यातना भुगत चुके, यातना पर लिखने के हकदार.?

यातना भुगत चुके, यातना पर लिखने के हकदार.?

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-सुनील कुमार॥

हिंदी की एक जानी-मानी लेखिका मैत्रेयी पुष्पा हाल के महीनों में अपने कई सोशल मीडिया बयानों को लेकर बहस का सामान बनी हैं। बहुत से लोगों का यह मानना है कि उन पर उम्र का असर हो रहा है और वह बहुत ही रद्दी किस्म की बातें लिख रही हैं। हम पुरानी बातों को तो नहीं देख पाए लेकिन अभी उन्होंने एक ताजा फेसबुक पोस्ट में कह दिया है कि जो खुद तलाकशुदा हैं या पति से अलग हैं वे किसी दूसरे के तलाक के उचित अनुचित (होने) पर बहस कर रही हैं, और इसके साथ उन्होंने हैरानी जाहिर करने वाला निशान भी पोस्ट किया है। बहुत से लेखकों के साथ ऐसा होता है कि वे लिखते-लिखते थक जाते हैं, और उसके बाद सोशल मीडिया पर जब वे अपनी रचनाओं से परे कुछ लिखते हैं तो उनके असली रंग सामने आते हैं जो कि उनके पहले के लेखन में नहीं दिखे रहते। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे बड़े अखबार में प्रधान संपादक रहे हुए गिरिलाल जैन के वहां काम करते हुए लोगों को यह एहसास नहीं हुआ था कि वे संघ की विचारधारा के हैं, लेकिन जब वहां से रिटायर होने के बाद उन्होंने बाहर लिखना शुरू किया, तो वे संघ परिवार के एक पसंदीदा लेखक बन गए थे, और संघ के प्रकाशनों में छपने लगे थे। साहित्यकार तो पत्रकारों से कुछ अलग होते हैं और वे कल्पनाशील बातें अधिक लिखते हैं और उसमें उनकी विचारधारा कई बार तो सामने आती है और कई बार सामने नहीं भी आ पाती है। मैत्रेयी पुष्पा हिंदी की जानी मानी लेखिका है और इतने परिचय के साथ ही हम इस बात को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

यह पहला यह अनोखा मौका नहीं है जब किसी ने यह लिखा हो कि कौन लोग किन मुद्दों पर लिखने के हकदार होते हैं। लोगों को याद होगा कि साहित्य में एक ऐसे आंदोलन का दौर आया था जब दलित लेखकों ने यह मुद्दा उठाया था कि गैरदलित लोग दलित साहित्य क्यों लिख रहे हैं? उनका यह मानना था कि जो लोग उसी तकलीफ से नहीं जूझ रहे हैं, जिन्होंने वह सामाजिक प्रताडऩा नहीं झेली, वे लोग भला कैसे दलितों के मुद्दों पर लिख सकते हैं? हो सकता है यह यह बात कुछ या काफी हद तक सही भी हो और यह भी हो सकता है कि दलितों के बीच के लेखक दलित मुद्दों पर जितनी तल्खी के साथ लिख सकते हैं, उतनी तल्खी के साथ गैरदलित लेखक उन मुद्दों पर शायद ना भी लिख पाएं। फिर भी यह सवाल हमेशा बने रहेगा कि क्या गैरदलितों का दलित साहित्य लिखना नाजायज है और क्या दलित साहित्य में लेखक का अनिवार्य रूप से दलित होना जरूरी है? कुछ ऐसा ही एक मुद्दा तलाकशुदा महिला को लेकर है मैत्रेयी पुष्पा ने उठाया है कि जो महिलाएं खुद तलाकशुदा हैं, या पति से अलग हैं, वे किसी दूसरे के तलाक के उचित या अनुचित होने पर बहस कर रही कर रही हैं? वे एक किस्म से इस पर हैरानी भी जाहिर कर रही हैं, लेकिन दूसरी तरफ उन्हें इस बात पर आपत्ति भी दिखाई पड़ती है। अब सवाल यह उठता है कि अगर यातना के किसी दौर से गुजरने के बाद ही किसी का उस पर लिखने का हक हो, या जो तलाकशुदा हूं उनको तलाक सही या गलत होने के किसी के मामले पर लिखना चाहिए या नहीं, तो ऐसी सीमाओं में लोगों और मुद्दों को बांधना है शायद ज्यादती होगी। ऐसे में तो देह के धंधे में फंसी हुई कोई महिला वेश्याओं के मुद्दों पर लिखे या ना लिखें? मैत्रेयी पुष्पा के उठाए सवाल, उनकी उठाई आपत्ति, का एक बड़ा आसान सा जवाब यह है कि जो महिलाएं ऐसे दौर से गुजरी हैं वे महिलाएं शायद इस मुद्दे पर लिखने की अधिक क्षमता रखती हैं, वे शायद तलाक के मुद्दे पर लिखने की एक बेहतर समझ रखती हैं। मैत्रेयी की बात पर एक सवाल यह भी उठ सकता है कि गैर तलाकशुदा महिलाएं भला क्या खाकर तलाक के मामले में लिख सकती हैं? जिन्होंने तलाक को भोगा नहीं है, या तलाक का मजा नहीं पाया है वे भला तलाक को क्या जानें? तो यह सिलसिला कुछ अटपटा है जो कि किसी लेखक के ऐसे किसी मुद्दे से अछूते रहने की उम्मीद करता है।

इस तर्क के विस्तार को देखें तो जो लोग मजदूर नहीं हैं वे मजदूर संगठनों के नेता कैसे हो सकते हैं? और जो आदिवासी नहीं है वे आदिवासियों के बीच नक्सली संगठनों के नेता कैसे हो सकते हैं? ऐसी बहुत सी बातें हैं कि किसी व्यक्ति का यातना के उस दौर से गुजरना या तजुर्बे के उस दौर से गुजरना उन्हें लिखने का अधिक हकदार बना दे या कि उनसे लिखने का हक छीन ले, यह कुछ तंगदिली और तंग नजरिए की बात लगती है। ऐसे में तो अनाथ रह गए बच्चों के बारे में लिखने के लिए किसी के अनाथ होने को जरूरी मान लिया जाए या फिर यह कह दिया जाए कि वह तो खुद ही अनाथ थे और वह भला अनाथों के बारे में क्या लिख सकते हैं? यह सिलसिला कुछ कुतर्क का लग रहा है। और हम फिलहाल उस सबसे ताजा मिसाल को लेकर बात करें जिसे लेकर आज का यह मुद्दा शुरू हुआ है, तो तलाक के मामले में कुछ लिखने के लिए एक तलाकशुदा या अकेली महिला तो गैरतलाकशुदा महिला के मुकाबले कुछ अधिक और बेहतर ही समझ रखती होगी।

अभी तक हमने जगह-जगह विचारधारा की शुद्धता, या धर्म और जाति की शुद्धता के आग्रह और दुराग्रह तो देखे थे, लेकिन अब तलाक के मुद्दे पर लिखने के लिए तलाकशुदा ना होने की शुद्धता का आग्रह बड़ा ही अजीब है ! और यह भी बताता है कि अच्छे-भले लिखने वाले लोग भी एक वक्त के बाद किस तरह चुक जाते हैं।

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