Home राजनीति शांतिदूत नेहरू से अब तक डर..

शांतिदूत नेहरू से अब तक डर..

-सर्वमित्रा सुरजन॥

नेहरूजी की विदेशनीति का आधार ही विश्वशांति, गुटनिरपेक्षता और पंचशील के सिद्धांत थे। जब पूरी दुनिया अमेरिका और रूस के गुटों में बंटी हुई थी, उस वक्त भारत समेत कई नवस्वतंत्र देशों के लिए अपनी स्वतंत्रता और सम्मान के साथ गुटनिरपेक्ष रहने का फैसला नेहरूजी के कारण ही मुमकिन हुआ और कई देश अनावश्यक युद्धों में फंसने से बच गए। भारत की विदेशनीति बरसों-बरस इन्हीं सिद्धातों पर चलती रही।

जिस देश के लोग बात-बात पर देशप्रेमी होने का दम भरते हों। जिस देश में उग्र राष्ट्रवाद से ओतप्रोत फिल्में बनाकर देशभक्ति का परिचय दिया जाता हो। जहां का प्रधानमंत्री आजादी के 74 साल बाद लोगों से ये अपील करे कि अधिक से अधिक संख्या में राष्ट्रगान गाएं और बाकायदा इसके लिए वेबसाइट बनाई गई है, जहां राष्ट्रगान गाकर, उसे रिकार्ड कर इस अभियान से लोगों को जुड़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। उस देश की जनता से यह स्वाभाविक अपेक्षा रहती है कि वह अपने इतिहास के बारे में सामान्य जानकारी रखती ही होगी। देशप्रेमी जनता को अपने पहले प्रधानमंत्री के बारे में भी जानकारी होगी। और अगर जनता इस ओर से अनजान भी है, तब भी इतनी अपेक्षा तो राजनैतिक दलों से रहती ही है कि वे अपने स्वाधीनता सेनानियों का सम्मान करेंगे और पूर्व प्रधानमंत्रियों के बारे में ओछी टिप्पणियों से बाज़ आएंगे। लेकिन इस वक्त राष्ट्रवाद के रंग में रंगे भारत में ऐसी कोई भी अपेक्षा बेमानी है।

गूगल सर्च पर जाकर नेहरू लिखने से जो खोज परिणाम सामने आते हैं, वे चौंकाते हैं। नेहरू की अय्याशी, नेहरू की असलियत, क्या नेहरू के पूर्वज मुसलमान थे, ऐसे शीर्षक खोज परिणाम में सामने आते हैं। इसके अलावा कई सारी तस्वीरें इस तरह प्रस्तुत होती हैं, जिन्हें देखकर ही यह समझ आता है कि इनके पीछे नेहरूजी के चरित्रहनन की सारी तैयारी है। देशप्रेम की ऊर्जा से चलने वाले भारत में अपने पहले प्रधानमंत्री के प्रति ये रवैया दुखद होना चाहिए, लेकिन इस पर व्यापक समाज की पेशानी पर सामान्य बल भी नहीं आते कि ऐसा क्यों हो रहा है।

दरअसल नेहरूजी आज सशरीर उपस्थित न होकर भी उन लोगों को आक्रांत कर रहे हैं, जिन्हें उनकी व्यापक विश्वदृष्टि, इतिहास की गहरी समझ, लोकतंत्र के प्रति आस्था और जनसामान्य के लिए संवेदनाओं से पहले भी तकलीफ थी और आज भी है। नेहरूजी के उदार, प्रगतिशील विचार और इन विचारों के अनुरूप कार्यों, राजनैतिक फैसलों से दक्षिणपंथियों को हमेशा से तकलीफ रही है। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने वालों की सोच के आगे नेहरूजी की सम्यक दृष्टि हमेशा भारी पड़ती थी। तर्कों से जो लोग नेहरूजी का मुकाबला पहले नहीं कर पाए, वे उनके चरित्रहनन से अपना हिसाब बराबर करना चाहते हैं। नेहरूजी के बारे में कई सारे झूठे प्रसंग और बातें, अफवाहों के माहिर लोगों के संघ ने फैलाई हैं। नेहरूजी के कपड़े पेरिस धुलने जाते थे, उनके कितनी महिलाओं से प्रेम प्रसंग थे, वे व्यसनी थे, इस तरह की बातें तो बरसों से चली आ रही हैं। और अब उन झूठी बातों का दायरा और बढ़ता जा रहा है।

