सवाल प्रशांत किशोर की कामयाबी का नहीं बल्कि लोकतंत्र की नाकामयाबी का है..

सवाल प्रशांत किशोर की कामयाबी का नहीं बल्कि लोकतंत्र की नाकामयाबी का है..

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-सुनील कुमार।।

कई राज्यों में कांग्रेस के भीतर असंतोष की खबरों से अधिक अहमियत कांग्रेस की एक दूसरी खबर को मिल रही है कि किस तरह प्रशांत किशोर ने दिल्ली में सोनिया, राहुल, और प्रियंका, तीनों से मुलाकात की है. जिन लोगों से मिलने के लिए उनकी खुद की पार्टी के मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को हफ्तों और महीनों लग जाते हैं, उन लोगों से प्रशांत किशोर जैसा एक बाहरी व्यक्ति आकर एक दिन में तीनों से मुलाकात कर लेता है, तो इसका खबर बनना जायज भी है। फिर यह खबर बनना जायज इस नाते भी है कि अभी-अभी प्रशांत किशोर ने अपनी पूरी साख दांव पर लगाकर ममता बनर्जी के चुनाव अभियान की जैसी तैयारी करवाई थी, और जिस अंदाज में ममता बनर्जी ने देश के दो सबसे बड़े और सबसे ताकतवर नेताओं, नरेंद्र मोदी और अमित शाह को शिकस्त दी, उस ऐतिहासिक लड़ाई के परदे के पीछे सेनापति प्रशांत किशोर ही थे। इसलिए अब जब कांग्रेस पार्टी अगले बरस उत्तर प्रदेश में और पंजाब में होने वाले चुनावों को लेकर एक बहुत नाजुक मोड़ पर पहुंच रही है, तो प्रशांत किशोर का इन लोगों से मिलना कई हिसाब से बहुत अहमियत का है। लेकिन इसके पहले कि दिल्ली की अटकलें यह सुझाएँ कि प्रशांत किशोर कांग्रेस के रणनीतिकार बनने जा रहे हैं, यह भी याद रखने की जरूरत है कि अभी-अभी, कुछ दिन पहले ही उन्होंने मुंबई में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार से भी मुलाकात की है, और कल शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने यह सार्वजनिक बयान दिया है कि मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में शरद पवार सबसे काबिल हैं। ममता बनर्जी ने जिस अंदाज में बंगाल में मोदी और शाह को निजी शिकस्त दी है उससे कई लोगों के मन में यह बात भी उठ रही है कि क्या ममता बनर्जी मोदी के मुकाबले किसी एक मोर्चे की बड़ी नेता या सर्वमान्य नेता हो सकती हैं? इसलिए प्रशांत किशोर की कांग्रेस के राज परिवार से यह मुलाकात सिर्फ कांग्रेस के रणनीतिकार बनने की संभावनाओं से जुड़ी हों, ऐसा जरूरी भी नहीं है, यह भी हो सकता है कि वे ममता के साथ रहने के बाद, ममता से बिना किसी कटुता के, अलग हुए बिना, शरद पवार से मिलने के बाद, अब कांग्रेस से मिल रहे हैं, और क्या वे मोदी के मुकाबले किसी एक गठबंधन की संभावनाओं को टटोल रहे हैं?

यहां पर प्रशांत किशोर के बारे में थोड़ी सी बात कर लेना ठीक होगा प्रशांत किशोर संयुक्त राष्ट्र संघ में काम करके लौटे हुए एक राजनीतिक और चुनावी रणनीतिकार हैं। उन्होंने मोदी के मुख्यमंत्री के दो कार्यकाल के बाद, तीसरे कार्यकाल के लिए उन्हें जिताने के लिए काम किया था, और उसके बाद उससे भी अधिक महत्वपूर्ण काम था 2014 के आम चुनाव में मोदी को प्रधानमंत्री तक पहुंचाने की रणनीति में हिस्सेदारी का। प्रशांत किशोर चुनावी रणनीति बनाने वाले एक कामयाब व्यक्ति माने जाते हैं जिन्होंने अब तक भाजपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, द्रमुक, और तृणमूल कांग्रेस, ऐसी तमाम पार्टियों के लिए काम किया है, और यह जाहिर है कि वह अपनी किसी राजनीतिक सोच के बिना एक पेशेवर की तरह पार्टी चलाने और चुनाव जीतने के लिए सलाहकार की तरह, रणनीतिकार की तरह, काम करते हैं। आज प्रशांत किशोर पर यहां लिखने का मकसद कांग्रेस पार्टी में उनके जुडऩे या कांग्रेस की संभावनाएं बढ़ाने तक सीमित नहीं है। हम यह भी लिख कर बात खत्म करना नहीं चाहते कि प्रशांत किशोर मोदी के मुकाबले एक विपक्षी गठबंधन खड़ा करने में मददगार हो सकते हैं, हो सकता है कि वह इसमें काबिल हों, और हो सकता है कि सच ही उनका ऐसा एजेंडा हो, लेकिन हम फिर भी यह कहना चाहेंगे कि जो सक्रिय राजनीति में हिस्सेदार नहीं है, और जो थोड़े से वक्त तक नीतीश कुमार की पार्टी का सदस्य जरूर रहा हो, लेकिन जिसकी अपनी कोई राजनीतिक सोच और फिलासफी नहीं दिखती है, क्या उसके हाथों में भारतीय लोकतंत्र की इतनी सारी चुनौतियां रहना जायज है?

