Home गौरतलब केन्द्र की नाकामी का सबूत है असम-मिजोरम सीमा पर हिंसा

केन्द्र की नाकामी का सबूत है असम-मिजोरम सीमा पर हिंसा

भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार की विभाजनकारी नीतियों का एक और परिणाम पूर्वोत्तर राज्य के असम और मिजोरम के बीच हुई हिंसा के रूप में देखने को मिला है। सोमवार को मिजोरम की ओर से कुछ तत्वों द्वारा सीमा पर गोलीबारी की गई। इसमें पुलिस के छह जवान शहीद हो गये वहीं एक पुलिस अधीक्षक समेत 50 लोग घायल हुए हैं। जब दोनों राज्यों के प्रशासनिक अधिकारी बातचीत कर रहे थे उसी दौरान कुछ उपद्रवी तत्वों ने गोलियां चला दीं। मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरामथांगा ने आरोप लगाया है कि असम पुलिस ने उनके नागरिकों पर लाठीचार्ज किया तथा आंसूगैस के गोले छोड़े। 

दोनों ही राज्यों के बीच लंबे समय से सीमा विवाद चल रहा है। मिजोरम के आइजोल, कोलासिब और मामित तथा असम के कछार, हैलाकांडी तथा करीमगंज जिले आपस में करीब 165 किमी की सीमा बनाते हैं। इन दोनों ही राज्यों के नागरिक एक-दूसरे पर घुसपैठ करने का आरोप लगाते रहे हैं। यह हिंसा ऐसे वक्त में हुई है जब केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह दो दिन पहले ही वहां से लौटे हैं। तब भी सीमा विवाद पर चर्चा हुई थी। शाह ने इस विवाद को सामंजस्य तरीके से हल करने एवं हिंसा न करने को कहा है। दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री अर्थात जोरामथांगा और असम के हिमंत बिस्वा सरमा एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं और दोनों के बीच ट्विटर युद्ध भी छिड़ा हुआ है। उल्लेखनीय है कि भारत के उत्तर-पूर्व के आठ राज्यों में असम, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम शामिल हैं। यह क्षेत्र एक संकरे गलियारे द्वारा भारत की मुख्य भूमि से जुड़ा हुआ है। अनेक पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाएं चीन, म्यांमार, भूटान, बांग्लादेश आदि देशों से लगती हैं। इन राज्यों पर लंबे समय से चीन की नजर है और वह वहां अशांति फैलने तथा घुसपैठ का हमेशा से आकांक्षी रहा है। अनेक पूर्वोत्तर राज्य जहां एक ओर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के विवाद झेल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आपसी सीमा विवादों में भी उलझे हुए हैं। भाजपा प्रशासित असम पहले मुख्य राज्य हुआ करता था जिसके कई बार पुनर्विभाजन एवं पुनर्गठन से इस क्षेत्र में कई अन्य राज्य बने हैं।

पूर्ववर्ती केन्द्र सरकारें हमेशा से संघीय ढांचे का सम्मान करती रही हैं, जिसके कारण यह क्षेत्र आपस में बंधा हुआ रहा। ऐसे आपसी विवाद उभरते तो रहे हैं लेकिन उन्हें शांत करने के गंभीर प्रयास हुए हैं। भाजपा के केन्द्र में आने के बाद नागरिकों और राज्यों के बीच तनाव तथा मतभेदों को हवा मिलती आई है। अपने चुनावी एजेंडे के तहत भाजपा हमेशा ऐसे आंतरिक विभाजनों का फायदा लेने की कोशिशें करती हैं जिनसे राज्यों को भी इन विवादों को तूल देने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। भाजपा को अपने राजनैतिक और चुनावी हितों को परे रखकर पूर्वोत्तर राज्यों को इसलिए एक धागे में पिरोकर रखने की नीति अपनानी होगी क्योंकि यह क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक महत्व का है तथा बेहद संवेदनशील भी। 

इन पूर्वोत्तर राज्यों की कई समस्याएं हैं। बड़ी आबादी के अवैध घुसपैठ के कारण स्थानीय आर्थिक और पर्यावरणीय संसाधनों पर दबाव संबंधी मुद्दे यहां हावी रहते हैं। लचर प्रशासनिक व्यवस्था के कारण सीमा पार से नशीली दवाओं की तस्करी सहित अपराधियों का सीमा पार से अवैध आवागमन होता रहता है। इस क्षेत्र में व्यापक सांस्कृतिक, सामुदायिक और जातीय विविधता भी परस्पर संघर्ष का कारण बनती रहती है। समग्र राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर इन सीमा विवादों को तत्काल सुलझाकर सीमाओं को सुरक्षित करने की आवश्यकता है। यहां के नागरिकों को रोजगार और बुनियादी सुविधाएं दी जानी चाहिए। 

यह दुर्भाग्यजनक है कि इन क्षेत्रों में अनेक राज्य एक दूसरे से साथ सीमा विवादों में उलझे रहते हैं। इनमें असम और नागालैंड के बीच 1963 से विवाद चल रहा है। असम का दावा है कि नागालैंड ने उसके 50 हजार हेक्टर से अधिक की जमीन पर अवैध कब्जा किया हुआ है। 1968, 1979 और 1985 में दोनों राज्यों के बीच हिंसक संघर्ष देखे गये थे। असम और मेघालय के बीच 1971 से विवाद चल रहा है। मिकिर पहाड़ी, संयुक्त खासी और जंटिया पहाड़ियों पर दोनों राज्य दावा करते हैं जिसके कारण इन राज्यों के नागरिकों के बीच कई बार झड़पें हुई हैं। ऐसे ही, असम और अरूणाचल प्रदेश के बीच 1972 से झगड़ा चालू है। अरूणाचल वालों का असम के लोगों पर अतिक्रमण का आरोप है। उधर अरूणाचल प्रदेश व मिजोरम के बीच अलग सीमा विवाद जारी है। यहां भी 1992 में कई झड़पें हुई थीं। अरूणाचल प्रदेश सरकार का आरोप है कि असमिया लोग उनके क्षेत्र में घर, बाजार तथा पुलिस स्टेशन बना रहे हैं। 

केन्द्र सरकार को तेजी से पहल कर न केवल अंतरराष्ट्रीय सीमा विवादों को सुलझाना होगा बल्कि इस संवेदनशील और सामरिक महत्व के राज्यों के बीच सीमा विवादों के स्थायी हल ढूंढने होंगे। आंतरिक शांति के बिना विदेशी दबावों को झेल पाना खासा मुश्किल होगा।

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.