सरकार नागरिक का बचाव करेगी या कार्रवाई करने के लिए मजबूर करेगी?

सरकार नागरिक का बचाव करेगी या कार्रवाई करने के लिए मजबूर करेगी?

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-संजय कुमार सिंह॥
भारत सरकार का रवैया अपने प्रवक्ता संबित पात्रा और मशहूर कार्टूनिस्ट मंजुल के खिलाफ परस्पर विरोधी है। मामला ऐसा ही है कि सरकार फंस गई लगती है। ट्विटर ने मंजुल को एक ईमेल भेजा है, जिसमें कहा गया है कि भारत सरकार का मानना है कि उनके ट्विटर एकाउंट का कंटेंट भारत के कानूनों का उल्लंघन करता है। लेकिन मुद्दा यह है कि इसपर कार्रवाई भारत सरकार को करनी चाहिए वह ट्वीटर से कार्रवाई करने के लिए क्यों कह रही है? कानून के उल्लंघन का मामला संज्ञान में आने के बाद भारत सरकार स्वयं कार्रवाई न करे और किसी विदेशी एजेंसी से कार्रवाई करने के लिए कहे इसका सीधा मतलब है कि वह नागरिक के मामले में कार्रवाई करने का अधिकार विदेशी कंपनी को दे रही है जबकि होना यह चाहिए कि विदेशी कंपनी नागरिक के खिलाफ कोई कार्रवाई करे तो भारत सरकार उसका बचाव करे। जैसे संबित पात्रा के मामले में किया गया था। क्या भारत सरकार की नजर में ट्विटर उपयोगकर्ताओं का दो वर्ग होगा? एक के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहेगी और दूसरे के खिलाफ कार्रवाई करने पर उसका बचाव करेगी?


संबित पात्रा के ट्वीट को ट्विटर ने मैनिपुलेटेड माना तो सरकार को एतराज हो गया। यहां कानून का उल्लंघन होने की बात तो की जा रही है पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा रही है। अगर ट्वीटर को मामला कार्रवाई लायक लगेगा तो वह कार्रवाई करेगा लेकिन भारत सरकार के पास इतना समय कैसे है कि वह एक-एक ट्वीट देखने लगी। वैसे खबर है कि “इस साल सोशल मीडिया से छह हजार कंटेंट हटाने के आदेश हुए।” ये आदेश आईटी कानून 2000 की धारा 69 ए के तहत हुए हैं। 2019 में यह संख्या 3600 थी, 2020 में 9800 और अभी आधा साल नहीं गुजरा जून के पहले हफ्ते में ही संख्या 6000 हो गई है (हिन्दुस्तान टाइम्स, 6 जून 2021)। आप समझ सकते हैं कि सरकार कितनी छुई-मुई है और ट्वीट से परेशान होती है। अपनी परेशानी दूर करने या ट्विटर को कब्जे में रखने के लिए सरकार ने ऐसे कानून बनाए हैं जो नागरिकों के मामले में सरकार खुद पूरी नहीं करती है। जैसे शिकायत दूर करने की व्यवस्था। जबकि राष्ट्रपति से लेकर केंद्रीय मंत्रियों और अधिकारियों को निजी और सार्वजनिक पत्रों का जवाब तो छोड़िए पावती तक नहीं दिए जाने के सैकड़ों मामले मिल जाएंगे।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि ट्विटर एकाउंट का कंटेंट अगर भारत के कानूनों का उल्लंघन करता है और कंटेंट भारत के नागरिक का है और वह भारत में रहता है तो कार्रवाई भारत सरकार को करनी है। अगर वह भारत के बाहर रहता है तो भारत सरकार वहां की सरकार को कहेगी। उसे अपने यहां बुलाकर कार्रवाई कर सकती है। ट्विटर तो धंधा कर रहा है अगर वह कुछ गड़बड़ करे तो भारत सरकार उसके कान पकड़ सकती है। द वायर की खबर है कि नोटिस के बाद (अंबानी की कंपनी) नेटवर्क 18 ने मंजुल को निलंबित कर दिया है। अब यह तो भारत सरकार द्वारा की गई अनुचित कार्रवाई का परिणाम है। और जाहिर है नेटवर्क 18 सरकार को नाराज करने से बचने के लिए यह सब कर रहा है। लेकिन बिना एफआईआर ट्विटर को मेल भेजकर किसी नागरिक के खिलाफ दबाव बनाना भारत सरकार से तो अपेक्षित नहीं है। कानून मंत्री बताएं कि सरकार नागरिक के लिए है या ट्विटर के लिए या सिर्फ अपने लिए?