हमारी फिक्र भारतीय लोकतंत्र को लेकर अलग है और वही सबसे ऊपर है, न तो कांग्रेस की हमें ज्यादा फिक्र है और न ही मोदी की। ममता का चुनाव निपट गया है और यूपी का चुनाव भी किसी की तैयारी से, और किसी की बिना तैयारी के भी, निपट ही जाएगा। उत्तर प्रदेश ने जितना कट्टरपंथी और जितना सांप्रदायिक राज अभी देख लिया है, अब इसके बाद और कुछ बहुत ज्यादा देखने को बचता नहीं है। लेकिन देखने को जो बचता है वह यह है कि एक गैरराजनीतिक चुनावी रणनीतिकार अगर एक पेशेवर की तरह भारतीय लोकतंत्र को इस तरह मोड़ सकता है, इस तरह उसे किसी तरफ झुका सकता है, तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या यह लोकतंत्र सचमुच ही इतनी इज्जत का सामान रह गया है? क्या हिंदुस्तानी चुनाव और आम चुनाव क्या सचमुच ही इतने महत्वपूर्ण और जनता की सोच के इतने बड़े प्रतिनिधि रह गए हैं कि उन्हें लोकतंत्र का एक फैसला मान लिया जाए? क्या यह अपने आप में भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति की एक घोर नाकामयाबी नहीं है कि बाहर से आए हुए पेशेवर लोग इस तरह, इस हद तक भारतीय लोकतंत्र को प्रभावित कर सकते हैं, और अपनी पसंद की, अपनी छांटी हुई पार्टी को जिता सकते हैं? यह सिलसिला कुछ अजीब है लेकिन लोगों को यह सोचना है कि जिस राजनीति में हिंदुस्तान के नेताओं ने पौन-पौन सदी गुजार दी है, लेकिन वे अपने पूरे राजनीतिक जीवन के किसी भी मोड़ पर क्या सचमुच ही इतने प्रभावशाली रहे हैं जितना कि आज एक अकेले प्रशांत किशोर को मान लिया जा रहा है? और क्या देश की जनता के लिए देश के बड़े-बड़े नेताओं के मुकाबले प्रशांत किशोर की राय इतनी अधिक मायने रखती है कि उनके सुझाए नेता को या उनकी सुझाई पार्टी को लोग सत्ता पर बिठा दें?

यहां पर बात प्रशांत किशोर की खूबी की नहीं है, यहां पर बात भारतीय लोकतंत्र की खामी की है, क्या भारतीय लोकतंत्र अपने-आप में इतना कमजोर हो गया है कि वह बाहर से आए हुए किसी व्यक्ति की आंधी के झोंके में उसकी बताई दिशा में झुक जाता है? राजनीतिक दलों को यह सोचना चाहिए कि क्या वे सत्ता की लड़ाई लड़ते हुए जनता और जमीन से इस हद तक कट गए हैं कि राजनीति से परे रहने वाला एक व्यक्ति जनता के रुख को अधिक समझ रहा है, वह जनता के दिल को जीतने की अधिकतर की पहचान रहा है? अगर किसी पेशेवर की ऐसी खूबी से भारतीय लोकतंत्र की दशा और दिशा तय हो सकती है, तो भारतीय लोकतंत्र को अपने बारे में सोचना चाहिए। किशोर सौ बरस से चली आ रही पार्टियों और तीन-तीन पीढिय़ों से काम कर रहे नेता, और तमाम धार्मिक समर्थन पाकर मजबूत बनने वाले राजनीतिक दल, क्या इन सबसे ऊपर एक अकेला कोई व्यक्ति हो सकता है? तो अगर ऐसा एक व्यक्ति इतना ताकतवर हो सकता है, तो क्या उसकी मनमानी इस देश पर कोई गलत नेता भी थोप सकती है? क्या वह इस देश पर कोई सांप्रदायिक, भ्रष्ट, तानाशाह नेता भी थोप सकता है? हमारे पास प्रशांत किशोर के खिलाफ कुछ नहीं है, और ना ही उनके खिलाफ लिखने की नीयत है, लेकिन हमारे पास भारतीय लोकतंत्र के बाकी हिस्से से सवाल जरूर है कि प्रशांत किशोर नाम की एक शख्सियत को देखकर उन्हें अपने दल को, अपने आपको, और अपने पूरे राजनीतिक जीवन को तौलना जरूर चाहिए।

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