व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय आधुनिक तकनीकी की मदद से ऐसी झूठी बातों को खूब प्रचारित कर रही है। हिटलर के वंशज गोएबल्स की नीति पर चलते हुए एक झूठ को इतनी बार दोहरा रहे हैं, कि वो सच लगने लगे। आजादी का संघर्ष जिस पीढ़ी ने देखा और उसके बाद अगली पीढ़ी को उस संघर्ष का विवरण सुनाया, वे लोग मिथ्या प्रचार के इस जाल में इतना नहीं फंसे, जितना आज की पीढ़ी फंस चुकी है। इसका एक कारण तो यही है कि सत्य के अन्वेषण की आदत कहीं छूटती जा रही है।

सूचनातंत्र ने जो सूचनाएं आप तक पहुंचाई, उन पर ज्यादा मंथन किए बिना जस का तस स्वीकार कर लेने की आदत ने अफवाहों वाले संघ का काम आसान किया है। इसलिए इस पीढ़ी के सामने अब स्वाधीनता सेनानियों का परिचय भी राजनैतिक दलों की सुविधा के हिसाब से दिया जा रहा है। जैसे भगत सिंह को पगड़ीधारी सिख की तरह चित्रित किया जाता है। नेताजी को बंगाली अस्मिता के प्रतीक के तौर पर। अभी 23 जुलाई को चंद्रशेखर आजाद की जयंती पर सोशल मीडिया में उनकी जनेऊधारी तस्वीर को प्रसारित किया गया, ताकि उन्हें हिंदुत्व के एजेंडे से जोड़ा जा सके। वाराणसी में तो बाकायदा उनकी मूर्ति को दूध से नहलाकर, जनेऊ चढ़ाकर पूजा की गई। उनकी शहादत को हिंदुओं और उसमें भी ब्राह्मणों तक सीमित करने का यह प्रयास दरअसल उनका अपमान है। लेकिन राष्ट्रवाद के धर्म में ऐसे सारे पापों के लिए माफी शायद पहले ही घोषित हो चुकी है।

व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय के महारथी शिक्षकों को शायद इस बात का इल्म नहीं होगा कि हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सुप्रीम कमांडर चंद्रशेखर आजाद को तो एक बार सावरकर ने संदेश भिजवाया था कि क्रांतिकारियों को अंग्रेजों से लड़ना बंद करके जिन्ना और मुसलमानों की हत्या करनी चाहिए। इस काम के लिए उनके दिए पचास हजार रुपयों को आजाद ने यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि ‘हमारी लड़ाई अंग्रेजों से है, मुसलमानों को हम क्यों मारेंगे?’

हिंदू राष्ट्र के जुमलों से प्रभावित हुए अपने एक साथी को आजाद ने समझाया था कि ‘हे भगत! तेरी ये हिंदू राजतंत्र की कल्पना देश को बहुत बड़े खतरे में डालने वाली है’ कुछ मुसलमान भी ऐसा ही स्वप्न देखते हैं। लेकिन यह तो पुराने शाही घरानों के हिंदुओं और मुसलमानों की खब्त है। हमें तो फ्रंटियर से लेकर बर्मा तक और नेपाल से लेकर कराची तक के हर हिंदुस्तानी को साथ लेकर एक तगड़ी सरकार बनानी है।’ यशपाल की किताब सिंहावलोकन में इन तमाम प्रसंगों का जिक्र है। आज की पीढ़ी को गुमराह करने के लिए आजाद को हिंदुत्व के प्रतीक के तौर पर पेश किया जा रहा है।

पं.नेहरू को लेकर भी ऐसे कई झूठे अफसाने गढ़े गए हैं। इसके बाद भी उनका कद कम करने में सफलता नहीं मिली, तो कभी सरदार पटेल से उनकी दुश्मनी बताई गई, कभी सुभाष चंद्र बोस से जलन भरी प्रतियोगिता दिखाई गई। कश्मीर से लेकर चीन तक के मसलों के लिए नेहरूजी को जिम्मेदार ठहराया गया। और अब ये देखकर हैरानी होती है कि इस मुहिम में राज्यपाल जैसे पद पर आसीन लोग भी जुड़ रहे हैं। ऊपर लिखी सारी बातों का संदर्भ दरअसल हाल ही के एक प्रसंग से निकला है। 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस पर महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने कहा कि, ”नेहरू का राष्ट्र और स्वतंत्रता संग्राम में बड़ा योगदान है।