सरकार और अधिकारियों को शायद मालूम न हो कि कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के मामले में यह सब वर्षों पहले तय हो चुका है और सरकार के खिलाफ कार्टून बनाना गैर कानूनी नहीं है। ऐसे में कानून अंधा नहीं है उसकी आड़ में कार्रवाई करने वाले अंधे हो सकते हैं। ट्वीटर को प्रवर्तन अधिकारियों से पूछना चाहिए था कि कार्टूनिस्ट मंजुल के खिलाफ क्या सरकारी कार्रवाई की गई है और उसके बाद ही वह अपने उपयोगकर्ता से कोई पूछताछ करेगा क्योंकि पहली नजर में उसकी राय में कार्टून में कुछ गड़बड़ नहीं है और तभी उसने दूसरे आपत्तिजनक ट्वीट की तरह ना तो डिलीट किया ना मैनिपुलेटेड का टैग लगाया। कायदे से ट्वीटर को संबित पात्रा को नोटिस भेजना चाहिए था कि ऐसा ट्वीट क्यों किया जिसपर मैनिपुलेटेड का टैग लग गया। कहने की जरूरत नहीं है कि ट्विटर को भारत का कानून मानना चाहिए पर गीदड़ भभकियों में नहीं आना चाहिए।


कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार जिस नए आईटी कानून को सोशल मीडिया के लिए बता रही है वह दरअसल सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्‍थानों के लिए दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 अधिसूचित किए हैं। इनके बारे में कहा गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों द्वारा भारत में कारोबार करने का स्वागत है, लेकिन उन्हें भारत के संविधान और कानूनों का पालन करना होगा। पर सवाल यह है कि कानून का उल्लंघन करने वाली पोस्ट के खिलाफ सरकार कार्रवाई क्यों नहीं करेगी या संबंधित प्लैटफॉर्म के विवेक पर क्यों नहीं छोड़ेगी। कार्रवाई उसके खिलाफ तभी हो जब उसकी गलती हो। पर जो कार्रवाई करना भारत सरकार का काम है वह कार्रवाई उसे अपने ग्राहक या उपभोक्ता के खिलाफ करने के लिए कहना कैसे ठीक है और भारत सरकार क्यों अपने नागरिक के खिलाफ किसी विदेशी कंपनी या एजेंसी को कार्रवाई करने के लिए कहे? सीधी सी बात है कि वह ऐसे कानूनों से विदेशी कंपनियों को अपनी धौंस में रखना चाहती है। सरकारी विज्ञप्ति में कहा गया था, “…. लेकिन इसका दुरुपयोग होने और गलत लाभ उठाने पर वे अवश्‍य जवाबदेह होंगे।” इसका मतलब हुआ किसी विदेशी कंपनी का भारत के नागरिक भारत में दुरुपयोग करे तो विदेशी कंपनी के खिलाफ कार्रवाई होगी, नागरिक के खिलाफ नहीं? दोनों के खिलाफ कार्रवाई का तो कोई मतलब नहीं है। साफ है कि सरकार ना अपने नागरिक की रक्षा की जिम्मेदारी स्वीकार कर रही है ना विदेशी कंपनियों की जिन्हें कारोबार करने के लिए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का हवाला देकर भारत बुलाया गया है।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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