Home गौरतलब योग दिवस और मोदीजी की कामना..

योग दिवस और मोदीजी की कामना..

सातवें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कामना की कि हर देश, हर समाज और हर व्यक्ति स्वस्थ हो। सब एक साथ मिलकर एक-दूसरे की ताकत बनें। एक अच्छे अवसर पर एक अच्छी कामना सुनकर अच्छा तो लगता है, लेकिन दिक्कत ये है कि देश कामनाओं से नहीं चलता, न केवल बातों से स्थितियां ठीक होती हैं। उसके लिए मजबूत इरादों के साथ बड़े फैसले लेने पड़ते हैं। ऐसे फैसले जिनके दायरे में बहुसंख्यक जनता आए। ऐसे फैसले जिनसे गरीब से गरीब जनता का भला हो, केवल दो-चार उद्योगपतियों की पूंजी न बढ़े। प्रधानमंत्री होने के नाते मोदीजी की जिम्मेदारियां केवल देश के लिए कामनाएं करने से पूरी नहीं होंगी, उसके लिए उन्हें आगे बढ़कर कुछ सच्चाइयों को स्वीकार करना होगा, कुछ सवालों का जवाब देना होगा।

अभी लोगों के जेहन से त्रासदी की वे तस्वीरें मिटी नहीं हैं, जहां लाशों का सामूहिक अंतिम संस्कार किया जा रहा था। श्मशानों और कब्रिस्तानों के बाहर टोकन लेकर अपने किसी प्रिय को अंतिम विदाई देने की प्रतीक्षा करनी पड़ रही थी। गंगा नदी में बहती लाशें और गंगा किनारे दफ्न शरीरों की चर्चा अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी हुई। अस्पतालों में वेंटिलेटर, आक्सीजन सिलेंडर और मरीज के लिए एक अदद बिस्तर की कमी भी देश ने किस पीड़ा के साथ झेली है, इसका अहसास शायद अब तक सरकार को नहीं हुआ है। इसलिए न प्रधानमंत्री ने, न सरकार की ओर से किसी अन्य जिम्मेदार व्यक्ति ने स्वास्थ्य आपातकाल में इतने लचर इंतजाम पर किसी तरह का अफसोस देश के सामने प्रकट किया या यह माना कि कहीं न कहीं सरकार से हालात की गंभीरता को समझने में कोई चूक हुई है।

अखबार और सोशल मीडिया महामारी में सरकारी बदइंतजामी के शिकार आम आदमी की खबरों से भरे पड़े थे। इस वक्त अपनी व्यवस्था में सुधार लाने की जगह सरकार ये इंतजाम करने में लगी थी कि आक्सीजन की कमी जैसी खबरों पर लोग बात न करें। विपक्ष सवाल उठाता था तो उस पर लाशों पर राजनीति करने का कटाक्ष किया जाता था। सरकार के इस रवैये को इस देश की जनता ने धैर्य और संयम के साथ ही सहा है। अपने परिजनों को इलाज के लिए तड़पते, बेमौत मरते और फिर कीड़े-मकोड़ों की तरह अंतिम यात्रा पर निकलते देखने की पीड़ा सहने के बावजूद लोगों ने एक-दूसरे की मदद के लिए हाथ बढ़ाए। और अब योग दिवस पर प्रधानमंत्री ज्ञान दे रहे हैं कि हमारे ऋ षियों, मुनियों ने योग के लिए ‘समत्वं योग उच्चते’, यह परिभाषा दी थी। उन्होंने सुख-दुख में समान रहने,  संयम को एक तरह से योग का पैरामीटर बनाया था।

जनता के पास सहनशीलता की अपार पूंजी है, इसी के दम पर वह रोजाना की उन तकलीफों से जूझने का हौसला रखती है, जो सरकार की नीतियों की वजह से उसे मिल रही है। सरकार ने समय रहते स्वास्थ्य सुविधाओं का इंतजाम नहीं किया। मरीजों के सही आंकड़े सामने ही नहीं आए, न ही मरने वालों की असल संख्या पता चली। इसमें भी सरकारी घट-बढ़ होती रही। वैसे सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 19 जून तक 3 लाख 86 हज़ार 713 लोगों की मौत कोरोना संक्रमण के कारण हुई है। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में न्यूनतम राहत और कोरोना से मारे गए लोगों को मुआवजा या अनुग्रह राशि देने की मांग की गई थी। लेकिन सरकार ने मुआवजा देने से भी हाथ खड़े कर दिए हैं। अदालत में दायर अपने हलफनामे में सरकार ने कहा है कि कोविड-19 के पीड़ितों को 4 लाख रुपये का मुआवजा नहीं दिया जा सकता है क्योंकि आपदा प्रबंधन क़ानून में केवल भूकंप, बाढ़ आदि प्राकृतिक आपदाओं पर ही मुआवजे का प्रावधान है। सरकार ने यह भी कहा है कि यदि इतनी रक़म दी जाती है तो आपदा राहत निधि के रुपये ख़त्म हो जाएंगे।

सरकार के इस जवाब से निराशा तो हुई लेकिन आश्चर्य नहीं हुआ। जब सरकार समय पर दवाओं और वैक्सीन का इंतजाम नहीं कर पा रही, वह भला मुआवजा क्यों देगी। अपने भाषणों में प्रधानमंत्री ने कोरोना को भले ही सदी की सबसे बड़ी त्रासदी बताया हो, लेकिन उन्हें इस बात की भी पड़ताल करना चाहिए कि आखिर ये सबसे बड़ी त्रासदी कैसे बनी। आपदा प्रबंधन कानून में अगर केवल प्राकृतिक आपदा पर मुआवजे का प्रावधान है, तो फिर यह तय करने की जरूरत है कि कोरोना को सरकार कैसी आपदा मानती है। अगर यह प्राकृतिक है, तो फिर क़ानून में संशोधन करने की जरूरत है, क्योंकि सौ सालों में ऐसी आपदा नहीं आई। और अगर यह मानव निर्मित है, तब इसमें सरकार की जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है। इसी कोरोना के नाम पर पीएम केयर्स फंड बना, जिसमें करोड़ों रुपए इकठ्ठा हुए। अगर उस धनराशि का इस्तेमाल असल पीड़ितों को राहत पहुंचाने के लिए नहीं किया जा सकता, तो फिर सरकार को बताना चाहिए कि उससे किन लोगों की मदद की जा रही है।

मोदीजी कहते हैं कि इस कठिन समय में योग आत्मबल का एक बड़ा माध्यम बना। योग ने लोगों में यह भरोसा बढ़ाया कि हम इस बीमारी से लड़ सकते हैं। वैसे योग पर तो लोगों का भरोसा सात सालों का नहीं, सदियों का है। महामारी हो या न हो, योग का व्यापार और प्रचार हो या न हो, योग बहुतेरे लोगों की जीवनचर्या में शामिल है। लेकिन इस वक्त योग पर भरोसे की बात करने की जगह प्रधानमंत्री को सरकार पर भरोसे की बात करना चाहिए, अपने आत्मबल का परिचय देना चाहिए। क्या प्राणायाम की शक्ति उन्हें ऐसा करने की हिम्मत देगी।

Facebook Comments
(Visited 4 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.