जो मुस्लिमों को आबादी की आज़ादी देना चाहते हैं, वे क्या उनके हिमायती हैं?

जो मुस्लिमों को आबादी की आज़ादी देना चाहते हैं, वे क्या उनके हिमायती हैं?

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-सुनील कुमार॥

जनसंख्या नियंत्रण हिंदुस्तान में हमेशा से एक बड़ा नाजुक मुद्दा रहा है और खासकर इमरजेंसी के दौरान देश की आबादी को काबू में लाने के लिए संजय गांधी की अगुवाई में इंदिरा सरकार ने जिस तरह की ज्यादतियां की थीं, उनसे हमेशा के लिए यह एक जुल्म की तरह देखा जाने लगा है। आज हालत यह है कि जनसंख्या नियंत्रण व परिवार नियोजन शब्द का इस्तेमाल भी समझदार सरकारें नहीं करती हैं। लेकिन अभी जनसंख्या नियंत्रण इसलिए चर्चा में है कि भाजपा की सरकारों वाले दो प्रदेशों में जनसंख्या पर काबू पाने के लिए कुछ नियम लागू करने की तैयारी चल रही है, इनमें से एक असम है जहां पर अभी-अभी भाजपा सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में लौटी है और जिसके ऊपर चुनाव का कोई दबाव नहीं है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश है जहां पर भाजपा सरकार अगले बरस चुनाव का सामना करने जा रही है और उसे एक खास राजनीतिक मकसद से अपना यह रुख दिखाना है कि वह बढ़ती हुई आबादी के खिलाफ है, और जनसंख्या को घटाने के लिए जो नियम वहां पर बनाए जा रहे हैं उन नियमों को लेकर हिंदू मतदाताओं के बीच एक धार्मिक ध्रुवीकरण की नीयत भी सरकार की दिख रही है।

इस मामले को लेकर भाजपा सरकारों के ऊपर यह साफ तोहमत लग रही है कि उसके निशाने पर मुस्लिम समुदाय है जिसमें बच्चों का अनुपात राष्ट्रीय अनुपात के मुकाबले कुछ अधिक रहता है. और फिर एक बात जो मुस्लिमों के खिलाफ राजनीतिक रूप से उठती है वह यह भी रहती है कि इस समाज में एक से अधिक शादियां कानूनी हैं और हर शादी में कई बच्चे पैदा हो सकते हैं. एक लुभावना सांप्रदायिक नारा मुस्लिमों के खिलाफ यह भी चलता है कि चार बीवी और 16 बच्चे इस रफ्तार से एक दिन हिंदुस्तान में मुस्लिम ही बहुसंख्यक रह जाएंगे। जबकि आंकड़ों की हकीकत इसके खिलाफ है और मुस्लिमों के भीतर भी बड़ी रफ्तार से आबादी के बढ़ने में गिरावट आ रही है, और ऐसे आसार दिख रहे हैं कि मुस्लिम समाज में आबादी बढ़ना धीरे-धीरे राष्ट्रीय अनुपात के बराबर पहुंच जाएगा। फिर भी जब धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करना हो तो चार बीवियां और 16 बच्चे की एक संभावना या आशंका जताना एक लुभावना नारा बनता ही है।

उत्तर प्रदेश में एक शादीशुदा जोड़े के 2 बच्चों की नीति लागू करने पर बहस चल रही है और असम लागू कर चुका है। इसमें यह कहा गया है कि 2 बच्चों से अधिक बच्चे पैदा करने वाले जुड़े स्थानीय चुनावों के चुनावों में हिस्सा नहीं ले सकेंगे, यानी वे पंचायत और म्युनिसिपल के चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य भी है, और इस राज्य में जनसंख्या बढ़ने की दर भी देश में सबसे अधिक 2 राज्यों में से एक है, पहले नंबर पर बिहार है जहां 3.3 फ़ीसदी की जनसंख्या बढ़ोतरी है और उत्तर प्रदेश में 2.9 की जनसंख्या बढ़ोतरी है। आज देश में राष्ट्रीय जनसंख्या बढ़ोतरी 2.2 है जो कि 1950 में 5.9 थी। कुछ और आंकड़ों को देखें तो वे आंकड़े यह बताते हैं कि 1970 से 1980 के बीच के दशक में हिंदुस्तान में जनसंख्या बढ़ोतरी 2.2 से बढ़कर 2.3 से भी अधिक हो चुकी थी और दशक के आखिर तक वहीं पर बनी रही थी। यही वह दौर था जब संजय गांधी ने अपने सारे आक्रामक तानाशाह तेवरों के साथ परिवार नियोजन कार्यक्रम लागू किया था और सड़कों पर पकड़-पकड़कर गैरशादीशुदा लोगों की भी नसें काट दी जा रही थीं। ऐसा माना जाता है कि इमरजेंसी के बाद कांग्रेस सरकार के खत्म होने और दफन होने के पीछे नसबंदी एक सबसे बड़ी वजह थी।

