Home गौरतलब मखमली भारत पर भूख का पैबंद..

मखमली भारत पर भूख का पैबंद..

अलीगढ़ से एक दिल दहलाने वाली खबर आई है। एक महिला और उसके पांच बच्चे पिछले दो महीने से भोजन के लिए तरस गए। बीच-बीच में कहीं से दो-चार रोटी का इंतजाम हो जाता था, लेकिन पिछले 10 दिनों से यह पूरा परिवार भूखा ही रहा। परिवार के सदस्य भूख से तड़पकर बीमार हो गए, और एक एनजीओ की मदद से उन्हें अस्पताल ले जाया गया। डाक्टर्स फिलहाल उनका इलाज कर रहे हैं। लेकिन भूख और गरीबी का असली इलाज तो सरकार के पास है, जिसे शायद यही नहीं पता कि इस देश में कोरोना की दो लहरों में कितने परिवार इस तरह भूख की भेंट चढ़ गए हैं। बीमारी की रोकथाम के लिए पिछले साल केंद्र सरकार को सबसे आसान उपाय लॉकडाउन ही समझ आया था। अपने सुविधाजनक घरों में बैठकर ये फैसला लेने में सरकार को कोई तकलीफ नहीं हुई। सरकार को अपने लिए न रोजगार का इंतजाम करना था, न दो वक्त की रोटी का। 2024 तक उसकी सत्ता सुरक्षित है। लेकिन उस लॉकडाउन में लाखों लोगों की जिंदगी मौत के मुहाने पर आ खड़ी हुई।

सरकार को सलाह मिलती रही कि गरीबों के खाते में रकम डालें, उसके लिए रोजगार का इंतजाम करें, लॉकडाउन में सैकड़ों उद्योग ठप्प हो गए हैं, करोड़ों रोजगार चले गए हैं, इस हालात को सुधारने के इंतजाम करे। लेकिन सरकार ने बदले में आत्मनिर्भर अभियान के चमकीले आवरण के साथ पांच किश्तों वाले राहत पैकेज की घोषणा की। आग चारों ओर लगी हुई थी और सरकार बता रही थी कि कैसे चरणबद्ध तरीके से वह कुएं खोदने वाली है, ताकि देश में लबालब खुशहाली आ सके।

 एक लॉकडाउन में देश पस्त हो चुका था और जब कोरोना की दूसरी लहर आई तो प्रधानमंत्री ने ही लॉकडाउन को अंतिम विकल्प बताते हुए फैसला राज्यों पर छोड़ दिया। रोजाना हजारों मौतें और लाखों संक्रमण देखते हुए राज्यों को अपने-अपने तरीके से लॉकडाउन लगाना ही पड़ा। अब जब यह लहर धीमी पड़ चुकी है, तो अनलॉक की प्रक्रिया भी शुरु हो रही है, लेकिन जिंदगी की बुनियादी सुविधाओं पर लगा ताला अब भी नहीं खुल पाया है। उद्योग धंधों में खर्चे कम करने के नाम पर छंटनी हो रही है, सरकार की ओर से नौकरी मिलने के आसार लगभग खत्म हैं, स्वरोजगार के अवसर भी कोरोना की भेंट चढ़ चुके हैं। स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया जैसे जुमले अब सुनने नहीं मिलते। मनरेगा जैसी योजनाएं ही अब तिनके का सहारा बनी हुई हैं। हालांकि उसमें भी रोजगार पाना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं है। बेरोजगारी के इस जख्म पर महंगाई का नमक सरकार डालती ही जा रही है और अपने बचाव में इतने बेतुके तर्क देती आई है कि अब उनका जिक्र करना खुद को मूर्ख साबित करने जैसा लगने लगा है।

दो मई को विधानसभा चुनावों के नतीजे आए और उसके बाद पेट्रोल-डीजल के दाम हर दूसरे दिन बढ़ने लगे। सरकार राजकोष को भरने का दावा कर रही है, लेकिन जनता की खाली जेबें उसे शायद नजर ही नहीं आती। रिजर्व बैंक का अनुमान था कि महंगाई दर 2-6 प्रतिशत तक बढ़ेगी, लेकिन मई में थोक महंगाई दर 12.94 फीसदी और खुदरा महंगाई दर 6.30 फीसदी तक चली गई, जो पिछले 6 महीने में सबसे अधिक है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें तो पहले ही शतक लगा चुकी हैं अब खाद्य तेल भी बेतहाशा महंगा हो गया है।

28 मई 2020 से 28 मई 2021 के बीच सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मूंगफली का तेल 20 प्रतिशत, सरसों का तेल 44, वनस्पति तेल 45, सोया तेल 53, सूरजमुखी का तेल 56 और पाम ऑयल क़रीब साढ़े 54 प्रतिशत महंगा हो चुका है। जैसे वित्त मंत्री ने प्याज न खाने वाला तर्क देकर प्याज की कीमत से अपना पल्ला झाड़ा था, अब कहीं सरकार ये न कह दे कि स्वस्थ भारत के लिए सबको उबला खाना खाने के लिए प्रेरणा मिले, इसलिए तेल के दाम बढ़ाए गए। लेकिन सरकार को ये भी देखना होगा कि तेल के साथ-साथ खाने की अन्य वस्तुओं के दाम भी बढ़ते जा रहे हैं और एक बार दाम बढ़ गए तो फिर चीजें सस्ती नहीं होतीं। सरकार चाहे तो पेट्रोल-डीजल पर टैक्स घटाकर लोगों को थोड़ी राहत दे सकती है।

पेट्रोल के दाम में 61 और डीजल में 54 प्रतिशत टैक्स के मद में जाता है। टैक्स घटेगा तो तेल के दाम भी कम होंगे और इससे लोगों,  कारोबारियों और रिजर्व बैंक को राहत मिलेगी, कर्ज सस्ता बना रहेगा, खपत को मजबूती मिलेगी। मगर ऐसा कोई फैसला लेने से पहले सरकार को जनता की तकलीफें नजर तो आना चाहिए। अभी तो सरकार 80 करोड़ लोगों को प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 5 किलो राशन देकर खुशहाल भारत बनाने की अपनी जिम्मेदारी निभा रही है।

भोजन के लिए हाथ पसारे लोग ही शायद सरकार को अपनी सफलता का पैमाना लगते हैं। हालांकि अलीगढ़ जैसे मामले सरकार की उपलब्धियों के आड़े आते हैं। लोगों को आइंदा भूख के कारण बीमार होने से पहले सोचना चाहिए कि कहीं सरकार को इससे तकलीफ न हो जाए।

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