एक उंगली देख कांप उठे भयभीत देश को   दीवारों पर इश्तहारों से कोई दिक्कत नहीं..

एक उंगली देख कांप उठे भयभीत देश को दीवारों पर इश्तहारों से कोई दिक्कत नहीं..

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-सुनील कुमार॥

कुछ वक्त पहले हिंदुस्तान में एक फिल्म आई जिसमें अभिनेत्री स्वरा भास्कर अपने ही बदन को सेक्स सुख देते हुए दिख रही थी। हिंदी भाषा में लोग बात करते हुए सेक्स से जुड़े बहुत से शब्दों से परहेज करते हैं इसलिए हस्तमैथुन शब्द की जगह तरह-तरह के शब्द जोडक़र काम चलाना पड़ता है। इस फिल्म के इस सीन को लेकर जिसमें कोई अश्लीलता नहीं थी, और जो कि जिंदगी की एक हकीकत बयान करने वाला सीन था, उस पर खूब बवाल खड़ा हुआ। देश भर से उसके खिलाफ लिखा गया। लोग इस सीन के जितने खिलाफ थे, उतने ही इस बात के भी खिलाफ थे कि स्वरा भास्कर ने कुछ किया था। स्वरा अपनी राजनीतिक विचारधारा के चलते हुए और लगातार मुखर बने रहने की वजह से देश के करोड़ों नफरतजीवियों के निशाने पर हमेशा ही बनी रहती हैं। वे अगर सुबह उठकर ट्वीट करें कि आज पूरब की तरफ चलना चाहिए, तो महज उनकी बात को खारिज करने के लिए लाखों समर्पित लोग पश्चिम की तरफ चलने लगेंगे। ऐसी नफरत का केंद्र बनी हुई स्वरा न तो किसी हमले से डरती हैं और न ही सच को बोलने से परहेज करती हैं, इसलिए इस फिल्म के इस सीन से उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी जो कि हस्तमैथुन करने के बुनियादी इंसानी हक को महिलाओं को भी उतना ही देता है जितना कि पुरुषों के पास हमेशा से रहते आया है।

जिन लोगों को यह लगता है कि हस्तमैथुन कोई पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता का ईसाई प्रभाव है जो कि हिंदुस्तानी नौजवानों को बर्बाद कर रहा है तो उन्हें अपने ही देश के इतिहास को पढऩा चाहिए जिसमें दुनिया में सेक्स की सबसे मशहूर किताब तरह-तरह के तरीके बताती है कि कैसे अधिक से अधिक देहसुख हासिल किया जा सकता है, और जो सेक्स के 84 किस्म के आसन बताती है। लोगों को यह भी देखना चाहिए कि सैकड़ों बरस पहले बने इस देश के मंदिरों की दीवारों पर इंसानों के सेक्स और इंसानों के जानवरों के साथ सेक्स और हर किस्म के सेक्स की मूर्तियां कैसे बनाई गई थीं। इसलिए यह देश सेक्स से ऐसे बड़े परहेज वाला देश भी कभी नहीं रहा है।