अब यह समझने की जरूरत है की उत्तर प्रदेश जिस अंदाज में यह जनसंख्या नियंत्रण विधेयक ला रहा है उसके तहत दो बच्चों तक सीमित रहने वाले सरकारी कर्मचारियों को 2 अतिरिक्त वेतन वृद्धि या मिलेंगी छुट्टियां अधिक मिलेंगी और पेंशन में बढ़ोतरी होगी। दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले लोग सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रह जाएंगे और किसी परिवार को रियायती राशन सिर्फ सिर्फ चार लोगों के लायक मिलेगा। दो बच्चों से अधिक के मां-बाप म्युनिसिपल और पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाएंगे और ना ही सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकेंगे, ना ही उन्हें सरकारी सब्सिडी का फायदा मिल सकेगा। उत्तर प्रदेश सरकार इस नई व्यवस्था में यह भी कह रही है कि अगर कोई आम परिवार एक बच्चे की नीति अपनाकर नसबंदी करा लेंगे तो उन्हें एक बेटा होने के बाद एकमुश्त 80 हजार रुपये, और एक बेटी के बाद नसबंदी होने पर सीधे एक लाख रुपये की आर्थिक मदद होगी। असम का मामला भी कुछ इसी तरह का है वहां जनसंख्या बढ़ोतरी बहुत तेजी से तो नहीं हो रही है लेकिन राज्य के भाजपा मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व शर्मा का कहना है कि राज्य के कुछ हिस्सों में जनसंख्या विस्फोट है और यह राज्य के विकास में बाधा हो सकता है।

अब अगर हम भाजपा की साख को 2 मिनट के लिए अलग रखें कि उसके बहुत सारे कार्यक्रम मुसलमानों को निशाने पर रखकर बनाए जाते हैं या हिंदुओं को फायदा देने के लिए बनाए जाते हैं, तो हमें इस बात को देखना होगा कि बढ़ती हुई आबादी से किसका फायदा हो रहा है? क्या उत्तर प्रदेश और असम के, या देश में सबसे अधिक तेज रफ्तार से आबादी बढ़ाने वाले बिहार के मुस्लिम समुदाय में अधिक बच्चे होने से कोई फायदा हो रहा है? मुस्लिमों के बीच पढ़ाई-लिखाई कम है, उनके अधिकतर लोग मिस्त्री-मैकेनिक जैसे छोटे काम में ही सीमित रह जाते हैं, ड्राइवर-कंडक्टर जैसे कम हुनर वाले काम तक उनकी संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। मुस्लिम आबादी का कम अनुपात ही उच्च शिक्षा पाकर बेहतर रोजगार तक पहुंच पाता है। और यह बात महज मुस्लिमों तक सीमित नहीं है दूसरे लोगों पर भी लागू है कि अधिक बच्चे होने से उन्हें आज बेहतर शिक्षा देना नामुमकिन सा हो गया है. किसी भी पार्टी के राज वाले प्रदेश में सरकारी स्कूलों में पाई गई शिक्षा बच्चों को उच्च शिक्षा के बड़े मुकाबलों के लायक तैयार नहीं कर पाती हैं और महंगी निजी स्कूलों के बाद महंगे कोचिंग इंस्टीट्यूट से होकर ही बच्चे इन बड़े मुकाबलों के लायक अपने आपको पाते हैं। इस बात के खिलाफ कई किस्म के अपवाद गिनाए जा सकते हैं लेकिन हम अभी व्यापक आंकड़ों से निकाले गए निष्कर्ष के आधार पर यह कह सकते हैं कि किसी भी जात और धर्म के परिवारों में जितने अधिक बच्चे होते हैं उनके अच्छे पढ़ने की संभावना उतनी ही कम हो जाती है, उनके अच्छे खाने पीने की संभावना भी उतनी ही कम हो जाती है, उनके अच्छे रहन-सहन की संभावना भी उतनी ही कम हो जाती है। इसलिए परिवार में बच्चों की गिनती कम होना हर जाति और धर्म के लिए एक बेहतर नौबत है।