लेकिन वह स्वयं को शांतिदूत मानने लगे थे और इसकी कीमत वर्षों तक देश को चुकानी पड़ी। उनकी शांति की पहल से भारत को नुकसान हुआ।” राज्यपाल के पद पर आसीन व्यक्ति देश के पहले प्रधानमंत्री के बारे में, जिनकी मौत को एक अरसा बीत गया, इस तरह के बयान दे, यह बेहद अफसोसनाक है। श्री कोश्यारी ने यह भी कहा कि बाजपेयीजी के पहले जितनी भी सरकारें थीं, वे राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर दबाव झेलने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली नहीं थीं। अटल बिहारी बाजपेयी के वक्त हमने परमाणु परीक्षण किया, जबकि हमारे वैज्ञानिक यह करने में 20 साल पहले ही सक्षम थे।

लेकिन तब सरकारें डरती थीं। यह बयान भी मिथ्या दावों से भरपूर है। क्योंकि सच यही है कि इंदिरा गांधी के शासनकाल में 1974 में भारत ने पहला परमाणु परीक्षण कर लिया था, इससे तीन साल पहले 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश को आजाद कराने में इंदिरा गांधी ने अपनी शक्तिशाली भूमिका का परिचय विश्व को दे दिया था। जाहिर है भगतसिंह कोश्यारी जैसे संघ में दीक्षित लोग इंदिरा गांधी के इस परिचय को देश के सामने नहीं रखना चाहेंगे, क्योंकि यह उनके हिंदुत्व के एजेंडे में बाधक होता है। वैसे इंदिरा गांधी से पहले लालबहादुर शास्त्री भी पाकिस्तान को युद्ध में हरा चुके थे। नेहरूजी, शास्त्रीजी, इंदिरा गांधी इन प्रधानमंत्रियों ने कभी भी विदेशी शक्तियों के आगे समर्पण का भाव नहीं रखा। हिंदुस्तान को आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ा कराना इनका लक्ष्य था, लेकिन इसके लिए अमेरिका या पूंजीवादी लॉबी के आगे देश ने इनके काल में कभी घुटने नहीं टेके थे।

श्री कोश्यारी का यह कथन भी विरोधाभासों से भरा है कि नेहरूजी खुद को शांतिदूत मानते थे। उन्हें अपने इतिहास के ज्ञान को दुरुस्त करने की जरूरत है। नेहरूजी की विदेशनीति का आधार ही विश्वशांति, गुटनिरपेक्षता और पंचशील के सिद्धांत थे। जब पूरी दुनिया अमेरिका और रूस के गुटों में बंटी हुई थी, उस वक्त भारत समेत कई नवस्वतंत्र देशों के लिए अपनी स्वतंत्रता और सम्मान के साथ गुटनिरपेक्ष रहने का फैसला नेहरूजी के कारण ही मुमकिन हुआ और कई देश अनावश्यक युद्धों में फंसने से बच गए।

भारत की विदेशनीति बरसों-बरस इन्हीं सिद्धातों पर चलती रही, इसी वजह से वैश्विक मानचित्र में भारत को सम्मानजनक दर्जा मिलता रहा। आज नया भारत बनाने की सनक में विदेश नीति के इन पारंपरिक मूल्यों को तिलांजलि दी जा चुकी है। संपन्न, शक्तिशाली देशों के राष्ट्रपतियों से गले मिलने को भारत की ताकत के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। लेकिन भारत की असली ताकत सच और शांति के लिए उसके आग्रह में है। नेहरूजी इन्हीं मूल्यों पर जीते रहे, लेकिन आज इन मूल्यों के साथ-साथ नेहरूजी को भी गलत साबित करने की साजिश रची जा रही है। देशभक्ति की यह परिभाषा देश पर कहीं भारी न पड़ जाए।

Facebook Comments
(Visited 1 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.