अब देखने की मजेदार बात यह है कि एक फिल्म में एक अभिनेत्री अगर अपने बदन को सेक्स सुख दे रही है तो उसकी एक उंगली से इस देश को इतनी बड़ी तकलीफ हो गई जितनी तकलीफ उसे कभी इस देश की दीवारों पर लिखे इसी बात के इश्तहारों से नहीं हुई थी। हिंदुस्तान की दीवारों को देखें तो वे गुप्त रोग विशेषज्ञों के इश्तहारों से भरी हुई हैं जिनमें से कोई भी शिक्षित या प्रशिक्षित डॉक्टर नहीं है, और सारे के सारे फर्जी इलाज करने वाले, नीम-हकीम कहे जाने वाले, नीम और हकीम दोनों शब्दों को बदनाम करने वाले लोगों के सेक्स क्लीनिक के हैं। हिंदुस्तानी दीवारों पर ऐसे सेक्स क्लीनिक के इश्तहार उस वक्त से चले आ रहे हैं जब पुरातत्व विभाग को खुदाई में दीवार मिली भी नहीं थी। जो सबसे पुरानी दीवारें हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में मिली होंगी, उन पर भी किसी डॉक्टर मुल्की या डॉक्टर शाह का इश्तिहार लिखा हुआ जरूर रहा होगा जिसे बाद में शर्मीले पुरातत्ववेत्ताओं ने मिटा दिया होगा। एक तरफ तो सेक्स के नाम पर बीमारियों का हौव्वा खड़ा करके उनके इलाज का दावा करने वाले ऐसे इश्तहारों का पहला ही शब्द लिखा रहता है कि बचपन से हस्तमैथुन करने की वजह से जो कमजोरी आ गई है उसका शर्तियां इलाज किया जाता है। इसका मतलब है कि यह समाज सेक्स और हस्तमैथुन इन दोनों के अस्तित्व को तो अनंत काल से देखते आ रहा है। सेक्स क्लीनिक के विज्ञापनों को किसी ने आपत्तिजनक माना हो और उनके खिलाफ आंदोलन छेड़े हों ऐसा तो पिछले 50 साल में कहीं पढऩे में नहीं आया क्योंकि यह इश्तहार मोटे तौर पर आदमियों को खींचने के लिए रहते हैं, लडक़ों को खींचने के लिए रहते हैं जिन्हें यह समाज यह मौलिक अधिकार देता है कि वह हस्तमैथुन भी कर सकते हैं, उसकी वजह से बीमारियों के शिकार भी हो सकते हैं, और फिर ऐसे फर्जी इलाज करने वाले गुप्त रोग विशेषज्ञों के पास भी जा सकते हैं।

लडक़ों और पुरुषों के ऐसे काम करने पर समाज को कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अगर एक अभिनेत्री ने एक फिल्मी कहानी की जरूरत को पूरा करने के लिए अपने ही बदन पर अपनी उंगली धर दी तो मान लो यह पूरा देश ही सिहर उठा। सारे के सारे मर्दों को लगा कि यह उंगली तो उनकी मर्दानगी पर उठ गई है, हस्तमैथुन के उनके एकाधिकार पर उठ गई है। सेक्स के अधिकार पर उनकी मोनोपोली खतरे में पड़ गई है, और ऐसे हाल में तो आगे जाकर महिलाएं और भी हक मांगने लगेंगी, और फिर जो महिला अपने बदन को खुद सुख दे पाएगी उसे भला मर्द की जरूरत क्या रह जाएगी? यह समाज तो बहुत ही खतरनाक समाज हो जाएगा जहां औरत बिना मर्द के अपने बदन की जरूरत को पूरा कर लेगी !

इसलिए ऐसी फिल्म के ऐसे सीन के खिलाफ और इसे करने वाली अभिनेत्री के खिलाफ जमकर लिखा गया उसे हिंदुस्तानी संस्कृति पर हमला मान लिया गया और उसे भारतीयता के खिलाफ मान लिया गया मानो हिंदुस्तानी दीवारों पर इश्तहार करने वाले सेक्स क्लीनिक के गैरचिकित्सक फर्जी डॉक्टर यूरोप और अमेरिका के लोगों का इलाज करते हैं और हिंदुस्तानी संस्कृति में तो मानो कोई हस्तमैथुन है ही नहीं जिसके लिए वे दीवारों पर इश्तहार लिखते हैं। यह अजीब सा पाखंडी समाज है जिसे एक औरत का उसकी देह पर उसका हक देखते भी नहीं बनता। यह देश ऐसे मर्दों का देश है जो कि खुद संतुष्टि पा लेने वाली महिला को देखकर दहशत में आ जाते हैं. जिन्हें किसी महिला की सेक्स की जरूरत मर्द पर आश्रित रहने तक ही अच्छी लगती है। ऐसा कायर देश जो कि स्वरा भास्कर की एक उंगली को देखकर कांप उठा था उसे देश पर मर्दों के लिए दीवारों पर लिखे गए सेक्स क्लीनिक के इश्तहारों के हस्तमैथुन से कोई दिक्कत नहीं दिखती है, ऐसा है मेरा देश!

अब यह वक्त आ गया है कि औरत से जुड़े हुए तमाम मुद्दों पर उनकी बात सुनी जाए, उनकी लिखी हुई बात को पढ़ा जाए, और हिंदुस्तानी मर्द अपनी सोच पर फिक्र करें कि कैलेंडर की 21वीं सदी के 21 साल में भी वे किस तरह हज़ारों बरस पहले की पत्थर की किसी गुफा में जी रहे हैं !

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