सवाल यह है कि अगर मुस्लिम समाज में अधिक बच्चों की अभी तक चली आ रही प्रथा पर असम या उत्तर प्रदेश के इन नए नियमों से कोई नया वार होने जा रहा है? यह समझने की जरूरत है कि यह वार है, या इन समुदायों के लिए फायदे की बात है? हम इन समुदायों को, खासकर मुस्लिम समुदाय को जब देखते हैं, तो यह साफ दिखाई पड़ता है कि एक मुस्लिम महिला की अपनी इच्छा की बहुत अधिक जगह मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था के भीतर नहीं है, और एक मुस्लिम महिला से कितने बच्चे पैदा हों, इन्हें आमतौर पर उसके शौहर को ही तय करने दिया जाता है। ऐसे में यह नई व्यवस्था अगर मुस्लिम समाज के कुछ लोगों को कम बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित या मजबूर करती है, तो इससे कम से कम उतने परिवारों में मुस्लिम महिला की स्थिति भी बेहतर होगी, जो आज ना केवल अधिक बच्चे पैदा करने के लिए मजबूर है बल्कि अधिक बच्चों की देखभाल करने के लिए, उन्हें बड़े करने के लिए, और फिर उन बच्चों की बाकी जिंदगी फिक्र करने के लिए भी मजबूर हैं। आज चाहे मुस्लिम समाज में अधिक बच्चों को पैदा करने की आजादी इस नए कानून के तहत कुछ सीमित होने जा रही है, तो भी यह सोचने की जरूरत है कि यह सीमा किसके लिए नुकसानदेह है और किसके लिए फायदेमंद है?

अगर एक मुस्लिम का परिवार छोटा होगा तो उससे उसी का फायदा है, उसके बचे हुए पैसों से हिंदू समाज का कोई फायदा होने नहीं जा रहा है। अगर मुस्लिम समाज के किसी व्यक्ति को अधिक बच्चे पैदा करने में दिलचस्पी है, तो उसे पंच-सरपंच का चुनाव लड़ने नहीं मिलेगा, उसे वार्ड या महापौर का चुनाव लड़ने नहीं मिलेगा, उसे सरकारी नौकरी के लिए अर्जी देने नहीं मिलेगा, लेकिन उसके बच्चे पैदा करने पर कोई रोक नहीं है। उसे सीमित बच्चों के लिए लिए रियायती राशन मिलेगा लेकिन यह संख्या हिंदू परिवार के लिए भी लागू होगी जहां पर दो से अधिक बच्चे होने पर कोई हिंदू भी चुनाव नहीं लड़ सकेगा या किसी हिंदू परिवार को भी रियायत राशन 2 बच्चों से अधिक के लिए नहीं मिल सकेगा। आज ऐसे हिंदू परिवार भी कम नहीं हैं, जहां पर बेटे की चाह में चार-चार, पांच-पांच बेटियां हो जाती हैं और उसके बाद बुढ़ापे में जाकर एक बेटा नसीब हो पाता है। ऐसे हिंदू परिवार भी चुनाव लड़ने या रियायती राशन पाने के हक से वंचित रह जाएंगे। इसलिए उत्तर प्रदेश और असम के यह कानून जिन लोगों को मुस्लिम समाज को चोट पहुंचाने वाले लग रहे हैं उन्हें लगते रहे, हम तो इन्हें मुस्लिम समाज के फायदे के कानून मान रहे हैं कि परिवार का आकार सीमित रखकर वे अपने कम बच्चों को बेहतर शिक्षा दे सकते हैं, बेहतर खानपान दे सकते हैं, उनका इलाज करा सकते हैं और एक मुस्लिम महिला की हालत भी उससे बेहतर ही हो सकती है।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य ने भी पिछली भाजपा सरकार के दौरान यह व्यवस्था देखी हुई है कि जब पंच-सरपंचों के लिए 2 बच्चों की अनिवार्यता लागू की गई थी, और बहुत से ऐसे मामले हुए थे जिनमें तीसरा बच्चा पैदा होने के बाद पंच सरपंच की पात्रता खत्म कर दी जाती थी, उन्हें बर्खास्त कर दिया जाता था. बाद में भाजपा सरकार के चलते हुए ही विरोध की वजह से इस व्यवस्था को बदला गया था। हमने उस वक्त भी लगातार इस बात को लिखा था कि यह व्यवस्था कई मायनों में नाजायज है। इसलिए नाजायज थी कि इसे लागू करने वाले विधायकों ने इसे अपने ऊपर लागू नहीं किया था। इसे सिर्फ गांव के पंच-सरपंच पर लागू किया गया था मानो गांव में पढ़ने वाली आबादी सांसदों और विधायकों के रास्ते बढ़ने वाली आबादी से अधिक खतरनाक होती है।

