Home कोरोना टाइम्स आत्ममुग्धता के नशे से उबरो साहब..

आत्ममुग्धता के नशे से उबरो साहब..

मोदी सरकार की प्राथमिकता क्या है। जनता की भलाई करना या फिर नए-नए रिकार्ड बनाकर अपने लिए तालियों का इंतजाम करना। और कई बार तो ऐसा लगता है कि सरकार यह इंतजार भी नहीं करती कि कोई दूसरा उसके लिए ताली बजाए बल्कि वो खुद ही अपनी तारीफों के पोस्टर चिपकवा लेती है। पिछले दिनों देश ने देखा है कि कैसे मुफ्त और सबसे बड़े टीकाकरण अभियान के बड़े-बड़े पोस्टर मोदीजी की तस्वीरों के साथ चस्पां किए गए थे। अगर टीकाकरण अभियान वाकई इतना सफल होता, तो वैक्सीन की कमी और कीमत जैसे सवालों पर गंभीर बहस न छिड़ती, न मामला अदालत तक पहुंचता। लेकिन हकीकत यही है कि टीकाकरण अभियान शुरु से सवालों के घेरे में रहा।

सरकार ने टीकाकरण की कोई स्पष्ट नीति नहीं बनाई, बार-बार उसमें बदलाव होते रहे। दिल्ली के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ने इसके लिए केंद्र सरकार की तीखी आलोचना की थी। सबसे ज़्यादा आलोचना टीका खरीद और वितरण का जिम्मा राज्यों को देने को लेकर थी। टीकों की खरीद का राज्यों पर अतिरिक्त भार पड़ रहा था, और वे मांग कर रहे थे कि यह जिम्मेदारी केंद्र को लेनी चाहिए। आखिरकार चौतरफ़ा आलोचनाओं के बीच मोदीजी ने पिछले दिनों राष्ट्र के नाम संबोधन में टीकाकरण को लेकर नई घोषणाएं कीं और लगे हाथों राज्य सरकारों पर ही दोष मढ़ दिया। अपने संबोधन में मोदीजी ने घोषणा की थी कि 21 जून, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से 18 साल से ऊपर के सभी लोगों को मुफ्त में टीके उपलब्ध होंगे। इस घोषणा पर 21 जून से अमल शुरु हुआ है और लगभग एक महीने पहले लागू किए गए नीतिगत फ़ैसले को उलटते हुए राज्यों से टीकाकरण का नियंत्रण वापस अपने हाथ में ले लिया है। लेकिन जिस तरह के आंकड़े सामने आ रहे हैं, उससे ऐसा लग रहा है कि सरकार ने टीकाकरण का रिकार्ड बनाने के लिए भी खेला कर दिया है।

21 जून की शाम साढ़े आठ बजे जब 80 लाख से ज़्यादा टीके लगाए जा चुके थे तब इस रिकॉर्ड टीकाकरण को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय ने ट्वीट कर अपनी सफलता का गुणगान किया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी लिखा था, ‘आज की रिकॉर्ड तोड़ टीकाकरण संख्या प्रसन्न करने वाली है।’ भाजपा के अन्य नेताओं और मंत्रियों ने भी इसी तरह की प्रसन्नता वाले ट्वीट किए और देश को एक बार फिर ये बताने की कोशिश की गई कि मोदी है तो मुमकिन है। अचानक एक दिन में 80 लाख से अधिक टीके लगना वाकई आश्चर्यजनक है और उससे भी अधिक आश्चर्य ये देखकर होता है कि उसके ठीक एक दिन पहले और एक दिन बाद के टीकाकरण के आंकड़ों में कितना अंतर है। टीकाकरण का हिसाब रखने वाली वेबसाइट को विन ऐप के मुताबिक 20 जून को 29 लाख 37 हज़ार टीके लगे, जबकि 22 जून को 54 लाख 22 हज़ार खुराक दी गई। 21 जून को सबसे अधिक खुराक देने वाले शीर्ष 10 राज्यों में से सात में भाजपा की सरकारें हैं।

भाजपा शासित प्रदेशों मध्यप्रदेश और कर्नाटक में तो टीकाकरण के ग्राफ में भी काफी उतार-चढ़ाव देखने मिला है। को विन वेबसाइट के अनुसार 21 जून को मध्यप्रदेश में रिकॉर्ड 17 लाख 44 हज़ार टीके लगाए गए। जबकि एक दिन पहले यानी 20 जून को सिफ़र् 692 टीके लगाए गए थे और एक दिन बाद 22 जून को सिफ़र् 4 हज़ार 842 टीके ही लगाए जा सके। कर्नाटक में 21 जून को 11 लाख 59 हज़ार टीके लगाए गए जबकि एक दिन पहले सिफ़र् 68 हज़ार 172 और 22 जून को 3 लाख 95 हज़ार टीके लगाए जा सके। 15 जून से 20 जून तक देश में रोजाना औसतन 30 लाख टीके लगे, तो सवाल ये उठता है कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि 21 जून को टीकाकरण की संख्या 80 लाख के पार पहुंच गई। क्या इसका एक कारण ये था कि 21 तारीख से टीका मुफ्त में लग रहा था। अगर यही वजह थी तो फिर 22 जून को मुफ़्त टीका लगाने वालों की संख्या 54 लाख ही क्यों रह गई? सवाल ये भी है कि अब तक तो जरूरत भर के टीके कंपनियां बना नहीं पा रही थीं। पिछले दिनों ही कई राज्यों में टीकाकरण को इसी वजह से रोका गया था, क्योंकि पर्याप्त स्टॉक नहीं था।

फिर अचानक एक दिन में हालात कैसे बदल गए। क्या यह सब एक दिन के लिए सिर्फ रिकॉर्ड बनाने की कोई कवायद थी, या फिर सरकार वाकई इतनी सक्षम थी कि एक दिन में 80 लाख लोगों को टीका लगा दे। यह सक्षमता सरकार ने पहले क्यों नहीं दिखाई, जब देश में दूसरी लहर का कोहराम था और टीकाकरण इससे बचाव का एकमात्र रास्ता। क्या सरकार योग दिवस जैसे किसी शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रही थी या फिर लोगों के सब्र का इम्तिहान ले रही थी।

सरकार का लक्ष्य साल के अंत तक सभी वयस्कों का टीकाकरण करना है। इसके लिए प्रति दिन 97 लाख टीकाकरण किए जाने की आवश्यकता है। मौजूदा स्थिति में देश में हर रोज़ करीब 39 लाख वैक्सीन बन रही है। भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट की क्षमता आगामी महीनों में बढ़ने वाली है और आयातित खुराक आना भी शुरु हो गई है। मुमकिन है अगले कुछ महीनों में वैक्सीन का पर्याप्त उत्पादन और भंडारण हो जाए। बेहतर होता कि सरकार पहले टीकों का इंतजाम कर लेती, फिर बड़े लक्ष्य तय करती और बड़े दावे भी करती। लेकिन तब उसे अपने नए रिकार्ड की घोषणा करने और वाहवाही करने के लिए भी इंतजार करना पड़ता।

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