के भीतर फिल्टर का पानी भी नहीं पीता है, और घर के भीतर भी कारखाने की बोतलों का महंगा पानी पीता है। एक तरफ सचिन तेंदुलकर और हेमा मालिनी जैसे लोग संसद में एक-एक कुर्सी पर कब्जा करके बरसों तक बैठे रहते हैं, और पीने के पानी के ब्रांड का इश्तिहार करते हैं, वाटर फिल्टर का इश्तिहार करते हैं, दूसरी तरफ इन लोगों ने संसद के इतने बरसों में देश के गरीब लोगों को साफ पानी मिलने के हक के बारे में कभी एक शब्द नहीं कहा, ना संसद के भीतर कहा, ना संसद के बाहर का है। देश के लोगों को साफ़ पानी मिलने लगेगा तो इनके इश्तिहार ख़त्म न हो जायेंगे?

इस देश की तकलीफ यह है कि जिन लोगों के कंधों पर सरकारी योजनाएं बनाने और उन पर अमल करने का जिम्मा है, ऐसे नेता और अफसर अपने खुद के लिए जनता के पैसों पर महंगा पानी खरीद लेते हैं, और फिर जनता को गंदे पानी के हवाले कर देते हैं। अगर जनता के दबाव में ऐसा होने लगे कि सरकारी और राजनीतिक बैठकों में, और सार्वजनिक कार्यक्रमों में तमाम नेताओं और अफसरों को वहीं मौजूद नल का पानी ही परोसा जाएगा, तो हो सकता है कि बड़ी रफ्तार से नलों का पानी साफ होने लगे। यह कुछ उसी किस्म का है कि अगर सरकारी दफ्तरों में नेताओं और बड़े अफसरों को भी आम शौचालयों में जाना पड़े, आम पेशाबघरों में जाना पड़े, तो वे शौचालय और पेशाब घर साफ रहने लगेंगे। इसलिए देश की किसी हौसलामंद सरकार को सबसे पहले तो यह करना चाहिए कि वह एक तारीख की मुनादी कर दे किस तारीख के बाद किसी के लिए बोतलबंद पानी का इंतजाम नहीं किया जाएगा, और मंत्री, अफसर और दूसरे लोग सरकारी इमारतों में या सार्वजनिक कार्यक्रमों में आम नलों का ही पानी पिएंगे।

ओडिशा का जगन्नाथपुरी इस देश के ही एक पिछड़े राज्य का एक हिंदू तीर्थ स्थान है जहां कि अंधाधुंध पर्यटक भीड़ रहती है, और जहां बहुत साफ-सफाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसे में ओडिशा सरकार ने पूरे देश में एक पहल करके दिखाई है, और ओडिशा तो अपने बाकी शहरों के लिए इस इंतजाम को बढ़ा रहा है, लेकिन बाकी प्रदेशों को अपने बारे में सोचना चाहिए। हिंदुस्तान के उन बड़े शहरों को भी अपने बारे में सोचना चाहिए जो कि स्मार्ट सिटी नाम के केंद्र सरकार के पाखंड के तहत हजारों करोड़ों रुपए पा चुके हैं, और इनमें से अधिकांश हिस्सा मनमानी के दिखावे में बर्बाद भी कर चुके हैं। जबकि किसी भी स्मार्ट सिटी को सबसे पहले अपनी सिटी के ढांचे में आम जनता के लिए पीने का साफ पानी, सडक़ और नाली की सफाई, और रोशनी का इंतजाम, इन दो-तीन बुनियादी चीजों का इंतजाम सबसे पहले करना था। लेकिन जिन कामों में भ्रष्टाचार सबसे अधिक अनुपात में हो सकता है, स्मार्ट सिटी वैसे ही कामों में लग गईं और जनता का पैसा बर्बाद होते चले गया। जिन शहरों में लोग जागरूक हैं वहां लोगों को अपनी स्थानीय संस्था को पुरी की यह मिसाल देते हुए सार्वजनिक रूप से उन्हें चुनौती देनी चाहिए कि वे ओडिशा के इस शहर की कामयाबी का मुकाबला करके दिखाएं तब अपने आपको स्मार्ट कहें।

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