सत्ता के नशे में धुत्त  राष्ट्रपति.?

सत्ता के नशे में धुत्त राष्ट्रपति.?

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-सुनील कुमार॥

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 4 बरस बाद अपने गृह ग्राम जाने के लिए दिल्ली से कानपुर पहुंचे। इस मौके की जो तस्वीरें सरकारी अफसरों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट की हैं उनमें कानपुर के रेलवे स्टेशन पर पटरियों के नीचे लगी स्लीपर तक को रंग कर सजाया गया था, जाहिर है कि कानपुर शहर को भी कुछ सजाया गया होगा और कानपुर के पास से राष्ट्रपति के अपने गांव को भी। लेकिन इसके पहले कि यह सब खुशियां कामयाब हो पातीं, कानपुर शहर में राष्ट्रपति के लिए पौन घंटे तक रोके गए ट्रैफिक में फंसी एंबुलेंस में तड़प तड़प कर एक महिला की मौत हो गई। वहां मौजूद पुलिस वालों से एंबुलेंस को जाने देने की अपील काम नहीं आई, घर वाले रोते रहे, गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन पुलिस रास्ता रोके खड़ी रही, जिंदगी चली गई। जब मुर्दा जिस्म को लेकर परिवार अस्पताल पहुंचा तो डॉक्टरों का कहना था कि 10 मिनट पहले अगर लाया जाता तो शायद जान बच सकती थी। मीडिया की मेहरबानी से यह खबर चारों तरफ फैली और जब इस महिला का अंतिम संस्कार हो रहा था तो राष्ट्रपति की तरफ से शोक संदेश लेकर कानपुर के बड़े अफसरों को वहां भेजा गया।

यह अकेला मौका नहीं है और इसे हम मोदी सरकार के बनाए हुए राष्ट्रपति से जोडक़र भी नहीं देखते। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल में जब चंडीगढ़ गए थे तो वहां भी सबसे बड़े अस्पताल के आसपास का ट्रैफिक इसी तरह रोका गया था, और देश भर में यह जगह जगह होता है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तो इस देश में एक-एक ही हैं, लेकिन 2 दर्जन से अधिक मुख्यमंत्री, 2 दर्जन से अधिक राज्यपाल, और शायद हजार-पांच सौ मंत्रियों के लिए भी अलग-अलग जगहों पर वहां के स्थानीय मिजाज के मुताबिक ट्रैफिक को ऐसे ही रोका जाता है। छत्तीसगढ़ में एक मुख्यमंत्री के काफिले के लिए एक अस्पताल के बाहर इसी तरह राष्ट्रीय राजमार्ग पर ट्रैफिक को जब बहुत देर तक रोका गया था, और जब मुख्यमंत्री की फूलों से लदी हुई गाड़ी निकली, तो सडक़ पर खड़े लोगों में से एक ने पूछा कि गाड़ी में कौन है, तो दूसरे ने जवाब दिया कि कोई मुर्दा दिखता है, इतनी माला किसी मुर्दे पर ही चढ़ती हैं. ऐसा भी नहीं था कि लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि गाडिय़ों के काफिले में फूलों लड़ी गाड़ी में कौन है, लेकिन लोगों के मन की हिकारत और नफरत थी जो जिंदा मुख्यमंत्री को भी मुर्दा करार दे रही थी। यह बात सही है कि सडक़ों पर ट्रैफिक को रोकने वाले ऐसे नेताओं की संवेदनशीलता तो मुर्दा रहती ही है क्योंकि उन्हें भी यह बात मालूम है कि रोके गए ट्रैफिक में कोई बीमार हो सकते हैं, कोई लोग ट्रेन पकडऩे जा रहे हो सकते हैं जिनकी ट्रेन छूट जाए, कुछ और लोग बैंक, सरकारी दफ्तर या अदालत जाने वाले हो सकते हैं जहां न पहुंचने पर उन्हें बड़ा नुकसान हो जाए।

हिंदुस्तान में वीआईपी और वीवीआईपी कहे जाने वाले इस तबके के लिए आम जनता को जानवरों की तरह कहीं भी रोक देना एक बिल्कुल ही आम बात है, और हमने आज तक किसी ऐसे नेता को नहीं देखा है जिसने इस लोकतांत्रिक अधिकार का मजा ना लिया हो। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जिस वक्त रमेश बैस महज एक सांसद थे, उन्होंने राज्य सरकार को चिट्ठी लिखी थी कि उनके निकलने पर ट्रैफिक नहीं रोका जाता है और सामने सायरन वाली गाड़ी नहीं चलती है। इसी राजधानी में स्थानीय विधायक और पिछली सरकार में 15 बरस मंत्री रहे हुए बृजमोहन अग्रवाल जब भी अपने सरकारी बंगले से अपने पारिवारिक मकान तक आते जाते थे तो उनके काफिले में सामने सायरन बजाती हुई गाड़ी लोगों को हटाते चलती थी, और वे खुद कार में सामने बैठे हुए एक लाइट जलाकर अपना चेहरा लोगों को दिखाते रहते थे। जिन लोगों को उनका काफिला लाठियों से हांककर हटाता था, उन्हीं को चेहरा दिखाने का साहस भी कोई छोटी बात नहीं होती।

