Home राजनीति ममता और पवार, अगले आम चुनाव के पहले भी एक तालमेल जरूरी क्यों..?

ममता और पवार, अगले आम चुनाव के पहले भी एक तालमेल जरूरी क्यों..?

-सुनील कुमार॥

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दिल्ली प्रवास की खबर से राजनीति में गर्मी आ गई है कि क्या वे अगले चुनाव को लेकर अपने आपको एक सर्वमान्य विपक्षी नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं? और ऐसी अटकलबाजी के पीछे, अभी हाल में ही तृणमूल कांग्रेस के शहीदी दिवस की रैली में ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से गैर एनडीए विपक्षी दलों को एक होने का आह्वान किया था और कहा था कि अब कुल ढाई-तीन बरस बाकी हैं, और लोग अगर भाजपा को हटाना चाहते हैं तो उन्हें गठबंधन बनाकर साथ में काम करना चाहिए। ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी पर हमला करते हुए कहा था कि यह सरकार देश में एक निगरानी राज बनाना चाह रही है। यह बात पेगासस नाम के निगरानी सॉफ्टवेयर को लेकर उन्होंने कही, और निगरानी की ऐसी बातें भाजपा के कुछ बंगाल के नेता भी पिछले दिनों कह गए हैं, जिसमें एक नेता ने सार्वजनिक रूप से एक पुलिस अधीक्षक को धमकी दी कि वह किससे बात करते हैं उसके पूरे कॉल डिटेल्स उनके पास मौजूद हैं, और वह आईपीएस अफसर हैं, और क्या वह कश्मीर तबादला चाहते हैं? बंगाल के बहुत से नेताओं के साथ दिक्कत यह है कि वे जुबानी हमले करते हुए यह नहीं समझ पाते कि उनकी कही हुई बातें कैसे उनके ही लिए आत्मघाती साबित होंगी, क्योंकि ऐसी सार्वजनिक धमकी देकर इस नेता ने खुद ही को एक पुलिस जांच में उलझा लिया है। खैर हम यहां पर बंगाल की राजनीति पर अधिक बात करना नहीं चाहते क्योंकि हम राष्ट्रीय स्तर पर ममता की संभावनाओं पर बात करना चाहते हैं, और राष्ट्रीय स्तर पर ममता से परे की संभावनाओं पर भी।

दरअसल कुछ दिन पहले जब ममता बनर्जी के विधानसभा चुनाव तक के रणनीतिकार प्रशांत किशोर मुंबई जाकर दो बार शरद पवार से मिले, और उसके बाद दिल्ली आकर 10 जनपथ में उन्होंने जिस तरह से सोनिया, राहुल, और प्रियंका, इन सबसे मुलाकात की, उससे भी ये अटकलें आगे बढ़ीं कि क्या वे भाजपा के खिलाफ देश में कई पार्टियों के मोर्चे के लिए कोशिश कर रहे हैं? और सच तो यही है कि आज जब कभी इस देश में लोग मोदी सरकार से थककर, या नाराज होकर, उसे हटाने के बारे में बात करते हैं, तो पहला सवाल यही खड़ा होता है कि मोदी का विकल्प कौन है? भारत की राजनीति में इसे टीना फैक्टर कहते हैं, टीना का मतलब देयर इज नो अल्टरनेटिव। अब बात एक किस्म से सही भी है कि मोदी ने पिछले करीब 10 बरस में अपने आपको इस देश का ‘एक सबसे बड़ा’ नेता साबित करते हुए, अपने आपको ‘सबसे बड़ा नेता’ स्थापित कर दिया है। हम इसे इतिहास में मोदी की जगह नहीं बता रहे हैं, बल्कि आज की भारतीय चुनावी राजनीति में मोदी की स्थिति को बयान कर रहे हैं।

