Home राजनीति दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए

दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए

दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता, दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए, मशहूर शायर निदा फाज़ली  की इन पंक्तियों को चरितार्थ करते हुए बीते कल जम्मू-कश्मीर के प्रमुख नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उच्च स्तरीय बैठक हुई। साढ़े तीन घंटे चली इस बैठक में अविश्वास की उस बर्फ को तोड़ने की कोशिश की गई, जो पिछले दो सालों में धीरे-धीरे जम गई थी। ये बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि जम्मू-कश्मीर के मसले पर लोकतांत्रिक तरीके से बातचीत की पहल हुई है।

5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा कर विशेष राज्य का दर्जा केंद्र की मोदी सरकार ने वापस ले लिया था और इसके साथ ही राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया था। इससे पहले 2018 में पीडीपी से भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया था, जिस वजह से सरकार गिर गई थी और उसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया था। संक्षेप में कहा जाए तो 2018 से ही धरती की इस जन्नत पर हालात सामान्य नहीं थे। आतंकवाद, सीमा पार से घुसपैठ, सुरक्षा के लिए सैन्य निगरानी औऱ इन सबके बाद राजनैतिक अस्थिरता, इन कठिन हालात में जम्मू-कश्मीर की जनता लगातार तनाव के माहौल में जी रही है। अगर स्थितियां सामान्य होती हैं, तो राजनैतिक अस्थिरता के बावजूद रोजमर्रा के कारोबार नियमित चलते रहते हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर को मुश्किलों के पहाड़ों ने चारों ओर से घेर रखा है।

ऐसे में केंद्र सरकार ने वहां के प्रमुख नेताओं को नजरबंद कर, चुपके से राज्य की स्थिति में बड़े बदलाव कर दिए और हवाला दिया विकास का। केंद्र सरकार के इस रवैये से लोकतंत्र में विश्वास रखने वालों को बड़ा झटका लगा था। लेकिन यह शायद लोकतंत्र की ही ताकत है कि अब उन्हीं नेताओं के साथ प्रधानमंत्री राज्य के हालात और भविष्य की स्थितियों पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें दो साल पहले नजरबंद किया गया था।

दिल्ली में प्रधानमंत्री के आवास पर हुई इस बैठक में जम्मू-कश्मीर के चार पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला, गुलाम नबी आजाद, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत आठ राजनैतिक दलों के 14 नेताओं ने शिरकत की। बैठक में सरकार की ओर से पहले कोई एजेंडा नहीं रखा गया था, लेकिन यह तय था कि राज्य में राजनैतिक प्रक्रिया को स्थापित करने के लिए यह बैठक बुलाई गई है। सूत्रों के मुताबिक बैठक में यह संदेश दिया गया कि  केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन सबसे पहले राज्य में निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन या पुनर्निर्धारण पर फैसला लेना चाहती है। क्योंकि जम्मू और कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के बाद विधानसभा चुनाव की दिशा में यह पहला कदम होगा।

बुधवार को जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग की बैठक भी हुई है, जिसमें विधानसभा क्षेत्रों के पुनर्गठन और सात नई सीटें बनाने को लेकर विचार विमर्श किया गया। इस वर्चुअल मीटिंग में जम्मू-कश्मीर के सभी 20 उपायुक्तों ने भाग लिया, जिसमें विधानसभा सीटों को भौगोलिक रूप से अधिक सुगठित बनाने के तरीक़े के बारे में जानकारी एकत्र की गई। यानी निकट भविष्य में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव संभव हो सकते हैं। वैसे दिसंबर में, जम्मू और कश्मीर में स्थानीय निकाय चुनाव हुए थे, जिसमें गुपकार गठबंधन ने 100 से अधिक सीटें जीतीं थी, जबकि भाजपा 74 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी।

गुरुवार की इस बैठक से पहले जम्मू-कश्मीर में गुपकार समूह की बैठक हुई थी, जिसमें इस बात पर विचार किया गया था कि बैठक में शामिल होना है या नहीं। फारुक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में सात दलों के गुपकार समूह ने बैठक में शामिल होने के लिए तो रजामंदी दे दी थी, लेकिन यह तय किया था कि वे पूर्ण राज्य का दर्जा और विशेष दर्जा बहाल करने के लिए दबाव डालेंगे। कांग्रेस ने भी उनकी मांग का समर्थन किया था, हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि राज्य का दर्जा बहाल करने पर ‘उचित समय पर’ विचार किया जाएगा,  लेकिन वह समय अभी नहीं आया है। वैसे प्रधानमंत्री ने यह भरोसा तो दिया ही है कि वे जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस बैठक से पहले पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केंद्र के लिए पाकिस्तान से बातचीत का मशविरा भी दिया था, जिस पर गुरुवार को राज्य में उनका काफी विरोध भी हुआ। हालांकि गुपकार में उनके सहयोगी फारुक अब्दुल्ला ने महबूबा के इस बयान से किनारा कर लिया था, प्रधानमंत्री के साथ बैठक को लेकर फारुक अब्दुल्ला ने कहा था कि ‘देर आए, दुरुस्त आए’। अच्छा क़दम उठाया। बातचीत करके मसले हल करने की ज़रूरत है। किसी न किसी तरीक़े से इस तनाव को दूर करने की ज़रूरत है।

फारुक साहब की इस बात पर न केवल केंद्र सरकार बल्कि तमाम दलों को विचार करने की जरूरत है। तनाव खत्म करने की दिशा में प्रय़ास नहीं होंगे, तो जम्मू-कश्मीर के हालात बिगड़ते जाएंगे। आज जब बैठक चल रही थी, उस दौरान ही प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बयान दिया था कि जम्मू-कश्मीर से पूर्ण राज्य का दर्जा छीनने के फैसले से मोदी सरकार ने देश की छवि धूमिल की। यह बात सही है कि अगस्त 2019 में जिस तरह से फैसले लिए गए, उससे लोकतंत्र के लिए सही संदेश नहीं गया। लेकिन अब जब सभी दलों के साथ केंद्र की बैठक हुई है, तो इस पहल का स्वागत होना चाहिए। गुरुवार की इस बैठक से तुरंत किसी नतीजे की अपेक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन एक अच्छी शुरुआत उम्मीदें बंधाती है।

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.