लेकिन हिंदुस्तान में यह सिलसिला सिर्फ नेताओं के लिए रहता हो ऐसा भी नहीं है। हम हाईकोर्ट जजों को देखते हैं कि उनके शहर से राजधानी आने और यहां से किसी उड़ान में आगे आने-जाने के दौरान पूरे रास्ते में पुलिस यह देखती है कि कोई जानवर सामने ना आ जाए और सायरन बजाती पायलट गाड़ी लोगों को रास्ते से हटाते चलती है कि बड़े जज साहब आ रहे हैं। कोई यह अंदाज लगा सकते हैं कि एक बड़े जज को प्रदेश में कहीं भी आते-जाते हुए ऐसी पुलिस गाड़ी और सायरन की जरूरत क्यों पड़ती है? और क्यों उनके लिए चौराहों पर सिपाहियों को चौकन्ना होकर खड़े रहना पड़ता है? क्या जज फांसी पर टंगने जा रहे किसी इंसान की जिंदगी को रोकने का फैसला करने कहीं पहुंच रहे हैं कि उन्हें सडक़ों पर लोगों को रोककर, वहां से हांककर खुद पहले आगे बढऩे की हड़बड़ी हो? इस देश में सिर्फ सरकारी पदों पर बैठे हुए नेताओं को ही नहीं, बड़े अफसरों को भी, बड़े जजों को भी, और दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों को भी सार्वजनिक सडक़ों पर जनता को हांककर खुद तेजी से आगे बढऩा बहुत अच्छा लगता है।

यह देश अपने-आपको लोकतांत्रिक भी कहता है और विकसित भी कहता है, लेकिन इस देश में लोकतंत्र बस इतना ही विकसित है कि कुछ हजार लोग वीआईपी या वीवीआइपी हैं, और बाकी करोड़ों लोग कीड़े मकोड़े की तरह, मवेशियों की तरह सडक़ों से खदेड़ देने के लायक हैं, सडक़ों पर रोक दी गई एंबुलेंस में मर जाने के लायक हैं। इस देश में राजशाही और सामंतवाद का खात्मा दूर-दूर तक कहीं नहीं दिखता। लोगों को ऐसी शान शौकत बहुत सुहाती है, बड़े-बड़े काफिले बहुत अच्छे लगते हैं। इस देश के रेलवे स्टेशनों पर शौचालय चाहे साफ न हो सकें, पीने का पानी चाहे साफ ना मिल सके, लेकिन राष्ट्रपति के पहुंचने पर रेल पटरियों के नीचे बिछे हुए स्लीपर भी रंगे जाते हैं जहां तक कि राष्ट्रपति की नजर भी नहीं पडऩे वाली है। और यह सब खर्चा उस गरीब जनता के हक को छीन कर ही होता है जिस गरीब जनता को अगर सरकारी मदद का अनाज ना मिले तो वह भूखे ही मर जाए।

लोग सत्ता पर पहुंचकर संवेदना अनिवार्य रूप से खो बैठते हैं। जो इंसान इस देश में सबसे बड़े रिहायशी मकान, राष्ट्रपति भवन में रहता है उसे तो अपने पूरे गांव को एक ट्रेन में दिल्ली बुलवा लेना था, गांव दिल्ली देख लेता, अपने एक कामयाब बेटे का राष्ट्रपति भवन देख लेता, और कानपुर की फिजूलखर्ची भी बचती, और एक बेकसूर महिला की जिंदगी भी शायद बच गई होती। इस देश में वीआईपी और वीवीआईपी तबके में अपने को शुमार करवाने के लिए जो लोग लगातार कोशिश करते रहते हैं उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि आम जनता ऐसे तबकेधारी लोगों से हिकारत ही नहीं करती, बल्कि नफरत करती है। गरीब की आह लेना किसी के लिए अच्छी बात नहीं है, इसलिए इस एक मौत से सबक लेकर कम से कम राष्ट्रपति यह सिलसिला शुरू कर सकते हैं कि उनके काफिले के लिए किसी चौराहे पर ट्रैफिक ना रोका जाए और वह खुद लालबत्ती पर रुककर हरी बत्ती पर ही आगे बढ़ेंगे। अगर राष्ट्रपति ऐसा करते हैं तो यह माना जायेगा कि उनके नाम पर, उनकी तामझाम के लिए, जिस जिंदगी को बलि चढ़ाया गया है, उसका कुछ दर्द राष्ट्रपति को हुआ है। यह लिखते हुए हमें उम्मीद जरा भी नहीं है कि इस देश के ताकतवर लोगों में से कोई भी अपने ऐसे विशेष अधिकारों को और ऐसे आडंबरों को कम करने के बारे में सोचेंगे भी, लेकिन फिर भी लिखना हमारा काम है, और हमारा बस लिखने तक ही तो सीमित है।

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