गिरेबान में झांकने से डरता है मीडिया? एडीटर्स गिल्ड और BEA को काटजू के बयान पर ऐतराज़

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मीडिया को प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू रातोंरात हीरो से विलेन बन गए दिख रहे हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने जब नियमों का उल्लंघन करने वाले चैनलों पर लगाम कसने के लिए कानून बनाने की कोशिश की तब काटजू इसे रोकने की सिफारिश कर नायक बन गए थे, लेकिन जब उन्होंने इसकी कमियों पर ध्यान दिलाया तो उन्हें खलनायक मान लिया गया। न्यूज़ चैनलों के संपादकों की संस्था ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन यानी बीईए और संपादकों के संघ एडीटर्स गिल्ड ने मीडिया और मीडिया कर्मियों पर ‘सतही टिप्पणी’ करने के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष की निंदा की है।

बीईए ने काटजू के ‘गैर ज़िम्मेदाराना’ और ‘नकारात्मक’ बयानों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के तौर पर काम कर चुके शख्स के इस तरह के बयान से उसे निराशा हुई है। एसोसिएशन के मुताबिक लोकतंत्र में किसी शख्स या प्रतिनिधि की ओर से किसी संस्था की आलोचना को स्वीकार किया जाता है और इससे खुद को सुधारने में मदद मिलती है और बीईए भी इसमें यकीन करता है.

इससे पहले द एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी काटजू द्वारा पत्रकारों पर की गई नकारात्मक टिप्पणियों को खारिज कर दिया था। ग़ौरतलब है कि काटजू ने एक टेलीविजन प्रोग्राम में ये आरोप लगाए थे कि मीडिया धार्मिक आधार पर लोगों में विभाजन करता है और वह लोगों के हित का ख्याल नहीं रखता है।

एडिटर्स गिल्ड ने कहा है कि वह मीडिया के साथ संवाद स्थापित करने की स्थितियों को लगातार कमतर कर रहे हैं। गिल्ड के अध्यक्ष टी एन नैनन ने कहा, ”हम उन्हें याद दिलाना चाहते हैं कि भारतीय मीडिया ने देश को मजबूत करने में महत्वपूर्ण निभाई है।” उन्होंने जस्टिस काटजू की उस टिप्पणी को भी पूरी तरह खारिज किया कि मीडिया देश को सांप्रदायिक आधार पर बांटने का काम करता है। नैनन ने प्रेस परिषद को और अधिकार दिए जाने की मांग को भी सरासर गलत बताया।

सवाल यह उठता है कि मीडिया कितना निरंकुश, कितना स्वतंत्र और कितना आक्रामक बनना चाहता है? सवाल यह भी है कि क्या जस्टिस काटजू ने मीडिया पर जो आरोप लगाए हैं वे पूरी तरह निराधार हैं? क्या मीडिया हमेशा पूरी जिम्मेदारी के साथ किसी व्यक्ति या संप्रदाय के बारे में टिप्पणी करता है और कभी किसी को हिंदू, मुस्लिम या किसी खास संप्रदाय का कह कर नहीं पुकारता? क्या समाचार के नाम पर हमेशा वही परोसा जाता है जो वास्तव में जानकारी या सूचना होती है या फिर स्वर्ग का रास्ता और नाग-नागिन का इंसानी जीवन पर प्रभाव भी इसी श्रेणी में आता है? क्या मीडिया हमेशा जन सरोकार के मुद्दों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करता है या फिर उसकी रुचि राखी सावंत के आरोपों और सिनेमा की अश्लीलता पर ज्यादा रहती है?

जस्टिस काटजू तो एक प्रतीक भर हैं और उन्होंने अपने पूरे करीयर में ऐसे सैकड़ों मसलों को देखा होगा जिनमें मीडिया ने अदालत के फैसले से पहले ही सच को झूठ और झूठ को सच साबित कर डाला। उन्होंने बस वही कहा है जो आज देश के करोड़ों टीवी दर्शकों और अखबारों व पत्र-पत्रिकाओं के पाठकों के दिलों में बरसों से चल रहा है। ऐसे में क्या भारतीय मीडिया को बिना किसी हील-हुज्जत के अपने आत्ममंथन की जरूरत नहीं है?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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