खैर यह व्यवस्था खत्म हुई और आज उत्तर प्रदेश और असम में इसे लागू करने पर चर्चा हो रही है तो हम इस बात को साफ लिखना चाहते हैं कि यह व्यवस्था आज के बाद पैदा होने वाले बच्चों के परिवारों पर ही लागू होनी चाहिए, और अगर पहले से किन्हीं लोगों के दो से अधिक बच्चे हैं, तो उन पर यह व्यवस्था लागू नहीं होनी चाहिए। दूसरी बात यह व्यवस्था स्थानीय संस्थाओं के बजाय देश के हर किस्म के चुनाव पर लागू होनी चाहिए और 9 बच्चों के मां-बाप सांसद या विधायक क्यों बन सकें अगर उन्हें पंच सरपंच बनने के लिए अपात्र माना जा रहा है, या जैसा कि उत्तर प्रदेश में शहरी निकायों में भी चुनाव के लायक नहीं माना जा जा रहा है। हमारा मानना है कि ऐसी असमान व्यवस्था असंवैधानिक होगी और इसे संसद और विधानसभा तक लागू करना ही होगा। सांसद और विधायक को अधिक बच्चे पैदा करने का सुख या मनमर्जी देने का कोई लोकतांत्रिक कारण नहीं हो सकता, और यह व्यवस्था सभी के लिए खत्म होनी चाहिए।

हम खुद मुस्लिम समाज के हित के लिए यह बात चाहते हैं कि अगर वे अधिक बच्चे पैदा कर रहे हैं तो उन्हें अपने परिवार के आकार को सीमित रखने के लिए यह एक अच्छी वजह मिल रही है कि वह सरकारी नौकरी के हकदार बनने के लिए या किसी चुनाव को लड़ने के लिए अपने परिवार के आकार को सीमित रखें। जिन लोगों को किसी सरकारी रियायत की फिक्र नहीं है और जिन्हें अपने कितने भी बच्चों को पढ़ाने और उनका इलाज कराने की ताकत हासिल है, वह लोग जरूर जैसा चाहे वैसा कर सकते हैं, और उसके बाद उन्हें कोई शिकायत भी नहीं होनी चाहिए। चुनाव की पात्रता पंचायत से लेकर संसद तक तक तक सब जगह लागू हो, और जनकल्याण की कुछ गरीब केंद्रित योजनाओं के लिए बच्चों की संख्या को कोई सीमा न बनाया जाए। बाकी इस कानून में हमको कोई बुराई नहीं दिख रही है और यह कानून लागू किया जाना चाहिए। जिन लोगों को यह लगता है कि यह कानून मुस्लिम समाज पर एक हमला है और वह मुस्लिमों के हितैषी होने के नाते उनके हक के लिए इस कानून का विरोध करना चाहते हैं तो ऐसे लोगों के लिए हमारा यह मानना है कि यह लोग मुस्लिम समाज के विरोधी हैं और यह मुस्लिम समाज के नुकसान का ही काम कर रहे हैं अगर यह उसके लोगों को बच्चों की संख्या सीमित रखना नहीं समझा पा रहे हैं।

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