मोदी के बारे में उनके आलोचक भी जब मूल्यांकन करने बैठते हैं, और इतिहास में मूल्यांकन नहीं, आने वाले अगले आम चुनाव में उनकी चुनावी संभावनाओं के मूल्यांकन में, तो उन्हें भी लगता है कि मोदी जैसा कोई नहीं। उनमें से कुछ लोग लिखते भी हैं कि मोदी को खुद मोदी ही हरा सकते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि जनसंघ से लेकर भाजपा के इतिहास तक के सबसे बड़े नेता रहे अटल बिहारी वाजपेई ने मोदी की गुजरात सरकार को राजधर्म का पालन न करने वाली सरकार माना था, उसके बाद भी मोदी पार्टी के भीतर के मोर्चे पर जीते, और उसके बाद गुजरात में उन्होंने दो-दो चुनाव जीते। इसलिए मोदी को लेकर जल्दी में कोई मूल्यांकन करना गलत होगा क्योंकि हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा नेता नहीं हुआ है जिसने चुनाव जीतने की मशीन चलाने में ऐसी महारत हासिल की हो। बल्कि यह मशीन भी मोदी की ही बनाई हुई है, जो जानते हैं कि किस तरह भारत में मतदान के दिन भारत के चुनाव आयोग की नजरों और उसके काबू से परे जाकर नेपाल और बांग्लादेश में दिन भर मंदिरों का दौरा करके भी टीवी स्क्रीन के मार्फत हिंदुस्तान में चुनाव प्रचार किया जा सकता है। इसलिए यह बात अपने आपमें सही है कि चुनाव प्रचार के मामले में मोदी जैसा अब तक न कोई था, और न आज कोई है।

जब मोदी के विकल्प के बारे में सोचा जाए तो जो चेहरे सामने दिखते हैं वहीं से बात हो सकती है, ममता बनर्जी ने जिस अंदाज में बंगाल का चुनाव लड़ा और मोदी और शाह की टीम को बुरी शिकस्त दी, उनके सारे दावों को गलत साबित किया, उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया, तो बंगाल के चुनावी नतीजे आने के साथ-साथ ममता की राष्ट्रीय संभावनाओं के बारे में भी चर्चा शुरू होनी थी। वह चर्चा श्रद्धांजलि और अभिनंदन के मंचों से की जाने वाले विशेषण से भरी चर्चा की हद तक तो शुरू हुई, लेकिन फिर लोगों को शायद उसमें कोई दम नहीं दिखा। ममता बनर्जी जिस तरह बंगाल की राजनीति में कांग्रेस और वामपंथियों दोनों को बुलडोजर से कुचल चुकी हैं, उसके बाद सवाल यह भी उठता है कि ये दोनों पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर ममता बनर्जी को कितना बड़ा नेता बनाना चाहेंगी? और फिर वामपंथी तो ऐसे हैं जिनके पास केरल, बंगाल और त्रिपुरा जैसे गिने-चुने तीन राज्य ही थे, और अगर वामपंथियों की कोई संभावना केरल के बाद बचेगी तो हो सकता है कि उसमें बंगाल को वे गिनकर चल रहे हों, इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विरोध करने के लिए भी वामपंथी ममता बनर्जी के साथ किसी एक गठबंधन में आएंगे ऐसा मुमकिन नहीं दिखता है।

दूसरी तरफ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार जाहिर तौर पर देश के सबसे बुजुर्ग, और शायद सबसे वरिष्ठ भी, गैर भाजपाई, गैर एनडीए नेता हैं, और उनके बारे में भी ऐसी चर्चा चलती है कि वे मोदी के मुकाबले एक गठबंधन के मुखिया हो सकते हैं। लेकिन मतदाताओं के दिल को रिझाने वाली बातों को देखें तो शरद पवार के साथ भी दिक्कत यह है कि महाराष्ट्र और दिल्ली से परे आम जनता में उनका असर सीमित है। वे ममता के मुकाबले कुछ बेहतर हिंदी भाषी जरूर हैं, लेकिन हिंदी भाषण देना उनकी खूबी में कहीं नहीं है। यही दिक्कत ममता बनर्जी के साथ भी है। इसलिए मोदी के तेजाबी और जलते-सुलगते चुनावी भाषणों के मुकाबले ये दोनों नेता किसी किनारे भी नहीं टिक पाएंगे, इस बात को भूलना नहीं चाहिए।

