सरकार से असहमति यानि राजद्रोह हो गया..

सरकार से असहमति यानि राजद्रोह हो गया..

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-सुनील कुमार॥

भारत की राजनीति हाल के बरसों में एकदम से हमलावर हो गई है। जिनसे असहमति है उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर हमले करवाने से बात शुरू होती है, और अगर उससे भी लोगों की सोच में बदलाव ना आए तो सोशल मीडिया कंपनियों में शिकायत करके उनके अकाउंट ब्लॉक करवाने का अगला कदम होता है। इस पर भी ना सुधरे तो पार्टियां अपने राज वाले प्रदेशों में लोगों के खिलाफ अंधाधुंध पुलिस रपट करवाती हैं, और क्योंकि पुलिस राज्य सरकार की मातहत होती है, बल्कि अपने भ्रष्टाचार की वजह से वह नेताओं के हाथों की कठपुतली भी होती है, इसलिए वह सत्तारूढ़ पार्टी की मर्जी से आनन-फानन एफआईआर दर्ज कर लेती है। केंद्र सरकार के पास दिल्ली या केंद्र प्रशासित प्रदेशों को छोडक़र किसी और प्रदेश में पुलिस सीधे-सीधे अपने हाथ तो नहीं है, लेकिन दूसरी जांच एजेंसियां हैं और ऐसा साफ दिखते रहता है कि असहमति की हालत में उसकी गंभीरता को देखते हुए उससे होने वाले नुकसान का अंदाज लगाते हुए उतनी अधिक ताकतवर एजेंसी को असहमति के पीछे लगा दिया जाता है। यह पूरा सिलसिला किसी एक पार्टी की सरकार या किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है, यह सिलसिला अलग-अलग बहुत से राज्यों में बहुत शर्मनाक तरीके से दिख रहा है और केंद्र सरकार ने इसी हमलावर तेवर को और आगे बढ़ाते हुए देश के एक सबसे प्रमुख कार्टूनिस्ट मंजुल के ट्विटर अकाउंट को ब्लॉक करने के लिए ट्विटर को लिखा है।

किसी कार्टूनिस्ट को निशाना बनाकर उसके खिलाफ कोई कार्यवाही करना सडक़ पर किसी नंगे को गाली देने जैसा होता है, जिसके बाद अगर वह भी पीछे लग जाए तो फिर गाली देने वाले के पास भागने का भी कोई रास्ता नहीं होता। आज यह हुआ कि मंजुल का साथ देने के लिए देश के हर कार्टूनिस्ट ने कई-कई कार्टून बनाए हैं, और मोदी सरकार एकदम ही निशाने पर आ गई है। लोगों ने खुद तो कार्टून बनाए ही हैं, इमरजेंसी के वक्त से लेकर, उसके बाद तक, और उसके भी बहुत पहले नेहरू के वक्त के भी बहुत से चर्चित कार्टून निकाल निकाल कर लोग पोस्ट कर रहे हैं कि नेहरू में उन पर तंज कसने वाले कार्टूनिस्टों के लिए कितना बर्दाश्त होता था। लोगों ने इंदिरा और राजीव के वक्त के कार्टून भी निकालकर पोस्ट करना शुरू किया है कि उन्होंने भी आपातकाल से परे कभी किसी कार्टूनिस्ट को धमकी नहीं दी, उसके काम को बंद करवाने की कोशिश नहीं की। आपातकाल का वक्त जरूर था जब कार्टून, खबरों और संपादकीय पर सरकारी बंदिशें लग गई थीं, और सबसे हौसलामंद लोगों ने विरोध में अपने संपादकीय कॉलम को खाली छोड़ा था। लेकिन आज एक कार्टूनिस्ट के काम को ब्लॉक करने का नोटिस ट्विटर को देकर मोदी सरकार ने देश के तमाम कार्टूनिस्टों के सामने सिर्फ एक विकल्प छोड़ा है कि वे अपने भी अस्तित्व को बचने के लिए लड़ें।


कार्टूनिस्ट सत्ता को खुश करने के लिए ठकुरसुहाती के कार्टून नहीं बना सकते। व्यंग्य और कार्टून का मिजाज ही सत्ता और ताकतवर के खिलाफ होता है, और कमजोर का साथ देने के लिए रहता है। हमें याद पड़ता है कि ममता बनर्जी ने बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपने पहले कार्यकाल के दौरान सोशल मीडिया और कार्टून पर इसी किस्म की बहुत सी कार्यवाही की थी, हमारे अपने अखबार के पुराने पन्ने ममता बनर्जी पर बनाए हुए उस वक्त के बहुत से कार्टून से भरे पड़े हैं। मोदी सरकार एक तरफ तो सोशल मीडिया पर तरह-तरह से काबू बनाने की कोशिश में लगी हुई है, दूसरी तरफ अगर हिंदुस्तान के भीतर के कार्टूनिस्टों, या लेखकों और पत्रकारों को इस तरह से घेर कर मारने की कोशिश होगी तो उसका बड़ा विरोध भी होगा और फिर असहमति कई गुना अधिक ताकत से सामने आएगी।

लक्षद्वीप की एक अभिनेत्री पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है क्योंकि उसने वहां भेजे गए तानाशाह किस्म के प्रशासक को व्यंग्य में केंद्र का भेजा गया जैविक हथिया कह दिया था। इस प्रशासक के खिलाफ तो वहां बीजेपी के लोग ही खड़े हो गए हैं। व्यंग्य की भाषा के खिलाफ अगर कानूनी करवाई ही सरकार की समझ रह गयी है, तो फिर हरिशंकर परसाई और श्रीलाल शुक्ल की तो तमाम किताबों को गैरकानूनी करार दे देना होगा। पार्टियां समझें, सोच तो एक बीज की तरह की होती है जिसे अगर दफन करने की कोशिश होगी तो वह जमीन फाडक़र निकलेगी और पेड़ बन जाएगी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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