आपदा नियंत्रण की प्रभावी प्रणाली हो..

आपदा नियंत्रण की प्रभावी प्रणाली हो..

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भारत के अनेक हिस्सों में बाढ़ के कारण बहुत बुरी स्थिति बनी हुई है। महाराष्ट्र में हालत बेहद खराब दिखाई दे रहे हैं। मुंबई से लेकर गोवा तक का पूरा इलाका पानी-पानी हो गया है। कर्नाटक व राजस्थान में भी मानसून कहर बरपा रहा है। वैसे तो यह तकरीबन हर साल ही वर्षाकाल के दौरान का यह किसी न किसी राज्य में ऐसा होता है परन्तु यह दुर्भाग्यजनक है कि केन्द्र और राज्य सरकारों का बड़ा ध्यान ऐसी स्थिति में बचाव और राहत पर ही होता है लेकिन एक बार बाढ़ का पानी उतर जाने के बाद इस समस्या से स्थायी निजात पाने के उपायों पर चर्चा तक नहीं होती। हुक्मरानों को जानना चाहिये कि बाढ़ से बचने के उपाय बरसातों के पहले या बाद में ही हो सकते हैं, उस दौरान नहीं। एक मजबूत, प्रभावशाली और स्थायी आपदा प्रबंधन तो आवश्यक है ही, ऐसी आपदाएं न आयें; और आयें भी तो उनका असर और नुकसान न्यूनतम हो, इस तरह की प्रणाली निर्मित करनी होगी। 

पिछले तीन-चार दिनों से महाराष्ट्र का कोंकण क्षेत्र बाढ़ से भारी प्रभावित हुआ है। यहां करीब 90 हजार लोगों को आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने बचाया है। वायुसेना ने पानी में फंसे करीब 1000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया और लोगों के लिये खाने-पीने की वस्तुएं गिराई हैं। लगभग डेढ़ सौ लोगों को वर्षा और बाढ़ के कारण जान गंवानी पड़ी है। आवासीय और व्यवसायिक इमारतों को भी बड़ा नुकसान पहुंचा है। महाड का तलिये गांव सर्वाधिक प्रभावित हुआ है जिसका महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने हवाई सर्वेक्षण किया। कोंकण के रायगढ़, चिपलूण, खेड़ आदि कस्बों में जान-माल के बड़े नुकसान की खबरें हैं। पश्चिम महाराष्ट्र के कोल्हापुर में भी करीब 600 लोगों को पानी में डूबे घरों से बाहर निकाला गया। सतारा में 28 लोगों की मौत हुई है। इसके अलावा कर्नाटक भी इस समय बाढ़ से घिरा हुआ है। उसका उत्तरी इलाका, तटीय भूभाग और मलनाड क्षेत्र भी पानी में डूबे हुए हैं। यहां बड़ी संख्या में मकानों और स्कूलों को नुकसान पहुंचा है। यहां 10 लोगों की जान गई है वहीं बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया है। आंध्र प्रदेश में भी कुछ क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति है। उधर बिहार के तराई इलाके के 11 जिलों में भी बड़ी बाढ़ आई है। 15 लाख से ज्यादा की आबादी इसमें फंसी हुई है। राजस्थान के भी कुछ इलाके जलमग्न हुए हैं। हाल ही में मुंबई में भी जलजमाव हुआ था और उत्तरं प्रदेश के वाराणसी सहित कई शहरों में पानी भर आया था।  

बाढ़ एक नैसर्गिक आपदा है इसलिये इसे शत-प्रतिशत तो नहीं टाला जा सकता लेकिन सैकड़ों सालों से बाढ़ के इलाके लगभग तय होते हैं इसलिये उसकी विभीषका को कम करने का उपक्रम तो ही किया जा सकता है। तकरीबन हर साल कोंकण, बिहार के मिथिला क्षेत्र, ब्रह्मपुत्रा के तटवर्ती इलाकों आदि में छोटी या बड़ी बाढ़ें आती ही रहती हैं। कोंकण में बाढ़ का कारण अतिवृष्टि होता है तो मिथिला में कोसी नदी के कारण बड़ा इलाका जलमग्न होता है। बिहार के कई मैचानि इलाकों में गंगा कहर बरपाती है। ब्रह्मपुत्रा देश की सबसे बड़ी नदी है। इसके कारण असम का बड़ा क्षेत्रफल हर साल बर्बादी झेलता है। जलवायु परिवर्तन, बेढब शहर नियोजन, दोषपूर्ण निकास प्रणाली सहित अनेक ऐसे कारण हैं जिनसे बाढ़ और शहरों के डूबने के ये उदाहरण देखने को मिल रहे हैं। इन कारणों से न केवल बाढ़ व बेमौसम बरसातें होती हैं बल्कि पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन, हिमस्खलन, बादलों के फटने जैसे मामले भी बढ़ रहे हैं। 

अब यह बहुत संभव नहीं रह गया है कि विकास के नाम पर हुए अनेक तरह के हो चुके परिवर्तनों को विपरीत प्रक्रिया चलाकर पूर्व की स्थिति में लाया जा सके। ऐसे में आपदा प्रबंधन को बहुत व्यापक और चुस्त-दुरुस्त बनाना चाहिये। संकट आते ही जान और सम्पत्ति की रक्षा के उपाय रखने चाहिये। बाढ़ या इसी तरह की कोई भी आपदा होने पर बचाव और मेडिकल टीमें वक्त न गंवाते हुए दुर्घटना स्थल पर पहुंचनी चाहिये। भोजन, कपड़े, पेयजल, दवाएं आदि भी वक्त पर मुहैया करनी जरूरी हो। सरकार उन सारे इलाकों के पास राहत शिविरों की तैयारी पहले से कर रखें जहां लगभग हर वर्ष बाढ़ आती है। दरअसल सूखे व अकाल को नेताओं और अधिकारियों द्वारा अपनी जेबें भरने के अवसरों के रूप में देखा जाता है। बाढ़ के बाद बंटने वाली राशि व राहत सामग्रियों की बंदरबांट जो होती है। इसलिये हमारी राजनीति की रुचि एक प्रभावी आपदा नियंत्रण प्रणाली में नहीं बल्कि राहत सामग्री और मुआवजा राशि में है।

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