अब बहुत से लोगों को यह लगता है कि भाजपा के अलावा कांग्रेसी एक ऐसी पार्टी है जो आज की अपनी दुर्गति में भी देश में सबसे अधिक फैली हुई पार्टी है, जिसका हर प्रदेश में अस्तित्व अभी भी बाकी है। हो सकता है कि बंगाल की तरह और राज्य भी हों जहां पर कांग्रेस का कोई भी विधायक न बचा हो, लेकिन उससे पार्टी संगठन खत्म नहीं हो पाया है और कांग्रेस एक पार्टी के रूप में अभी भी बची हुई है। कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में आज जो अनिश्चितता बनी हुई है, वह कांग्रेस की संभावनाओं पर भारी पड़ रही है। राहुल गांधी में जो लोग मोदी के मुकाबले एक चेहरा देखते हैं, उनको यह समझने में दिक्कत होती है कि अभी तो राहुल गांधी के अगला कांग्रेस अध्यक्ष बनने का भी ठिकाना नहीं है, और हो सकता है कि कांग्रेस के जो दो दर्जन बड़े नेता बागी तेवरों के साथ संगठन चुनाव की मांग कर रहे थे, उनमें से बहुत से लोग राहुल गांधी की फिर से अगुवाई के हिमायती ना हों। ऐसी हालत में राष्ट्रीय स्तर पर यूपीए जैसे किसी गठबंधन का नेता बनने के पहले कांग्रेस के भीतर कांग्रेस का नेता तय होने की जरूरत रहेगी। इसलिए राहुल गांधी के बारे में मोदी के मुकाबले किसी संभावना को देखना उसी वक्त हो पाएगा जिस वक्त कांग्रेस के भीतर उनकी संभावनाएं औपचारिक रूप से तय और घोषित हो जाएं।

देश की जिन पार्टियों को मोदी के विकल्प के रूप में एक गठबंधन या एक नेता को तय करने के लिए अभी सही समय लग रहा है, उनकी सोच गलत नहीं है। लेकिन हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा पहले भी हो चुका है जब पहले एक गठबंधन बना हो उसने चुनाव जीता हो, चुनाव मुद्दों पर लड़ा और जीता गया हो, चुनाव तानाशाही के खिलाफ लड़ा गया हो और जीता गया हो, चुनाव सेंसरशिप या मनमानी या जुल्म के खिलाफ लडक़र जीता गया हो, और प्रधानमंत्री उसके बाद तय किया गया हो। हिंदुस्तान की राजनीति में चार से ज्यादा प्रधानमंत्री ऐसे हुए हैं जिनके प्रधानमंत्री बनने के ठीक पहले तक कोई उनके बारे में अंदाज नहीं लगा सकते थे कि वे प्रधानमंत्री बनेंगे। चंद्रशेखर, इंद्र कुमार गुजराल, देवेगौड़ा, नरसिंह राव, और मनमोहन सिंह। अपने वक्त में इन सभी की संभावनाएं कभी ऐसी मजबूत नहीं थीं कि इनकी अगुवाई में कोई चुनाव लडक़र, इनके चेहरे को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करके, कोई चुनाव जीता जा सकता था। लेकिन वक्त ऐसा आया कि इनमें से हर कोई प्रधानमंत्री बने, और मनमोहन सिंह तो दो-दो बार प्रधानमंत्री बने।

इसलिए हम आज राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के मुकाबले किसी चेहरे के तय होने को लेकर बहुत निराश नहीं हैं, और न ही हमें ममता बनर्जी की कोशिश या उनकी तरफ से प्रशांत किशोर की कोशिश अपरिपच् लग रही है कि अभी उसका समय नहीं आया है। ना सिर्फ अगला चुनाव लडऩे के लिए या कि प्रधानमंत्री बनने के लिए ऐसा गठबंधन होना चाहिए, बल्कि आज देश के सामने जो बहुत से खतरे खड़े हुए हैं, उनसे जूझने के लिए भी ऐसे गठबंधन की जरूरत है, और हो सकता है कि ऐसा कोई औपचारिक गठबंधन न भी बने लेकिन गैरभाजपा गैरएनडीए पार्टियों के बीच एक व्यापक तालमेल बनकर बात आगे बढ़ सके। ऐसे किसी तालमेल की जरूरत आने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी गैरभाजपाई दलों को पड़ सकती है जहाँ अभी तक के माहौल में ऐसे किसी तालमेल की कोई संभावना नहीं दिख रही है। इसलिए ममता बनर्जी या शरद पवार की पहल हो सकता है भारतीय लोकतंत्र में एक मजबूत मोर्चे के रूप में मुद्दों को लेकर अगले ढाई बरस लडऩे के काम आए, और उसके बाद के चुनाव में काम आए या ना आए यह एक अलग बात रहेगी।

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